सिद्धपुर, देवहूति, मातृ-षोडशी और मातृऋण की उस परम्परा की प्रामाणिक कथा, जिसे केवल पिण्डदान कह देना पर्याप्त नहीं
सिद्धपुर के बिन्दुसरोवर पर रखे जाने वाले पिण्ड केवल चावल के छोटे-छोटे गोलक नहीं होते। उनमें नौ महीने का भार होता है; प्रसव की वेदना होती है; आधी रात को जागती हुई आँखें होती हैं; बीमार बच्चे के सिर पर रखा हुआ हाथ होता है; और वह निवाला भी होता है जिसे माँ ने अपनी थाली से उठाकर संतान को दे दिया था।
गयाजी में मनुष्य अपने पितरों की विशाल वंशधारा के सामने खड़ा होता है। मातृगया में वही मनुष्य एक क्षण के लिए समूची वंशावली से अलग होकर उस एक स्त्री के सामने खड़ा होता है, जिसके शरीर से उसे शरीर मिला। यहाँ संस्कार का स्वर केवल मुक्ति की प्रार्थना नहीं है—यह स्मृति, कृतज्ञता और क्षमा का स्वर भी है।
गुजरात के पाटण जिले में सरस्वती के तट पर स्थित सिद्धपुर इसी कारण मातृगया कहलाता है। इसका धार्मिक केन्द्र बिन्दुसरोवर और कपिलमुनि आश्रम है। किंतु इसकी कथा सीधे पिण्डदान से आरम्भ नहीं होती। उसका प्रारम्भ कर्दम ऋषि के तप, भगवान विष्णु के करुणाश्रु, देवहूति की जिज्ञासा और भगवान कपिल के उस निर्णय से होता है जिसमें एक पुत्र संसार की यात्रा पर निकलने से पहले अपनी माँ के लिए रुकता है।
यही रुकना मातृगया का वास्तविक आरम्भ है।
मातृगया कहाँ है और इसका अर्थ क्या है?
सिद्धपुर—जिसे सिद्धपुर, सिद्धपुरा, सिद्धपद और पुरानी तीर्थ-परम्परा में श्रीस्थल से भी जोड़ा जाता है—उत्तर गुजरात के पाटण जिले में स्थित है। वर्तमान प्रशासनिक और पर्यटन विवरण इसे सरस्वती नदी के तट का ऐतिहासिक नगर तथा बिन्दुसरोवर को मातृ-तर्पण का प्रमुख स्थान बताते हैं। कपिलमुनि आश्रम परिसर में बिन्दुसरोवर के साथ ज्ञानवापिका और अल्पसरोवर की परम्परा भी विद्यमान है।
‘मातृगया’ एक विशिष्ट तीर्थ-संज्ञा है। जैसे बिहार का गया व्यापक पितृश्राद्ध और पिण्डदान का सर्वोपरि क्षेत्र माना गया, वैसे ही सिद्धपुर ने विशेष रूप से माता तथा मातृवंश की दिवंगत स्त्रियों के श्राद्ध का स्वरूप ग्रहण किया। इसका यह अर्थ नहीं कि गया में माता का श्राद्ध नहीं हो सकता या सिद्धपुर में पिता का स्मरण निषिद्ध है। तीर्थ-परम्परा ने केवल दोनों स्थानों को अलग आध्यात्मिक विशेषता दी है:
| तीर्थ | प्रधान धार्मिक विशेषता | मूल कथा-केन्द्र |
|---|---|---|
| गयाजी, बिहार | व्यापक पितृश्राद्ध, पिण्डदान और पितृमुक्ति | गयासुर, धर्मशिला और आदिगदाधर विष्णु |
| सिद्धपुर, गुजरात | माता और मातृपक्ष के लिए मातृगया-पार्वण श्राद्ध | कपिल, देवहूति और बिन्दुसरोवर |
मातृगया का अर्थ इसलिए केवल “माँ के लिए गया” नहीं; यह वह क्षेत्र है जहाँ माता को ज्ञान देने वाले पुत्र की कथा, दिवंगत माता को अर्पित किए जाने वाले संस्कार में रूपान्तरित हुई।
