जब किसी घर में दीप प्रज्वलित होता है, वह अन्धकार से युद्ध नहीं करता; वह केवल प्रकाश उपस्थित कर देता है। नवदुर्गा का चतुर्थ स्वरूप कूष्माण्डा इसी सहज सृजन-शक्ति का ध्यान है—ऐसी मातृचेतना जिसके भीतर विश्व को धारण करने वाली ऊष्मा अनुभव की जाती है।
देवीकवच में “कूष्माण्डेति चतुर्थकम्” कहकर उनका नाम स्पष्टतः आता है – अत्यन्त प्रचलित वाक्य—“देवी ने अपनी मन्द मुस्कान से ब्रह्माण्ड की रचना की”—‘कूष्माण्डा’ नाम की भक्तिपरक व्याख्या में ‘कु’ को लघु, ‘ऊष्मा’ को सृजन-ताप और ‘अण्ड’ को ब्रह्माण्ड से जोड़ा जाता है।
सृष्टि की आदि शक्ति के रूप में देवी का शास्त्रीय आधार अत्यन्त प्राचीन है। ऋग्वेद के देवीसूक्त में वाक् अम्भृणी उद्घोष करती हैं—
अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः।
और आगे वे स्वयं को जगत् की धारक, देवताओं की शक्ति तथा विविध रूपों में प्रवेश करने वाली चेतना कहती हैं। देवीमाहात्म्य देवी को विश्व की उत्पत्ति, स्थिति और संहार में कार्यरत महामाया के रूप में स्तुत करता है। देवीभागवत परम्परा पराशक्ति को सृष्टि का मूलाधार मानती है। इस व्यापक शाक्त सृष्टिदर्शन को नवरात्र की ध्यान-परम्परा कूष्माण्डा के सहज, ऊष्मामय, विश्वधात्री स्वरूप में अनुभव करती है।
सूर्य के समान दीप्त मण्डल से उनका सम्बन्ध भी साधना-परम्परा में कहा जाता है। इसका तात्त्विक अर्थ स्पष्ट है: जीवन जहाँ है, वहाँ ऊष्मा है; अंकुर जहाँ फूटता है, वहाँ भीतर कोई अदृश्य ऊर्जा कार्य कर रही है। गर्भ में पलता शिशु, मिट्टी को चीरता बीज, उदासी के पश्चात् लौटती सृजन-इच्छा—ये सभी कूष्माण्डा-तत्त्व को समझने के मानवीय द्वार हैं।
उनका प्रचलित अष्टभुजा-विग्रह विविध आयुधों, कमण्डलु, धनुष-बाण, कमल, अमृतकलश और जपमाला से युक्त माना जाता है। इसका भाव यह नहीं कि सृजन केवल कोमल कर्म है। नये जीवन को जन्म देना, उसका संरक्षण करना और विघ्नों से बचाना—तीनों के लिए ज्ञान, अनुशासन और शक्ति चाहिए। माता की मुस्कान के पीछे अथाह उत्तरदायित्व होता है।
आज कूष्माण्डा उस व्यक्ति के लिए विशेष अर्थ रखती हैं जिसने अपने भीतर का प्रकाश क्षीण पड़ता अनुभव किया हो। देवी यह नहीं कहतीं कि एक ही क्षण में सम्पूर्ण जीवन बदल दो। वे कहती हैं—एक दीप जलाओ, एक पृष्ठ लिखो, एक पौधा रोपो, एक बालक को प्रोत्साहित करो, एक निराश मन में आशा का वाक्य रखो। सृजन का ब्रह्माण्ड प्रायः ऐसे ही सूक्ष्म बीज से आरम्भ होता है।
सरल आराधना
दीप के सम्मुख बैठकर अपने जीवन के उस क्षेत्र को स्मरण करें जहाँ नयी रचना की आवश्यकता है। नाम-मन्त्र का जप करें—
ॐ कूष्माण्डायै नमः।
फिर उस सृजन की दिशा में एक लघु कर्म उसी दिन पूर्ण करें। पूजा में फल, जल अथवा घर में उपलब्ध सात्त्विक नैवेद्य श्रद्धापूर्वक अर्पित किया जा सकता है। किसी एक विशिष्ट भोग को सर्वशास्त्रीय अनिवार्यता न मानें; क्षेत्र और कुल के अनुसार परम्पराएँ भिन्न हैं।
कूष्माण्डा का रहस्य यह है कि विशालता का आरम्भ सूक्ष्म से होता है। ब्रह्माण्ड हो अथवा मनुष्य का जीवन—पहले भीतर ऊष्मा जागती है, फिर प्रकाश फैलता है, फिर रूप निर्मित होता है। देवी उस प्रथम ‘हाँ’ की अधिष्ठात्री हैं जो अन्धकार के मध्य जीवन बोलता है।
ग्रन्थाधार: देवीकवच; ऋग्वेद (देवीसूक्त); देवीमाहात्म्य १ तथा स्तुतियाँ; देवीभागवत का शाक्त सृष्टिदर्शन।

