नवरात्र की यात्रा आधार से आरम्भ होकर तप, जागरण, सृजन, पोषण, धर्म-संकल्प, निर्भयता और परिष्कार से गुजरती है। नवम सोपान पर साधक सिद्धिदात्री के सम्मुख पहुँचता है। यहाँ प्रश्न यह नहीं कि उसे कितनी असाधारण शक्तियाँ मिलीं; प्रश्न यह है कि क्या वह अपने भीतर के विखण्डन से मुक्त होकर ध्येय में पूर्ण हुआ।
देवीकवच का वचन है—“नवमं सिद्धिदात्री च।” नाम स्वयं अर्थ देता है: सिद्धि प्रदान करने वाली। भारतीय साधना-ग्रन्थों में ‘सिद्धि’ के अनेक अर्थ हैं—कार्य की सम्पन्नता, साधना की निष्पत्ति, ज्ञान की उपलब्धि और कुछ योगपरम्पराओं में असाधारण सामर्थ्य। अणिमा, महिमा, लघिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व की अष्टसिद्धियों की सूची व्यापक परम्परा में प्रसिद्ध है।
सिद्धिदात्री के विषय में यह लोकप्रिय आख्यान कहा जाता है कि उन्होंने शिव को सिद्धियाँ प्रदान कीं और उन्हीं की कृपा से अर्धनारीश्वर रूप प्रकट हुआ। यह भाव शाक्त परम्परा के उस सिद्धान्त के अनुरूप है जिसमें शक्ति के बिना शिव की क्रिया सम्भव नहीं। अर्धनारीश्वर का मूर्तिशास्त्रीय और आगमिक इतिहास व्यापक है, जबकि सिद्धिदात्री से उसका विशिष्ट सम्बन्ध भक्तिपरक नवदुर्गा-परम्परा में विशेष रूप से विकसित हुआ।
सिद्धि के प्रति शास्त्र केवल आकर्षण नहीं, सावधानी भी सिखाते हैं। पतञ्जलि योगसूत्र कहता है—
ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः॥ ३.३८॥
अर्थात् जो शक्तियाँ सामान्य चित्त की दृष्टि से सिद्धियाँ प्रतीत होती हैं, वे समाधि में उपसर्ग भी बन सकती हैं। यह चेतावनी सिद्धिदात्री की पूजा को अधिक परिपक्व बनाती है। देवी से शक्ति माँगना सरल है; शक्ति का अहंकार न माँगना कठिन। वास्तविक सिद्धि वह है जिसमें सामर्थ्य सेवा बने, ज्ञान विनय बने और सफलता कृतज्ञता बने।
देवीमाहात्म्य में देवताओं की स्तुति बार-बार देवी को बुद्धि, श्रद्धा, स्मृति, दया और शक्ति के रूप में प्रत्येक जीव में स्थित बताती है। इस दृष्टि से सिद्धिदात्री भीतर की सुप्त क्षमता को धर्म के अनुकूल फलित करने वाली कृपा हैं। नवरात्र की नौ रातों में साधक ने जो संकल्प लिया, नवमी उसके परीक्षण का दिन है—क्या दीप पूजा-स्थान से उठकर व्यवहार तक पहुँचा?
आज सिद्धिदात्री उस कलाकार में प्रकट होती हैं जिसकी दीर्घ साधना सहज अभिव्यक्ति बन गई; उस चिकित्सक में जिसकी विद्या सेवा बनती है; उस गृहिणी में जो अनेक उत्तरदायित्वों को करुणा से समेटती है; उस विद्यार्थी में जो सफलता के पश्चात् भी विनम्र रहता है। सिद्धि प्रसिद्धि नहीं—स्वभाव में उतरी दक्षता है।
सरल आराधना
नौ दिनों के संकल्प का पुनरावलोकन करें। जो अधूरा है उसे दोष-बोध के बिना पुनः ग्रहण करें और जो पूरा हुआ है उसे देवी को समर्पित करें। नाम-मन्त्र जपें—
ॐ सिद्धिदात्र्यै नमः।
कन्या-पूजन की कुलपरम्परा हो तो बालिकाओं को देवी का प्रतीक मानकर आदरपूर्वक भोजन, उपहार और आशीर्वाद दें; उनके सम्मान को एक दिन के अनुष्ठान तक सीमित न रखें। उनकी शिक्षा, सुरक्षा, स्वास्थ्य और स्वाधीन व्यक्तित्व का संरक्षण ही उस पूजा का दीर्घ फल है।
सिद्धिदात्री की अन्तिम शिक्षा अत्यन्त सुन्दर है: साधना तब सिद्ध होती है जब साधक स्वयं को विजेता नहीं, कृपा का पात्र समझे। नवरात्र का शिखर किसी अलौकिक प्रदर्शन में नहीं; उस सरल मनुष्य में है जो शक्ति पाकर अधिक विनम्र, अधिक सत्यनिष्ठ और अधिक लोकहितकारी हो गया।
ग्रन्थाधार: देवीकवच; देवीमाहात्म्य की देव-स्तुतियाँ; पतञ्जलि योगसूत्र; सिद्धि-विषयक योग और पुराण-परम्पराएँ।