स्रोत
मातृगया से जुड़ी सामग्री तीन स्तरों पर आती है:
- श्रीमद्भागवत महापुराण, तृतीय स्कन्ध, अध्याय 21–33—कर्दम, देवहूति, कपिल, बिन्दुसरोवर, कपिलोपदेश, देवहूति की सिद्धि और सिद्धपद का मूल एवं सबसे महत्त्वपूर्ण आख्यान।
- सिद्धपुर या सिद्धपद-माहात्म्य और मातृगया-पार्वण-श्राद्ध की स्थानीय पाठ-परम्परा—सिद्धपुर के पवित्र भूगोल, मातृगया की प्रतिष्ठा, मातृ-षोडशी और विधि का विस्तृत आधार। विद्वानों द्वारा वर्णित मुद्रित सिद्धपुर-माहात्म्य देवहूति–कपिल संवाद के रूप में है और उसके साथ मातृगया-पार्वण-श्राद्ध का प्रयोग जुड़ा है।
- परशुराम–रेणुका की व्यापक स्थानीय परम्परा—गुजरात पर्यटन सहित वर्तमान तीर्थ-परम्परा कहती है कि भगवान परशुराम ने यहाँ माता रेणुका के लिए श्राद्ध किया।
कर्दम ऋषि का तप और भगवान के करुणाश्रु
स्वायम्भुव मनु की पुत्री देवहूति के जीवन में प्रवेश करने से बहुत पहले कर्दम ऋषि सरस्वती के तट पर तप कर रहे थे। श्रीमद्भागवत के अनुसार उन्होंने दीर्घकाल तक भगवान की आराधना की। भगवान विष्णु प्रकट हुए और कर्दम की गृहस्थधर्म सम्बन्धी इच्छा स्वीकार करते हुए उन्हें आश्वासन दिया कि स्वायम्भुव मनु अपनी पुत्री के साथ वहाँ आएँगे।
भगवान के प्रस्थान के बाद कर्दम उसी बिन्दुसरोवर के तट पर प्रतीक्षा करने लगे। ग्रन्थ इस सरोवर की उत्पत्ति को अत्यन्त कोमल चित्र में रखता है:
यस्मिन् भगवतो नेत्रान् न्यपतन्नश्रुबिन्दवः ।
कृपया सम्परीतस्य प्रपन्नेऽर्पितया भृशम् ॥
तद् वै बिन्दुसरो नाम सरस्वत्या परिप्लुतम् ।
पुण्यं शिवामृतजलं महर्षिगणसेवितम् ॥
— श्रीमद्भागवत
भावार्थ: जिस स्थान पर शरणागत कर्दम के प्रति अत्यन्त करुणा से अभिभूत भगवान के नेत्रों से अश्रुबिन्दु गिरे, वही बिन्दुसरोवर कहलाया। सरस्वती से परिप्लुत उसका पुण्य, मंगलकारी और अमृततुल्य जल महर्षियों द्वारा सेवित था।
यहाँ नाम की व्याख्या स्पष्ट है—बिन्दु अर्थात भगवान के अश्रु की बूँद और सरस् अर्थात जलाशय। लोकप्रिय कथनों में कभी इसे देवहूति के आनन्दाश्रु से बना सरोवर कहा जाता है। सिद्धपुर की मौखिक परम्परा में उस भाव की अपनी जगह है, पर श्रीमद्भागवत का मूल श्लोक इसे भगवान के करुणाश्रु से जोड़ता है।
मातृगया की कथा का पहला जल इसलिए शोक का नहीं, करुणा का जल है।
देवहूति: केवल किसी ऋषि की पत्नी नहीं, ज्ञान की साधिका
स्वायम्भुव मनु और शतरूपा अपनी पुत्री देवहूति को लेकर कर्दम के आश्रम पहुँचे। देवहूति ने राजप्रासाद का सुख छोड़कर तपस्वी कर्दम का जीवन स्वीकार किया। समय के साथ उनके यहाँ नौ पुत्रियाँ हुईं, जिनका विवाह प्रमुख ऋषियों से हुआ। बाद में भगवान ने उनके पुत्र के रूप में कपिलावतार ग्रहण किया।
