नवरात्र का प्रथम प्रभात धरती से आरम्भ होता है। कलश के नीचे रखी मृत्तिका, उसमें अंकुरित होते यव और दीप की स्थिर लौ मानो एक ही बात कहते हैं—ऊँचाई की प्रत्येक यात्रा को पहले आधार चाहिए। नवदुर्गा की प्रथम शक्ति इसी सत्य का नाम है: शैलपुत्री।
‘शैल’ अर्थात् पर्वत और ‘पुत्री’ अर्थात् उसकी आत्मजा। यह नाम देवी को हिमवान् की पुत्री पार्वती के रूप में स्मरण करता है। पुराण-परम्परा में दक्षकन्या सती के देह-त्याग के पश्चात् उसी आदिशक्ति का हिमालय और मेना के गृह में पार्वती रूप से प्राकट्य वर्णित है। शिवपुराण की रुद्रसंहिता के पार्वतीखण्ड में उनका जन्म, बाल्यावस्था, नारद का आगमन, शिव-प्राप्ति का संकल्प और तप विस्तार से आता है। अतः शैलपुत्री की कथा केवल जन्म की कथा नहीं; वह टूट जाने के पश्चात् भी धर्म के लिए पुनः उठ खड़े होने की कथा है।
केनोपनिषद् में इन्द्र के सम्मुख ब्रह्म का बोध कराने वाली तेजस्विनी उमा हैमवती आती हैं—
स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहुशोभमानामुमां हैमवतीं तां होवाच किमेतद्यक्षमिति॥
यह मन्त्र ‘शैलपुत्री’ नाम की नवरात्र-कथा नहीं कहता; फिर भी हिमालय-पुत्री उमा को ब्रह्मविद्या की प्रकाशिका के रूप में प्रतिष्ठित करता है। यही भेद ध्यान रखने योग्य है। पुराण में वे पार्वती हैं, उपनिषद् में ज्ञान का द्वार खोलने वाली उमा हैमवती, और देवीकवच में नवदुर्गा की प्रथम शक्ति शैलपुत्री। उपासना-परम्परा इन धाराओं को एक ही मातृचेतना में अनुभव करती है।
शैलपुत्री का प्रचलित विग्रह वृषभ पर आरूढ़, एक कर में त्रिशूल और दूसरे में कमल धारण किए हुए है। वृषभ धैर्य तथा धर्म का, त्रिशूल जड़ता को भेदने वाले संकल्प का और कमल प्रतिकूल परिस्थिति में भी निर्मल बने रहने का संकेत देता है। मस्तक का अर्धचन्द्र बताता है कि मन परिवर्तित होता रहे, पर साधक का केन्द्र विचलित न हो।
आज शैलपुत्री विशेषतः उस मनुष्य से संवाद करती हैं जो जीवन में किसी विघटन के पश्चात् स्वयं को पुनः संगठित कर रहा है—जिसने अपना प्रिय खोया है, जिसका घर बदला है, जिसकी साधना बीच में छूटी है अथवा जिसे नये उत्तरदायित्व के सम्मुख खड़ा होना पड़ा है। देवी का प्रथम पाठ है: पुनरारम्भ दुर्बलता नहीं; चेतना की अक्षय क्षमता है।
सरल आराधना
प्रतिमा अथवा देवी के चित्र के सम्मुख दीप प्रज्वलित करें, स्वच्छ जल और पुष्प अर्पित करें तथा कुछ समय पृथ्वी पर स्थिर बैठें। परिवार का प्रत्येक सदस्य उस एक सद्गुण का संकल्प ले सकता है जिसे नौ दिनों तक निभाना है। सरल नाम-मन्त्र है—
ॐ शैलपुत्र्यै नमः।
अनुष्ठान का मूल्य सामग्री की अधिकता से नहीं, चित्त की स्थिरता से निर्धारित होता है। कुलाचार भिन्न हो तो अपने परिवार की परम्परा और आचार्य के निर्देश को प्रधानता दें।
शैलपुत्री हमें बताती हैं कि शक्ति का प्रथम चिह्न गर्जना नहीं, आधार है। जो अपने सत्य पर पर्वत की भाँति स्थित हो सके, वही करुणा के कमल को सुरक्षित रख सकता है। नवरात्र की प्रथम सीढ़ी पर माता मानो कहती हैं—पहले स्वयं में ठहरो; शिखर की दिशा वहीं से दिखाई देगी।
ग्रन्थाधार: देवीकवच; शिवपुराण, रुद्रसंहिता, पार्वतीखण्ड; केनोपनिषद्।

