कभी प्रार्थना मनुष्य को संसार से दूर नहीं ले जाती; वह उसे अपने सत्य के प्रति अधिक स्पष्ट कर देती है। ब्रज की कुमारिकाएँ यमुना के तट पर प्रातः स्नान कर जिस देवी का व्रत करती थीं, वे कात्यायनी थीं। उनके मन्त्रोच्चार में संकोच नहीं, निष्कपट ध्येय था।
श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कन्ध, बाईसवें अध्याय में हेमन्त ऋतु के प्रथम मास में ब्रज की कुमारिकाओं द्वारा कात्यायनी-व्रत का वर्णन है। वे हविष्य ग्रहण करतीं, प्रातः यमुना में स्नान करतीं, बालुका से देवी का स्वरूप बनाकर गन्ध, पुष्प, धूप और दीप से पूजा करतीं तथा कहतीं—
कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि।
नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः॥
यहाँ देवी संकल्प को पवित्र करने वाली अधीश्वरी हैं। कुमारिकाओं की इच्छा केवल सामाजिक विवाह की याचना नहीं रह जाती; भागवत की भक्ति-दृष्टि में वह भगवान् के प्रति अनन्य प्रेम की आकांक्षा है।
देवीकवच कात्यायनी को नवदुर्गा का षष्ठ स्वरूप कहता है। कात्यायनी नाम की पौराणिक व्याख्याएँ अनेक हैं। व्यापक परम्परा उन्हें ऋषि कात्यायन की तपस्या से सम्बद्ध करती है और वामनपुराण की परम्परा देवताओं के संयुक्त तेज से प्रकट महिषासुरमर्दिनी शक्ति से उनका सम्बन्ध स्थापित करती है। देवीमाहात्म्य में महिषासुर-वध का अत्यन्त प्राचीन और प्रभावशाली आख्यान है। उपासना-परम्परा कात्यायनी को उसी महिषासुरमर्दिनी महाशक्ति के रूप में पहचानती है।
महिषासुर केवल बाह्य शत्रु की छवि नहीं। ‘महिष’ की जड़, भारी और रूप बदलती वृत्ति मनुष्य के भीतर भी अनुभव की जा सकती है—कभी आलस्य, कभी अहंकार, कभी शक्ति का दुरुपयोग। देवी के हाथों उसका विनाश बताता है कि धर्मरक्षा के लिए करुणा को कभी-कभी निर्णायक होना पड़ता है।
कात्यायनी आज की कन्याओं और युवाओं से भी सीधा संवाद करती हैं। वे इच्छा को लज्जित नहीं करतीं; उसे साधना, मर्यादा और ईश्वराभिमुखता देती हैं। जीवनसाथी की कामना हो, योग्य कर्म की खोज हो अथवा अन्याय से मुक्ति—देवी के समक्ष इच्छा रखते समय मनुष्य स्वयं से पूछता है: क्या मेरा ध्येय केवल मेरा हित चाहता है, अथवा उसमें धर्म और परस्पर सम्मान भी है?
सरल आराधना
श्रीमद्भागवत का उक्त मन्त्र श्रद्धा से पढ़ा जा सकता है। जो व्यक्ति उसका विशेष प्रयोजन न लेना चाहे, वह सरल नाम-मन्त्र जपे—
ॐ कात्यायन्यै नमः।
कुमारिकाओं का सम्मान, कन्या-शिक्षा में सहयोग, परिवार में स्त्री की इच्छा और निर्णय का आदर—ये कात्यायनी-पूजा के सामाजिक रूप हैं। केवल देवी की प्रतिमा को शक्ति कहना और जीवित कन्या की वाणी को अनसुना करना उपासना के मर्म के विपरीत है।
कात्यायनी का तेज बताता है कि पवित्र इच्छा निष्प्राण नहीं होती। वह व्रत लेती है, अनुशासन स्वीकारती है और अधर्म के सामने खड़ी होती है। जब प्रार्थना में सत्य, मर्यादा और साहस एकत्र होते हैं, तब मनुष्य केवल वर नहीं माँगता—वह स्वयं वर के योग्य बनता है।
ग्रन्थाधार: देवीकवच; श्रीमद्भागवत; देवीमाहात्म्य; वामनपुराण की कात्यायनी-महिषासुर परम्परा।

