किसी लक्ष्य को चाह लेना सरल है; उस लक्ष्य के योग्य स्वयं को बनाना तप है। नवदुर्गा का दूसरा स्वरूप ब्रह्मचारिणी इसी अन्तर को प्रकाशित करता है। वे अलंकारों से नहीं, पदयात्रा से आती हैं; उनके करों में आयुध नहीं, जपमाला और कमण्डलु हैं। उनका तेज घोषणा नहीं करता—वह भीतर से दीप्त होता है।
‘ब्रह्मचारिणी’ का सामान्य अर्थ ब्रह्म में आचरण करने वाली, संयम और तप का जीवन जीने वाली साधिका है। देवीकवच उन्हें नवदुर्गा का द्वितीय नाम देता है। इस स्वरूप का व्यापक कथात्मक आधार पार्वती की वह तपश्चर्या है जिसका वर्णन शिवपुराण के पार्वतीखण्ड में है। नारद से अपने जीवन का प्रयोजन जानकर पार्वती शिव को प्राप्त करने के लिए कठोर साधना का निश्चय करती हैं। माता-पिता की स्वाभाविक चिन्ता, वन का एकान्त, ऋतु-परिवर्तन और शरीर की सीमा—कुछ भी उनके संकल्प को भंग नहीं करता।
इस आख्यान का मर्म किसी सांसारिक वर की प्राप्ति मात्र नहीं है। शिव यहाँ कल्याण, परम चेतना और वैराग्य के अधिष्ठाता हैं; पार्वती की यात्रा शक्ति द्वारा उस परम तत्त्व के साथ पुनर्मिलन की यात्रा है। वे प्रतीक्षा नहीं करतीं कि कोई उन्हें पूर्ण करे। वे तप द्वारा अपने भीतर की पूर्णता को प्रकट करती हैं। इसी कारण ब्रह्मचारिणी भारतीय नारी का केवल विवाहपूर्व रूप नहीं; वे प्रत्येक साधक की अनुशासित चेतना हैं।
जपमाला निरन्तर स्मरण की प्रतीक है। एक-एक मनका बताता है कि विराट परिवर्तन छोटे, पुनरावृत्त कर्मों से बनता है। कमण्डलु सीमित आवश्यकता और संरक्षित जीवन-ऊर्जा का संकेत देता है। उनके चरण अनावृत हैं—साधना के मार्ग में सुविधा की शर्त नहीं रखी जाती। फिर भी उनका तप आत्मपीड़ा नहीं है। शास्त्रीय तप का अर्थ शरीर का तिरस्कार नहीं, इच्छा का परिष्कार है। भगवद्गीता भी सात्त्विक तप को श्रद्धा, संयम और फलाकांक्षा से रहित अनुशासन से जोड़ती है।
ब्रह्मचारिणी की कथा आज के घर में अनेक रूपों में जीवित है। प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करता विद्यार्थी, रोगी की सेवा में रात्रि जागती पुत्री, सीमित साधनों में परिवार सँभालती माता, वर्षों तक किसी कला का अभ्यास करता युवक, अथवा सत्य से समझौता न करने वाला कर्मयोगी—जब कोई व्यक्ति दीर्घ प्रयत्न को शान्त भाव से निभाता है, वहाँ ब्रह्मचारिणी का तत्त्व उपस्थित होता है।
उनकी आराधना हमें तीन प्रश्न देती है: मेरे जीवन का वास्तव में महत्त्वपूर्ण लक्ष्य क्या है? उसके लिए मुझे कौन-सी एक असंयमित आदत छोड़नी है? और कौन-सा लघु सत्कर्म प्रतिदिन करना है? इन प्रश्नों का ईमानदार उत्तर स्वयं एक उपासना है।
सरल आराधना
दीप के समीप शान्त बैठकर जपमाला से अथवा बिना माला के नाम-स्मरण करें—
ॐ ब्रह्मचारिण्यै नमः।
उस दिन वाणी में संयम, भोजन में सात्त्विकता और कर्म में नियमितता रखें। उपवास स्वास्थ्य, आयु और पारिवारिक परम्परा के अनुरूप ही हो; गर्भवती, रोगी, वृद्ध और औषधि लेने वाले व्यक्ति आहार-विषयक निर्णय चिकित्सकीय विवेक से करें। देवी भक्ति को शरीर-विरोध नहीं, चेतना-परिष्कार बनाती हैं।
ब्रह्मचारिणी का आशीष चमत्कार की अधीर प्रतीक्षा नहीं, साधना की दीर्घ श्वास है। वे स्मरण कराती हैं कि जब इच्छा स्वार्थ से मुक्त होकर सत्य के प्रति समर्पित होती है, तब वही इच्छा तप बनती है—और तप में मनुष्य स्वयं अपने नये जन्म का साक्षी होता है।
ग्रन्थाधार: देवीकवच; शिवपुराण, रुद्रसंहिता, पार्वतीखण्ड; भगवद्गीता।