इस कथा में देवहूति को केवल सेवा करती पत्नी अथवा मोक्ष की प्रतीक्षा करती असहाय माता के रूप में पढ़ना भूल होगी। वह प्रश्न करती हैं। वे अपने जीवन की आसक्ति, देहाभिमान और अज्ञान को पहचानती हैं। वह अपने पुत्र में केवल संतान नहीं, तत्त्वदर्शी भगवान को देखती हैं और उनसे ऐसा मार्ग पूछती हैं जिसे स्वयं साध सकें।
कर्दम संन्यास और तप के लिए वन चले गए। कपिल भी संसार में अपना कार्य करने जा सकते थे, पर वे रुक गए। श्रीमद्भागवत कहता है:
पितरि प्रस्थितेऽरण्यं मातुः प्रियचिकीर्षया ।
तस्मिन् बिन्दुसरेऽवात्सीद् भगवान् कपिलः किल ॥
— श्रीमद्भागवत
भावार्थ: पिता के वन चले जाने पर भगवान कपिल अपनी माता का प्रिय करने की इच्छा से उसी बिन्दुसरोवर पर ठहरे।
“मातुः प्रियचिकीर्षया”—माँ का कल्याण करने की इच्छा से। मातृगया का सम्पूर्ण धर्म इसी छोटे-से पद में समाया हुआ है। कपिल ने माता को दान देकर, साम्राज्य देकर या केवल भावनात्मक आश्वासन देकर कर्तव्य पूर्ण नहीं माना; उन्होंने उन्हें आत्मज्ञान के योग्य संवाद दिया।
कपिल–देवहूति संवाद: माँ को दिया गया मुक्ति का ज्ञान
श्रीमद्भागवत के तीसरे स्कन्ध में अध्याय 25 से 32 तक का विस्तृत संवाद सामान्यतः कपिलगीता या कपिलोपदेश के रूप में जाना जाता है। यह दर्शन केवल शुष्क तत्त्वगणना नहीं। इसमें प्रकृति और पुरुष का विवेक, मनुष्य के बन्धन का कारण, साधुसंग, भक्ति, ध्यान, योग और आत्मस्वरूप का ज्ञान एक-दूसरे से जुड़े हैं।
कपिल समझाते हैं कि वही चित्त विषयों और गुणों में आसक्त होकर बन्धन का कारण बनता है और भगवान में अनुरक्त होकर मुक्ति का माध्यम। सत्संग से भगवान की कथाओं में रुचि, फिर श्रद्धा, भक्ति और क्रमशः आन्तरिक स्थिरता विकसित होती है। वे अपनी माता के प्रश्नों को टालते नहीं; प्रत्येक प्रश्न को मोक्ष की वास्तविक साधना से जोड़ते हैं।
इस प्रसंग की विशिष्टता यह भी है कि यहाँ पुत्र उपदेशक है, पर माता निष्क्रिय श्रोता नहीं। देवहूति की जिज्ञासा के बिना कपिलगीता का संवाद घटित ही नहीं होता। ज्ञान पुत्र के पास है, पर प्रश्न माता खोलती है।
इसीलिए मातृगया का गहरा अर्थ यह नहीं कि पुत्र माता पर कोई आध्यात्मिक उपकार करता है। अर्थ यह है कि संतान उस चेतना के सामने विनम्र होती है जिसने उसे जन्म दिया—और जहाँ सम्भव हो, माँ की आत्मिक आकांक्षा को सुनती है।
देवहूति की सिद्धि और ‘सिद्धपद’
कपिल के प्रस्थान के पश्चात् देवहूति ने उनके बताए योग और भक्तिमार्ग का अनुसरण किया। भागवत उनके वैराग्य, ध्यान और अन्ततः सिद्धि का वर्णन करता है:
एवं सा कपिलोक्तेन मार्गेणाचिरतः परम् ।
आत्मानं ब्रह्मनिर्वाणं भगवन्तमवाप ह ॥
— श्रीमद्भागवत
