जब अन्तःकरण में शक्ति का दीप जगे: शारदीय नवरात्र २०२६

आज प्रातः जब सूर्य की प्रथम किरण दिल्ली के आकाश को स्पर्श करेगी, तब अनेक गृहों में मिट्टी का एक छोटा-सा पात्र रखा जाएगा। उसमें यव बोए जाएँगे, जलपूर्ण कलश प्रतिष्ठित होगा और उसके समीप एक दीप प्रज्वलित होगा। दृश्य अत्यन्त सहज होगा; परन्तु उसका अर्थ विराट है। वह पात्र पृथ्वी है, जल जीवन है, यव अंकुरित सम्भावना हैं, दीप चेतना है और कलश के सम्मुख बैठा साधक स्वयं से यह संकल्प करता है—मेरे भीतर जो जड़ता है, वह जागरण में परिणत हो; जो असंयम है, वह मर्यादा में; जो भय है, वह धर्मनिष्ठ साहस में।

११ अक्टूबर २०२६, रविवार से शारदीय नवरात्र आरम्भ हो रहा है। नौ रात्रियों का यह अनुष्ठान १९ अक्टूबर की महानवमी तक चलेगा और २० अक्टूबर को विजयादशमी होगी। नवरात्र केवल उत्सवों की शृंखला नहीं है। यह भारतीय अध्यात्म की उस मूल प्रतिज्ञा का जीवित रूप है जिसके अनुसार परम सत्य निष्क्रिय शून्यता नहीं, अपितु चेतना, ज्ञान, इच्छा और क्रिया की अनन्त सामर्थ्य—शक्ति—है।

शारदीय नवरात्र २०२६

विषयतिथि एवं समय
आश्विन शुक्ल प्रतिपदा का आरम्भ१० अक्टूबर, रात्रि ९:१९
प्रतिपदा की समाप्ति११ अक्टूबर, रात्रि ९:३०
नवरात्रारम्भ११ अक्टूबर २०२६, रविवार
घटस्थापना का प्रातःकालीन समयप्रातः ६:१९ से १०:१२
अभिजितकालीन विकल्पपूर्वाह्न ११:४४ से अपराह्न १२:३१
चित्रा नक्षत्र की समाप्तिरात्रि १०:३२
वैधृति योग की समाप्तिरात्रि ९:०५
अष्टमी तिथि१८ अक्टूबर, प्रातः ८:२७ से १९ अक्टूबर, पूर्वाह्न १०:५१
महाष्टमी का मुख्य पालन१९ अक्टूबर, सोमवार
नवमी तिथि१९ अक्टूबर, पूर्वाह्न १०:५१ से २० अक्टूबर, अपराह्न १२:५०
नवमी-होम के उपलब्ध काल१९ अक्टूबर १०:५१–सायं ५:४८; अथवा २० अक्टूबर प्रातः ६:२५–अपराह्न १२:५०
विजयादशमी२० अक्टूबर; विजय मुहूर्त अपराह्न १:५९–२:४५

पञ्चाङ्ग: उपर्युक्त समय दिल्ली के लिए है। नगर, देशान्तर और स्थानीय सूर्योदय के अनुसार कुछ मिनटों का अन्तर सम्भव है। इस वर्ष प्रतिपदा के साथ चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग लगभग पूरे दिवस विद्यमान हैं। धर्मशास्त्रीय मुहूर्त-विचार में इनसे रहित काल को वरीयता दी जाती है; किन्तु जब प्रतिपदा में ऐसा काल उपलब्ध न हो, तब प्रतिपदा के पूर्वाह्न में घटस्थापना अथवा अभिजित मुहूर्त ग्रहण किया जाता है। अतः रात्रि तक प्रतीक्षा करना अथवा प्रतिपदा बीत जाने पर स्थापना करना उचित नहीं। पारिवारिक कुलाचार भिन्न हो तो अपने कुलपुरोहित के निर्देश को प्रधानता दें।

इस वर्ष अष्टमी–नवमी को लेकर भ्रम क्यों है?

