गंगा मुड़ती है, पर्वत झुकता है, भक्त “माँ” कहता है
मिर्जापुर के निकट विन्ध्याचल में गंगा और विन्ध्य पर्वत का सान्निध्य एक विशेष तीर्थ-भाव रचता है। संकरी गलियों से होकर जब भक्त विन्ध्यवासिनी के द्वार पहुँचता है, तब उसे यह अनुभव हो सकता है कि देवी किसी दूरस्थ स्वर्ग में नहीं—भारतभूमि की मध्यरेखा पर, जनजीवन के ठीक बीच विराजती हैं। इसी कारण माँ का लोकप्रिय नाम है—विन्ध्य में वास करने वाली विन्ध्यवासिनी।
देवीमाहात्म्य का स्पष्ट शास्त्रीय सम्बन्ध
विन्ध्यवासिनी का सबसे दृढ़ ग्रन्थाधार मार्कण्डेयपुराण के अन्तर्गत देवीमाहात्म्य में मिलता है। देवी भविष्य के अपने एक रूप का वर्णन करती हैं—
नन्दगोपगृहे जाता यशोदागर्भसम्भवा।
ततस्तौ नाशयिष्यामि विन्ध्याचलनिवासिनी॥
अर्थात् नन्दगोप के गृह में यशोदा के गर्भ से उत्पन्न होकर विन्ध्याचल में निवास करने वाली देवी दैत्यों का विनाश करेंगी। यह पंक्ति देवीमाहात्म्य के उत्तरचरित में स्थापित है।
यह सम्बन्ध श्रीकृष्ण-जन्म की योगमाया-कथा से भी जुड़ता है। कंस जिस कन्या को देवकी की सन्तान समझकर मारना चाहता था, वह उसके हाथ से छूटकर दिव्य रूप में प्रकट हुई—भागवत-परम्परा उसे योगमाया कहती है। विन्ध्य की उपासना उसी योगमाया को विन्ध्यवासिनी के रूप में स्मरण करती है – भारत का महान शक्तिक्षेत्र और सिद्धपीठ हैं।
जनश्रद्धा में उनका स्थान अत्यन्त ऊँचा है – “महान शक्तिक्षेत्र”, “सिद्धपीठ” और “विन्ध्याचल की अधिष्ठात्री”।
महिषासुरमर्दिनी और विन्ध्य का आश्रय
असुर-वध के पश्चात् देवी ने विन्ध्य पर्वत को अपना निवास चुना। विजय के बाद शक्ति केवल युद्धभूमि में नहीं रहती; वह लोक की रक्षा के लिए क्षेत्राधिष्ठात्री बनती हैं। विन्ध्यवासिनी का मुख इसलिए उग्र विजय और मातृ-सौम्यता दोनों को एक साथ धारण करता है।
भक्त उनसे केवल बाह्य शत्रु की पराजय नहीं माँगता। वह आलस्य, भय, असंयम और आत्महीनता जैसे अन्तःशत्रुओं पर विजय चाहता है। माता का सिंहासन मनुष्य के भीतर तब बनता है जब वह भय के स्थान पर धर्म का चयन करता है।
विन्ध्याचल का शक्ति-त्रिकोण
विन्ध्याचल की प्रसिद्ध त्रिकोण-परिक्रमा तीन प्रमुख देवीस्थलों को जोड़ती है—
- माँ विन्ध्यवासिनी—लोकपालिनी, कृपा और राजराजेश्वरी भाव।
- कालीखोह—प्राकृतिक गुफा में महाकाली का उग्र, अवरोध-भेदी स्वरूप।
- अष्टभुजा देवी—पर्वत पर योगमाया का रक्षक रूप; कंस के हाथ से छूटी दिव्य कन्या।
नवरात्र में विन्ध्याचल
यह केवल तीन मन्दिरों की परिक्रमा नहीं, साधना की त्रयी भी है। पहले भक्त माता की शरण ग्रहण करता है; फिर काली के सम्मुख अपने भय से मिलता है; अन्ततः अष्टभुजा के शिखर पर संरक्षण और विस्तृत दृष्टि का अनुभव करता है। कृपा, रूपान्तरण और रक्षा—तीनों मिलकर शक्ति-यात्रा को पूर्ण करते हैं।
चैत्र और शारदीय नवरात्र में विन्ध्याचल विशाल जन-आराधना का केन्द्र बन जाता है। रात्रि-जागरण, देवीपाठ, दीप, ध्वज, चुनरी और कन्या-पूजन के साथ लाखों श्रद्धालु आते हैं। “नवरात्र” की रात्रियाँ यहाँ केवल पर्व की तिथियाँ नहीं लगतीं; वे मनुष्य के भीतर धीरे-धीरे घटते परिवर्तन की सीढ़ियाँ बन जाती हैं।
भीड़ के मध्य भी एक वृद्ध माता का मन्द स्वर, पिता की उँगली पकड़े बालिका, मनौती की चुनरी लिये दम्पती और मौन बैठे साधक—सभी अपनी भाषा में एक ही निवेदन करते हैं: “माँ, साथ मत छोड़ना।” इसी सरल पुकार में विन्ध्यवासिनी का व्यापक लोकसम्बन्ध है।
काजली, लोक और मातृशक्ति
मिर्जापुर-विन्ध्य क्षेत्र की सांस्कृतिक स्मृति में देवी केवल गर्भगृह में नहीं, लोकगीतों और ऋतु-उत्सवों में भी जीवित हैं। कजरी की स्वर-लहरियों में वर्षा, विरह, प्रकृति और स्त्री-अन्तःकरण बोलते हैं। विन्ध्यवासिनी की उपासना इस लोकधारा को धर्म से अलग नहीं करती; वह बताती है कि जनजीवन की करुणा और उल्लास भी माता की अभिव्यक्ति हैं।
साधारण भक्त के लिए सरल साधना
घर पर स्वच्छ स्थान में दीप प्रज्वलित कर “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे” जैसे मन्त्र का जप अनेक परम्पराओं में किया जाता है; किन्तु बीजमन्त्र-साधना गुरु से ग्रहण करना श्रेष्ठ है। सामान्य उपासक “जय माँ विन्ध्यवासिनी”, देवी-कवच के चयनित श्लोक, देवीसूक्त अथवा “या देवी सर्वभूतेषु” का श्रद्धापूर्वक पाठ कर सकता है। संख्या से अधिक शुचिता, नियमितता और सदाचार महत्त्वपूर्ण हैं।
उपसंहार: विन्ध्यवासिनी बाहर का आश्रय, भीतर की अधिष्ठात्री
माँ विन्ध्यवासिनी का सबसे निकट अर्थ – “वह शक्ति जो कठिनाई के बीच निवास करना जानती है”। पर्वत अवरोध जैसा दिखता है; माता उसे आसन बना लेती हैं। हमारे जीवन में भी जो दुःख मार्ग रोकता है, वही साधना से दृढ़ता का आधार बन सकता है। विन्ध्याचल से लौटते हुए भक्त केवल प्रसाद नहीं लाता; वह यह विश्वास लाता है कि जीवन का कोई भी मध्यप्रदेश—कोई भी कठिन बीच का समय—माता के निवास से रिक्त नहीं।