भावार्थ: कपिल द्वारा बताए गए मार्ग का पालन करके देवहूति ने शीघ्र ही परम आत्मतत्त्व, ब्रह्मनिर्वाण और भगवान को प्राप्त किया।
अगला श्लोक उस स्थान को नाम देता है:
तद् वीरासीत् पुण्यतमं क्षेत्रं त्रैलोक्यविश्रुतम् ।
नाम्ना सिद्धपदं यत्र सा संसिद्धिमुपेयुषी ॥
— श्रीमद्भागवत
भावार्थ: जहाँ देवहूति ने पूर्ण सिद्धि प्राप्त की, वह परम पुण्य क्षेत्र तीनों लोकों में ‘सिद्धपद’ नाम से प्रसिद्ध हुआ।
भागवत आगे कहता है कि योग से शुद्ध हुआ उनका मर्त्य शरीर नदीरूप हो गया—ऐसी पवित्र धारा जो सिद्धि देने वाली और सिद्धों द्वारा सेवित है। आधुनिक सिद्धपुर को इसी सिद्धपद और सरस्वती–बिन्दुसरोवर परम्परा का जीवित तीर्थ माना जाता है।
कपिल का ज्ञान मातृश्राद्ध में कैसे बदल गया?
कपिल ने अपनी जीवित माता को ज्ञान देकर सिद्धि की ओर अग्रसर किया। आज का तीर्थयात्री अपनी दिवंगत माता को वही ज्ञान नहीं सुना सकता। तीर्थ-परम्परा ने इस असम्भवता को एक संस्कार में रूपान्तरित किया—मातृगया-पार्वण-श्राद्ध।
सिद्धपुर-माहात्म्य की पाठ-परम्परा बिन्दुसरोवर को ज्ञान के दीप से उज्ज्वल मातृगया-क्षेत्र कहती है। जिस स्थान पर देवहूति ने सिद्धि प्राप्त की, वहीं माता के निमित्त पिण्ड अर्पित करने की रीति प्रतिष्ठित हुई। इस प्रकार कपिल का आदर्श अनुष्ठान में बदल गया:
- कपिल ने माता को अविद्या से पार कराने का मार्ग दिया;
- वंशज माता के लिए तर्पण, पिण्ड और प्रार्थना अर्पित करता है;
- कपिल ने माता की जिज्ञासा सुनी;
- वंशज माता की स्मृति और उसके कष्टों को सुनने का संस्कार करता है;
- देवहूति ने साधना स्वयं की;
- श्राद्धकर्ता फल पर अधिकार जताने के बजाय श्रद्धापूर्वक सद्गति की कामना करता है।
यही कारण है कि मातृगया को केवल “मोक्ष दिलाने की जगह” कहना अपूर्ण है। यह संतान को स्मरण कराता है कि मुक्ति का दावा उसका नहीं; उसके हाथ में केवल श्रद्धा, प्रार्थना, दान और कृतज्ञ कर्म हैं।
मातृ-षोडशी: माँ के सोलह अनकहे कष्टों का स्मरण
सिद्धपुर की मातृश्राद्ध-परम्परा में सोलह पिण्ड विशेष रूप से उल्लेखित होते हैं। प्रत्येक पिण्ड के साथ मातृ-षोडशी का एक श्लोक बोला जाता है। इन पदों में गर्भधारण, प्रसव-वेदना, कड़वी औषधियाँ, रात्रि-जागरण, मल-मूत्र की सफाई, स्तनपान, भूखे बच्चे को अपना अन्न देना, संतान की बीमारी पर रोना और बालक के पालन में अपना आहार घटा देना—माता के जीवन के वे श्रम आते हैं जिन्हें परिवार प्रायः सामान्य मानकर भूल जाता है।
उदाहरण के लिए प्रचलित पाठ में कहा जाता है:
गर्भे दुर्गमने दुःखं विषमे भूमिवर्त्मनि ।
तस्या निष्क्रमणार्थाय मातृपिण्डं ददाम्यहम् ॥
भावार्थ: गर्भावस्था में कठिन अथवा विषम मार्ग पर चलते हुए माता ने जो पीड़ा सही, उसके परिहार की प्रार्थना से मैं यह मातृपिण्ड अर्पित करता हूँ।