११ से २० अक्टूबर तक के उत्सव में सप्तमी का विस्तार दो सूर्योदयों को स्पर्श करता है। इसके पश्चात् अष्टमी १८ अक्टूबर की प्रातः आरम्भ होकर १९ अक्टूबर के पूर्वाह्न तक रहती है और नवमी उसी दिन १०:५१ पर आरम्भ होती है। व्रत-पर्व का निर्णय केवल तिथि के आरम्भ की ग्रेगोरियन तिथि से नहीं, सूर्योदय-व्याप्ति और कर्मकाल से होता है; इसलिए महाष्टमी का मुख्य पालन १९ अक्टूबर को निर्दिष्ट है। उसी दिवस अष्टमी–नवमी की सन्धि भी आएगी। नवमी २० अक्टूबर अपराह्न १२:५० तक रहेगी और उसके पश्चात् दशमी आरम्भ होगी; विजयादशमी का विजय मुहूर्त उसी दिन अपराह्न में प्राप्त है। बंगाल की दुर्गापूजा-पद्धति, गृहस्थ नवरात्र और विभिन्न प्रादेशिक पञ्जिकाओं में अनुष्ठान-दिवस कुछ भिन्न दिख सकते हैं—इसे विरोध नहीं, कर्मनिर्णय की भिन्न पद्धति समझना चाहिए।

“नवरात्र” में रात्रि का अर्थ

‘नवरात्र’ का प्रत्यक्ष अर्थ नौ रात्रियाँ है, परन्तु भारतीय साधना में रात्रि केवल सूर्यास्त के पश्चात् का काल नहीं। वह बाह्य चेष्टाओं के शान्त होने और अन्तर्दृष्टि के जागने का अवसर है। दिन में मन जगत् की ओर प्रवाहित होता है; रात्रि उसे उसके स्रोत की ओर लौटाती है। इसलिए नवरात्र का अनुशासन हमें नौ दिवस बाहर की व्यवस्था सँभालते हुए नौ रात्रियाँ भीतर के मौन में प्रवेश करना सिखाता है।

शारदीय नवरात्र ऋतु-सन्धि में आता है। वर्षा के पश्चात् आकाश निर्मल होने लगता है; पृथ्वी का वर्ण बदलता है; दिन और रात्रि की लय परिवर्तित होती है। भारतीय गृहस्थ इस बाह्य परिवर्तन के साथ आहार-संयम, शुचिता, जप, पाठ, दान और जागरण द्वारा अपनी आन्तरिक लय को भी पुनः व्यवस्थित करता है। उपवास का मूल प्रयोजन केवल अन्न-त्याग नहीं, इन्द्रियों का निग्रह और चित्त को उपास्य में स्थिर करना है। स्वास्थ्य, आयु अथवा औषधि की आवश्यकता हो तो फलाहार या सामान्य सात्त्विक आहार ग्रहण करते हुए भी पूर्ण श्रद्धा से साधना की जा सकती है।

वेद में शक्ति: “मैं ही विश्व को धारण करती हूँ”

शक्ति-विचार का मूल किसी उत्तरकालीन कल्पना में नहीं, वैदिक वाणी में विद्यमान है। ऋग्वेद के दशम मण्डल का देवीसूक्त—वाक् अम्भृणी का आत्मानुभव—परम शक्ति को प्रथम पुरुष में उद्घाटित करता है:

अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः।
अहं मित्रावरुणोभा बिभर्म्यहमिन्द्राग्नी अहमश्विनोभा॥
— ऋग्वेद

अर्थात् वही शक्ति रुद्रों, वसुओं, आदित्यों और विश्वदेवों के साथ विचरण करती है; वही मित्र-वरुण, इन्द्र-अग्नि और अश्विनीकुमारों की सामर्थ्य को धारण करती है। अगले मन्त्र में वह कहती है:

अहं राष्ट्री संगमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमायज्ञियानाम्।
— ऋग्वेद

