भारतीय देवदृष्टि में माता की गोद और रणभूमि परस्पर विरोधी नहीं हैं। जो गोद जीवन को पोषित करती है, वही आवश्यकता पड़ने पर उसके धर्म की रक्षा के लिए सिंह पर आरूढ़ होती है। नवदुर्गा का पंचम स्वरूप स्कन्दमाता इस अद्भुत समन्वय का नाम है।
देवीकवच उन्हें पाँचवाँ स्वरूप कहता है—“पञ्चमं स्कन्दमातेति।” स्कन्द, कुमार, कार्त्तिकेय और षण्मुख—ये देवसेनापति के प्रसिद्ध नाम हैं। शिवपुराण की रुद्रसंहिता के कुमारखण्ड में तारकासुर के अत्याचार, शिव-पार्वती के पुत्र की आवश्यकता, दिव्य तेज के वहन और कुमार के प्राकट्य का विस्तृत पुराणिक आख्यान है। रामायण और महाभारत में भी स्कन्द-जन्म की भिन्न परम्पराएँ मिलती हैं। दैवी तेज अनेक माध्यमों से संरक्षित होकर उस कुमार में परिणत होता है जो धर्म की रक्षा करता है।
स्कन्दमाता के विग्रह में बाल स्कन्द उनकी गोद में हैं। देवी स्वयं सिंह पर आरूढ़ हैं और कमल धारण करती हैं। यहाँ मातृत्व को केवल कोमल भाव में सीमित नहीं किया गया। माता बालक को इतना समर्थ बनाती है कि वह अपने युग के तारकासुर का सामना कर सके। इसीलिए स्कन्दमाता का वात्सल्य अधिकार नहीं, मुक्तिदायी पोषण है।
पुराणिक जन्मकथा में अग्नि, गङ्गा और कृत्तिकाओं की भूमिकाएँ भी आती हैं। इससे मातृत्व की भारतीय अवधारणा और व्यापक होती है। जन्म देने वाली, धारण करने वाली, पोषण करने वाली और संस्कार देने वाली—मातृत्व की अनेक धाराएँ एक बालक के निर्माण में सम्मिलित होती हैं। स्कन्दमाता इन सभी के प्रति कृतज्ञता का द्वार खोलती हैं।
यह स्वरूप उन परिवारों को भी गहरी सांत्वना देता है जिनमें पालन-पोषण का उत्तरदायित्व जैविक माता-पिता से आगे दादी, नानी, बुआ, शिक्षक, संरक्षक अथवा समाज ने निभाया हो। भारतीय परम्परा ‘माता’ को केवल शरीर की उत्पत्ति तक सीमित नहीं करती; जो जीवन को अपने से आगे बढ़ने का सामर्थ्य दे, उसमें मातृ-तत्त्व है।
स्कन्दमाता की कथा का आधुनिक पाठ और भी महत्त्वपूर्ण है। बालक की प्रत्येक कठिनाई स्वयं हल कर देना प्रेम का एक रूप हो सकता है, पर उसे निर्णय, अनुशासन और उत्तरदायित्व के योग्य बनाना अधिक दूरदर्शी प्रेम है। देवी की गोद सुरक्षा देती है; सिंह साहस सिखाता है; कमल निर्मल ध्येय देता है; बाल स्कन्द भविष्य की सम्भावना हैं।
सरल आराधना
माता-पिता अथवा संरक्षक उस दिन बालकों के नाम से एक शुभ संकल्प ले सकते हैं—उनके साथ निर्विघ्न समय, अध्ययन में सहायता, पौष्टिक आहार, संस्कार-कथा अथवा किसी वंचित बालक की सेवा। नाम-स्मरण करें—
ॐ स्कन्दमात्रे नमः।
स्कन्दमाता बताती हैं कि सन्तान माता की उपलब्धि नहीं, उसे सौंपा गया भविष्य है। सच्चा वात्सल्य उसे अपने समीप बाँधता नहीं; उसे सत्य, साहस और सेवा के योग्य बनाकर जगत् को अर्पित करता है। गोद में करुणा और सिंह पर निर्भयता—यही मातृत्व की सम्पूर्ण छवि है।
ग्रन्थाधार: देवीकवच; शिवपुराण, रुद्रसंहिता, कुमारखण्ड; वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड के स्कन्द-जन्म प्रसंग; महाभारत, वनपर्व/शल्यपर्व की स्कन्द-परम्पराएँ।