और एक अन्य पद:
क्षुधया विह्वले पुत्रे ह्यन्नं माता प्रयच्छति ।
तस्या निष्क्रमणार्थाय मातृपिण्डं ददाम्यहम् ॥
भावार्थ: जब संतान भूख से व्याकुल हुई, तब माता ने अपना अन्न उसे दे दिया; उस त्याग के प्रति कृतज्ञ होकर मैं यह मातृपिण्ड अर्पित करता हूँ।
यहाँ मन्त्र केवल उच्चारण नहीं; संकल्प, सम्बन्ध, गोत्र और श्राद्ध-विधि के अंग हैं।
सिद्धपुर में मातृश्राद्ध की प्रचलित विधि
सम्प्रदाय, वेद-शाखा, कुलाचार, वैवाहिक स्थिति और जिस दिवंगत के लिए कर्म किया जा रहा है, उसके अनुसार विधि बदल सकती है। अतः निम्न क्रम सामान्य परिचय है, घर पर स्वयं करने की पूर्ण मन्त्र-पुस्तिका नहीं:
1. शुद्धि और तीर्थ-संकल्प
यात्री स्नान अथवा आचमन के बाद देश, काल, गोत्र, सम्बन्ध और दिवंगत माता अथवा मातृवंश की स्त्री का नाम लेकर संकल्प करता है। पुरानी परम्परा में सरस्वती-स्नान भी क्रम का भाग था; वर्तमान में अनुष्ठान प्रायः कपिलाश्रम–बिन्दुसरोवर परिसर में सम्पन्न होता है।
2. कपिल, देवहूति और तीर्थ का स्मरण
कपिलमुनि, माता देवहूति, कर्दम ऋषि, भगवान विष्णु और बिन्दुसरोवर का पूजन या स्मरण किया जाता है। यह चरण बताता है कि यहाँ का संस्कार केवल जलाशय की पूजा नहीं, कपिल–देवहूति संवाद से जुड़ा है।
3. तिल, जल और कुश से तर्पण
योग्य पुरोहित के निर्देशन में तिलोदक और तर्पण अर्पित किया जाता है। वैदिक अथवा स्मार्त मन्त्र सम्बन्ध, गोत्र और परम्परा के अनुसार बदल सकते हैं।
4. मातृ-षोडशी के सोलह पिण्ड
चावल अथवा स्थानीय प्रयोगानुसार निर्धारित सामग्री से सोलह पिण्ड बनाए जाते हैं। प्रत्येक पिण्ड माता के किसी त्याग या कष्ट की स्मृति से सम्बद्ध श्लोक के साथ अर्पित होता है। यही मातृगया-विधि का सबसे मार्मिक और विशिष्ट अंश है।
5. बिन्दुसरोवर का जल और पीपल-अर्पण
प्रचलित स्थानीय क्रम में बिन्दुसरोवर के जल का उपयोग और पीपल को जल देना भी सम्मिलित बताया जाता है।
6. ब्राह्मण-सत्कार, भोजन और दान
श्राद्ध के अंग के रूप में पात्र ब्राह्मण का सत्कार, भोजन, दक्षिणा तथा सामर्थ्यानुसार अन्न-वस्त्रदान किया जाता है। सेवा का व्यापक भाव वृद्ध स्त्रियों, मातृहीन बच्चों, रोगियों अथवा जरूरतमन्द परिवारों की सहायता तक भी ले जाया जा सकता है—यह शास्त्रीय कर्म के नैतिक भाव का विस्तार है।
7. कपिलमुनि आश्रम में दर्शन और क्षमा-प्रार्थना
अनुष्ठान के अन्त में कपिल, देवहूति, कर्दम और विष्णु के दर्शन की परम्परा है। संतान माता से ज्ञात-अज्ञात त्रुटियों के लिए क्षमा माँगती और परिवार के लिए सद्बुद्धि की प्रार्थना करती है।