यहाँ ‘राष्ट्री’ का आशय किसी सीमित राजकीय पद से नहीं, समष्टि को धारण और संयोजित करने वाली सार्वभौम अधिष्ठात्री से है। अतः वैदिक शक्ति न तो केवल युद्ध की देवी है, न केवल किसी एक कार्य की अधिष्ठात्री। वह ज्ञान में मेधा, वाणी में अभिव्यक्ति, अन्न में पोषण, प्राण में गति और धर्म में धारण-शक्ति है।

केनोपनिषद् की उमा: शक्ति ही ब्रह्मविद्या

केनोपनिषद् में देवताओं को विजय प्राप्त होती है और वे उसे अपना सामर्थ्य मान बैठते हैं। ब्रह्म यक्षरूप में प्रकट होकर उनके अभिमान का परीक्षण करते हैं। अग्नि और वायु उनके सम्मुख अपनी शक्ति सिद्ध नहीं कर पाते। इन्द्र आगे बढ़ते हैं; यक्ष अन्तर्धान हो जाते हैं और उसी आकाश में वे बहुशोभमाना उमा हैमवती को देखते हैं:

स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहुशोभमानामुमां हैमवतीं तां होवाच किमेतद्यक्षमिति॥
— केनोपनिषद्

उमा बताती हैं कि वह विजय ब्रह्म की थी। इस प्रसंग का मर्म असाधारण है—शक्ति केवल बल नहीं, बल के सत्य का ज्ञान भी है। सामर्थ्य जब अहंकार से संयुक्त होता है तो बन्धन बनता है; वही सामर्थ्य जब ब्रह्मबोध से प्रकाशित होता है तो लोकमङ्गल बनता है। इसीलिए नवरात्र की साधना शक्ति माँगने से पूर्व पात्रता, विवेक और विनय का संस्कार करती है।

देवीमाहात्म्य: बाहर का संग्राम, भीतर का निर्णय

मार्कण्डेयपुराण के अध्याय ८१ से ९३ तक स्थित तेरह अध्यायों और सात सौ मन्त्रात्मक श्लोकों का ग्रन्थ देवीमाहात्म्य, प्रचलित नाम दुर्गासप्तशती, नवरात्र-पाठ का प्रधान आधार है। इसके प्रथम, मध्यम और उत्तर चरित में देवी के महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती स्वरूपों का महत्त्व प्रकट होता है।

ग्रन्थ का उपासना-दर्शन उन्हें प्रत्येक जीव में बुद्धि, निद्रा, क्षुधा, छाया, शक्ति, तृष्णा, क्षान्ति, श्रद्धा, स्मृति, दया, तुष्टि और मातृत्व के रूप में प्रणाम करता है:

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

और समापन में देवी को समग्र जगत् में चिति—चैतन्य—रूप से व्याप्त कहा गया है:

चितिरूपेण या कृत्स्नमेतद्व्याप्य स्थिता जगत्।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

यही नवरात्र का सामाजिक सत्य भी है। यदि हम मन्दिर में मातृशक्ति की अर्चना करें, किन्तु घर, कार्यस्थल और समाज में स्त्री की गरिमा, सुरक्षा, शिक्षा और निर्णय-सामर्थ्य का आदर न करें, तो उपासना अपने नैतिक फल तक नहीं पहुँचती। “सर्वभूतेषु” का अर्थ प्रतिमा से आरम्भ होकर समस्त जीवन तक विस्तृत होता है।

देवी उपनिषद्: शक्ति और ब्रह्म का अभेद

देवी उपनिषद् में देवी का वचन है:

अहं ब्रह्मस्वरूपिणी। मत्तः प्रकृतिपुरुषात्मकं जगत्।

अर्थात् मैं ब्रह्मस्वरूपिणी हूँ; प्रकृति और पुरुष से युक्त यह जगत् मुझसे प्रकट है। शाक्त दर्शन में इसलिए शक्ति कोई दूसरी, प्रतिस्पर्धी सत्ता नहीं है। वह परम चेतना की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। अग्नि से दाहकता अथवा सूर्य से प्रकाश को पृथक नहीं किया जा सकता; उसी प्रकार शिव और शक्ति को अन्ततः पृथक मानना अपूर्ण दृष्टि है। सौन्दर्यलहरी का आरम्भ इसी तत्त्व को काव्यात्मक तीव्रता देता है:

शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं
न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि॥

शिव शुद्ध प्रकाश हैं; शक्ति उसी प्रकाश का स्वातन्त्र्य, स्पन्द और अभिव्यक्ति है। ज्ञान यदि कर्म में न उतरे तो निष्फल है; कर्म यदि ज्ञान से न जुड़ा हो तो दिशाहीन। नवरात्र दोनों के पुनर्मिलन का साधना-पर्व है।

नवदुर्गा: नौ पृथक देवियाँ नहीं, एक शक्ति के नौ साधना-द्वार

देवीकवच में नवदुर्गा के नाम इस प्रकार आते हैं:

प्रथमं शैलपुत्रीति द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥
पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनी तथा।
सप्तमं कालरात्रिश्च महागौरीति चाष्टमम्॥
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः॥

क्रमउपास्य स्वरूपसाधना का आन्तरिक संकेत
प्रथमशैलपुत्रीपर्वत-सदृश स्थैर्य और धर्म में प्रतिष्ठा
द्वितीयब्रह्मचारिणीतप, अध्ययन और लक्ष्यनिष्ठ संयम
तृतीयचन्द्रघण्टासजगता, धैर्य और धर्मरक्षा
चतुर्थकूष्माण्डासृजन, प्रसन्नता और जीवन-पोषण
पञ्चमस्कन्दमातामातृत्व, उत्तरदायित्व और निर्भय संरक्षण
षष्ठकात्यायनीअन्याय के सम्मुख धर्मसम्मत दृढ़ता
सप्तमकालरात्रिभय, अज्ञान और आन्तरिक तम का अतिक्रमण
अष्टममहागौरीशुद्धि, करुणा और निर्मलता
नवमसिद्धिदात्रीसाधना की पूर्णता और कृपा का बोध

२०२६ में तिथि-वृद्धि और अष्टमी–नवमी के एक ही नागरिक दिवस में आने के कारण केवल दिनाङ्क देखकर नवदुर्गा-क्रम निश्चित न करें; अपने सम्प्रदाय अथवा कुलाचार की दैनिक पूजा-सूची ग्रहण करें। इसी प्रकार नौ दिनों को कुण्डलिनी की “नौ निश्चित अवस्थाओं” से जोड़ना सर्वमान्य शास्त्रीय विधान नहीं है। योगपरम्परा में शक्ति का अन्तर्मुखी जागरण महत्त्वपूर्ण अवश्य है, किन्तु नवरात्र की प्रत्येक तिथि को किसी एक चक्र से बाँध देना उत्तरकालीन व्याख्या है, मूल अनुष्ठान का अनिवार्य अंग नहीं।

घटस्थापना: लघु पात्र में विराट का आवाहन

कलश भारतीय संस्कारों में पूर्णता, जीवन और दैवी उपस्थिति का प्रतीक है। जलपूर्ण घट पर आम्रपल्लव अथवा कुलाचारानुसार पवित्र पत्तियाँ और नारिकेल रखे जाते हैं। समीप की मृत्तिका में यव बोए जाते हैं। नौ दिनों में उनका अंकुरित होना साधक को मौन शिक्षा देता है—अदृश्य बीज को उचित भूमि, जल, प्रकाश और समय मिले तो जीवन स्वयं ऊपर की ओर बढ़ता है। साधना भी ऐसी ही है; उसका फल उद्घोषणा से नहीं, नियमित पोषण से आता है।