कभी मुण्डन भी स्थानीय विधि में बताया जाता है, पर यह प्रत्येक परिवार और प्रत्येक साधक के लिए स्वतः अनिवार्य नहीं मानना चाहिए। इसी तरह नारायणबलि, त्रिपिण्डी अथवा अन्य विशिष्ट कर्म को सामान्य मातृश्राद्ध के साथ बिना कारण जोड़ना उचित नहीं। उनका प्रयोजन अलग है और निर्णय योग्य आचार्य से होना चाहिए।
मातृगया कब किया जाता है?
सिद्धपुर में मातृश्राद्ध किसी एक वार्षिक तिथि तक सीमित नहीं माना जाता। पितृपक्ष, माता की श्राद्ध-तिथि और कुछ परिवारों में कार्तिक का समय विशेष माना जाता है। कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक का विश्वपञ्चक स्थानीय तीर्थ-जीवन में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और भीड़ वाला काल है। फिर भी “केवल कार्तिक पूर्णिमा को ही मातृगया हो सकता है” कहना अत्यधिक सीमित होगा।
मृत्यु के बाद प्रथम वर्ष की और्ध्वदैहिक क्रियाएँ, मासिक और वार्षिक सपिण्डीकरण सम्बन्धी नियम अलग परम्पराओं में बदलते हैं। इसलिए हाल में दिवंगत हुई माता के लिए यात्रा की तिथि स्वयं तय न कर परिवार के पुरोहित तथा सिद्धपुर के विश्वसनीय आचार्य—दोनों से क्रम स्पष्ट करना चाहिए।
कुतुपकाल, तिथि, संकल्प और पात्रता व्यक्तिगत पंचांग एवं कुलाचार से निर्धारित हों; किसी वेबसाइट का एक सामान्य मुहूर्त सम्पूर्ण भारत के लिए समान नहीं हो सकता।
परशुराम और माता रेणुका
परशुराम की मूल पुराणकथा में ऋषि जमदग्नि के आदेश पर पुत्रों की परीक्षा, परशुराम द्वारा माता रेणुका का वध, फिर वरदान में माता और भाइयों को पुनर्जीवित करा लेना आता है। सिद्धपुर की व्यापक तीर्थ-मान्यता इसके आगे कहती है कि परशुराम ने मातृवध से उत्पन्न अपराधबोध अथवा दोष की निवृत्ति के लिए बिन्दुसरोवर में स्नान और मातृश्राद्ध किया। गुजरात पर्यटन भी इस मान्यता और वहाँ स्थित परशुराम-सम्बन्धी स्मृति का उल्लेख करता है।
- उपलब्ध सिद्धपुर-माहात्म्य के अध्ययन में भी परशुराम के अनुपस्थित होने की बात दर्ज है;
- परशुराम की प्रतिमा और कथा वर्तमान स्थानीय तीर्थ-स्मृति का हिस्सा हैं।
“सिद्धपुर की प्रतिष्ठित स्थानीय परम्परा के अनुसार परशुराम ने बिन्दुसरोवर में माता रेणुका के निमित्त प्रायश्चित्त और मातृश्राद्ध किया।”
कथा का प्रतीक गहरा है। परशुराम उस संतान का रूप हैं जो माता के प्रति अपने अपराध का सामना करती है; कपिल उस संतान का रूप हैं जो माता को ज्ञान और शान्ति देती है। मातृगया की परम्परा इन दोनों भावों—क्षमा और कल्याण—को एक संस्कार में जोड़ती है।
बिन्दुसरोवर
जीवित तीर्थ-परम्परा बिन्दुसरोवर को मानसरोवर, पुष्कर, नारायण सरोवर और पम्पा सरोवर के साथ पंच-सरोवरों में गिनती है। गुजरात पर्यटन भी इसे भारत के पाँच पवित्र प्राचीन सरोवरों में बताता है। श्रीमद्भागवत निःसन्देह बिन्दुसरोवर को पुण्य, शिवामृतजल और महर्षिगण-सेवित कहता है।
मातृऋण क्या वास्तव में चुकाया जा सकता है?