गृह में सरल घटस्थापना-विधान

  1. सूर्योदय से पूर्व अथवा अनुष्ठान से पहले स्नान कर पूजा-स्थान की स्वच्छता करें। पूर्वाभिमुख अथवा उत्तराभिमुख बैठना सुविधाजनक माना जाता है।
  2. स्वच्छ वेदी पर लाल अथवा पीत वस्त्र बिछाएँ। गणपति, कुलदेवता, गुरु और देवी का मानसिक स्मरण करें।
  3. मृत्तिका-पात्र में स्वच्छ मिट्टी रखकर यव बोएँ और अल्प जल दें।
  4. ताम्र, पीतल अथवा शुद्ध मृण्मय कलश में जल, अक्षत, सुपारी और यथापरम्परा द्रव्य रखें। कलश पर मौली बाँधें; पल्लव और नारिकेल स्थापित करें।
  5. संकल्प में अपना नाम, गोत्र यदि ज्ञात हो, स्थान, तिथि और साधना का सात्त्विक उद्देश्य कहें। गोत्र ज्ञात न हो तो श्रद्धापूर्वक नाम और कुल का स्मरण पर्याप्त है।
  6. देवी का आवाहन कर गन्ध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य और जल अर्पित करें। प्रथम दिवस शैलपुत्री का ध्यान करें।
  7. अपनी क्षमता के अनुसार दुर्गासप्तशती, देवीकवच, अर्गलास्तोत्र, कीलक, देवीसूक्त, दुर्गा के १०८ नाम, अथवा केवल “ॐ दुं दुर्गायै नमः” का जप करें। बीजमन्त्र और सम्पुटयुक्त अनुष्ठान गुरु अथवा योग्य आचार्य के निर्देशन में ही करें।
  8. प्रातः और सायं दीप, पुष्प तथा नैवेद्य अर्पित कर क्षमा-प्रार्थना करें। अखण्ड दीप तभी रखें जब उसकी निरन्तर सुरक्षित देखभाल सम्भव हो; साधारण नित्य दीप भी पूर्णतः ग्राह्य है।
  9. अष्टमी अथवा नवमी को कुलाचारानुसार कुमारिका-पूजन, अन्नदान अथवा हवन करें। बालिकाओं के साथ एक बालक को भैरव-रूप में पूजने की प्रथा कुछ क्षेत्रों में है, पर यह सर्वत्र अनिवार्य नहीं।
  10. नवमी के पश्चात् अथवा विजयादशमी पर विधिपूर्वक विसर्जन करें, यव के अंकुर पवित्र वृक्ष अथवा स्वच्छ मृदा में रखें और कलश-जल को पौधों या पवित्र स्थल में अर्पित करें।

पूजा में अलंकरण से अधिक महत्त्व भावना, शुचिता और नियमितता का है। किसी द्रव्य के अभाव में पूजा रुकती नहीं। मन, वाणी और कर्म की पवित्रता ही उसका प्रधान उपकरण है।

नवरात्र-पाठ: कौन-सा पाठ किस प्रकार

दुर्गासप्तशती का पूर्ण पाठ परम्परागत न्यास, कवच, अर्गला, कीलक और रहस्य-विधियों से संयुक्त हो सकता है। जिन साधकों को उसका विधिवत् अभ्यास नहीं, वे किसी योग्य आचार्य से पाठ कराएँ अथवा सरल स्तोत्र ग्रहण करें। उच्चारण में असावधानी से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं, परन्तु मन्त्र को मनमाने ढंग से परिवर्तित भी न करें। अर्थ जानकर शुद्धि की ओर क्रमशः बढ़ना श्रेष्ठ है। यदि उपलब्ध हो तो ग्रन्थ अपनी जानने वाली भाषा में पढ़ें।

प्रतिदिन के लिए एक सरल क्रम यह हो सकता है—तीन बार शान्तिपाठ, गणपति-स्मरण, देवी का ध्यान, “या देवी सर्वभूतेषु” स्तुति, चयनित नाम-जप, मौन ध्यान और अन्त में “सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये” प्रार्थना। परिवार के सदस्य बारी-बारी से एक श्लोक और उसका अर्थ पढ़ें तो पूजा अगली पीढ़ी के लिए जीवित संस्कार बनती है।

भारत के शक्तिक्षेत्र

भारत की शक्ति-परम्परा किसी एक प्रदेश अथवा एक पूजा-पद्धति में सीमित नहीं। विभिन्न तन्त्रग्रन्थों और स्थानीय परम्पराओं में शक्तिपीठों की संख्या ५१, ५२ अथवा अन्य रूपों में मिलती है; इसलिए किसी एक सूची को सर्वथा अन्तिम कहना उचित नहीं। इसके अतिरिक्त अनेक प्राचीन देवीक्षेत्र शक्तिपीठ-सूची से पृथक होते हुए भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं।

कामाख्या, नीलाचल, असम

यहाँ देवी की मानवाकार प्रतिमा नहीं, गर्भगृह में योनिमुद्रा-रूप पवित्र शिला की उपासना होती है। कामाख्या सृष्टि, प्रजनन और प्रकृति की अविराम जीवन-शक्ति का महातीर्थ है। यह क्षेत्र विशेषतः कौल और तन्त्रपरम्परा का प्रधान केन्द्र रहा है। यहाँ शक्ति को शरीर-विरोधी नहीं, जीवन के मूल सृजन-तत्त्व के रूप में देखा जाता है।

ज्वालाजी, कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश

ज्वालाजी में देवी का विग्रह नहीं; शैल-विवरों से प्रकट ज्वालाएँ ही पूज्य हैं। यह उपासना मूर्ति से परे तेज, ऊष्मा और अविनाशी ज्योति के रूप में शक्ति का अनुभव कराती है। नवरात्र में यहाँ दीप का अर्थ और गहन हो उठता है—वह बाहर की अग्नि के साथ अन्तःकरण की अखण्ड सजगता का भी प्रतीक है।

विन्ध्यवासिनी, विन्ध्याचल, उत्तर प्रदेश

देवीमाहात्म्य में देवी अपने भावी प्राकट्य का उल्लेख करते हुए विन्ध्याचल-निवासिनी रूप का संकेत देती हैं। विन्ध्याचल में विन्ध्यवासिनी, अष्टभुजा और कालीखोह की त्रिकोण-यात्रा प्रचलित है। यह क्षेत्र गृहस्थ-भक्ति, लोकपरम्परा और शास्त्रीय देवी-उपासना का सशक्त संगम है।

काञ्ची कामाक्षी, तमिलनाडु

काञ्ची में कामाक्षी की उपासना श्रीविद्या और ललिता-त्रिपुरसुन्दरी परम्परा से गहन रूप से सम्बद्ध है। यहाँ शक्ति सौन्दर्य, ज्ञान, करुणा और ब्रह्मानन्द की समन्वित अधिष्ठात्री है। श्रीचक्र-पूजन शक्ति को समस्त ब्रह्माण्ड और मानव-अन्तःकरण के परस्पर अनुरूप विन्यास के रूप में देखने का सूक्ष्म मार्ग प्रस्तुत करता है।

मीनाक्षी, मदुरै, तमिलनाडु

मदुरै में मीनाक्षी केवल देवालय की अधिष्ठात्री नहीं, नगर-जीवन की सार्वभौम संरक्षिका के रूप में पूजित हैं। मीनाक्षी-सुन्दरेश्वर परम्परा शक्ति और शिव के सहचर्य को गृहस्थधर्म, शासन, कला और लोकमङ्गल से जोड़ती है।

कालीघाट और तारापीठ, पश्चिम बंगाल

कालीघाट शक्तिपीठ-परम्परा का विख्यात केन्द्र है। तारापीठ तारा-साधना और श्मशान-साधना की विशिष्ट धारा से सम्बद्ध है। दोनों क्षेत्र स्मरण कराते हैं कि शक्ति केवल जीवन की कोमलता नहीं, काल, मृत्यु और अनित्यता का निर्भय साक्षात्कार भी है।

वैष्णो देवी, त्रिकूट पर्वत, जम्मू

त्रिकूट की पवित्र गुहा में महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के पिण्डी-रूप का दर्शन किया जाता है। यह तीर्थ श्रम, आरोहण और समर्पण का सजीव अनुष्ठान है—भक्त चरणों से यात्रा करता है, किन्तु वास्तविक आरोहण भीतर घटित होता है।