‘ऋण’ शब्द सुनते ही लेन-देन का विचार आता है—जितना लिया, उतना लौटा दिया। मातृऋण ऐसा हिसाब नहीं। कोई पिण्ड गर्भ की वेदना का मूल्य नहीं चुका सकता; कोई दक्षिणा अनिद्रा की रातें वापस नहीं कर सकती; कोई मन्त्र उस चिन्ता को माप नहीं सकता जिसमें माँ ने बच्चे के घर लौटने की प्रतीक्षा की।
मातृगया ऋण चुकाने का दावा नहीं, ऋण स्वीकार करने का संस्कार है।
जीवित माता की उपेक्षा कर उनकी मृत्यु के बाद महँगा अनुष्ठान कर देना मातृश्रद्धा की आत्मा नहीं हो सकता। कपिल की कथा में पहला धर्म यही है कि पुत्र माँ के लिए रुकता है, उनकी बात सुनता है और उनके कल्याण के लिए अपना समय देता है। इसलिए मातृगया की यात्रा का सच्चा आरम्भ माता के जीवनकाल में होता है:
- उनकी बात धैर्य से सुनने में;
- बीमारी में साथ रहने में;
- आर्थिक और भावनात्मक सुरक्षा देने में;
- उनके व्यक्तित्व को केवल ‘माँ’ की भूमिका में सीमित न करने में;
- और मतभेद के बाद भी सम्मान बचाए रखने में।
श्राद्ध जीवित सेवा का विकल्प नहीं; वह उस सेवा के छूटे हुए अंशों पर क्षमा माँगने का अवसर हो सकता है।
बिन्दुसरोवर के किनारे अन्ततः कौन मुक्त होता है?
धार्मिक श्रद्धा कहती है कि विधिपूर्वक मातृश्राद्ध से दिवंगत माता की तृप्ति और सद्गति की प्रार्थना फलित होती है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से संतान अपनी स्मृति, अपराधबोध और अधूरे संवाद को संस्कार का रूप देती है। सामाजिक दृष्टि से परिवार स्वीकार करता है कि वंश केवल पुरुषों के नाम से नहीं बना; प्रत्येक पीढ़ी के पीछे असंख्य स्त्रियों का शरीर, श्रम और मौन था।
इनमें से कोई दृष्टि दूसरी को नष्ट नहीं करती।
सोलहवाँ पिण्ड रखते समय तीर्थयात्री यह अनुभव करता है कि माँ अब सामने बैठकर उत्तर नहीं देगी। फिर भी उसका नाम जल में बोला जाता है। उनके त्याग को सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया जाता है। उनसे क्षमा माँगी जाती है। और उनके दिए हुए जीवन को अधिक करुण, अधिक उत्तरदायी जीवन में बदलने का संपर्क लिया जाता है।
यही बिन्दुसरोवर की सबसे बड़ी शिक्षा है। भगवान के करुणाश्रु से आरम्भ हुई कथा देवहूति की सिद्धि तक जाती है और फिर प्रत्येक उस संतान तक लौटती है जो एक दिन समझती है—उसका पहला तीर्थ उसकी माँ की गोद थी।