इन सभी क्षेत्रों की पूजा-पद्धतियाँ एकरूप नहीं हैं। यही भारतीय शक्ति-परम्परा की विशेषता है—रूप अनेक हैं, अधिष्ठान एक; भाषाएँ अनेक हैं, प्रार्थना एक; क्षेत्र अनेक हैं, मातृभाव एक।

शक्ति-उपासना का सामाजिक धर्म

नवरात्र में कन्या-पूजन करते समय बालिका के चरण धोना एक दिन का संस्कार नहीं रहना चाहिए। उसका वास्तविक विस्तार है—बालिका को शिक्षा, पोषण, निर्भयता और स्वनिर्णय का अधिकार देना। मातृशक्ति के सम्मुख दीप रखने का अर्थ वृद्ध माता की सेवा से विमुख होना नहीं हो सकता। अन्नपूर्णा की अर्चना का अर्थ अन्न का अपव्यय नहीं हो सकता। सरस्वती-वन्दना का अर्थ ज्ञान को अहंकार का साधन बनाना नहीं हो सकता। दुर्गा की आराधना का अर्थ निर्बल पर अधिकार नहीं, निर्बल की रक्षा है।

शक्ति का धार्मिक बोध उत्तरदायित्व देता है। सामर्थ्य मिला है तो वह संरक्षण के लिए है; वाणी मिली है तो सत्य और सान्त्वना के लिए; धन मिला है तो दान और धर्म के लिए; ज्ञान मिला है तो अज्ञान दूर करने के लिए। यही वह बिन्दु है जहाँ पूजा जीवन बनती है।

नौ रात्रियों का नौ-संकल्प

इस नवरात्र प्रत्येक दिवस देवी को एक पुष्प अर्पित करने के साथ स्वयं को एक संकल्प दिया जा सकता है—

  • प्रथम दिवस: शरीर और निवास में स्वच्छता।
  • द्वितीय दिवस: एक इन्द्रिय-विषय पर संयम।
  • तृतीय दिवस: भय के स्थान पर धर्मसम्मत निर्णय।
  • चतुर्थ दिवस: किसी सृजनात्मक कार्य का आरम्भ।
  • पञ्चम दिवस: माता, गुरु अथवा पालक के प्रति कृतज्ञता।
  • षष्ठ दिवस: किसी अन्याय के विरुद्ध शान्त किन्तु दृढ़ वाणी।
  • सप्तम दिवस: एक पुरानी दुर्बलता का निःसंकोच निरीक्षण।
  • अष्टम दिवस: क्षमा, शुद्धि और सेवा।
  • नवम दिवस: प्राप्त ज्ञान को लोकहित में समर्पित करना।

और तब विजयादशमी केवल तिथि नहीं रहेगी। वह भीतर प्राप्त वह क्षण होगी जब मनुष्य जान लेता है कि विजय किसी दूसरे को पराजित करने में नहीं, अपने भीतर के असत्य को पहचानकर उससे ऊपर उठने में है।

समापन: देवी बाहर भी, भीतर भी

कलश स्थापित होगा। नौ दिनों बाद उसका विसर्जन भी होगा। दीप शान्त होगा, पुष्प सूखेंगे, यव पृथ्वी को लौटा दिए जाएँगे। किन्तु नवरात्र का सच्चा फल वह है जो विसर्जित न हो—बुद्धि में विवेक, वाणी में सत्य, कर्म में साहस, सम्बन्धों में करुणा और आत्मा में यह निश्चय कि दैवी शक्ति जीवन से पृथक नहीं है।

देवीमाहात्म्य का प्रणाम हमें अन्ततः उसी सार्वभौम दृष्टि तक ले जाता है—जो शक्ति मन्दिर में पूजित है, वही प्राणीमात्र में स्थित है। उसे पहचानना उपासना है; उसका सम्मान करना धर्म है; उसे लोकमङ्गल में प्रवाहित करना साधना है।

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

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