जहाँ नवरात्र केवल तिथि नहीं, नगर के भीतर खुलते नौ आध्यात्मिक द्वार हैं
शारदीय नवरात्र के प्रथम प्रभात में काशी को देखिए। गंगा के ऊपर अभी प्रकाश पूरी तरह उतरा नहीं है। घाट की सीढ़ियों पर जल, दीप और मन्त्र साथ-साथ जाग रहे हैं। किसी संकरी वीथि से घण्टिका का स्वर आता है; किसी द्वार पर रक्तवर्णी जवा के पुष्प रखे हैं; कहीं एक माता अपनी पुत्री का हाथ पकड़े उस छोटे-से देवालय तक पहुँच रही है जिसे बाहर से देखकर कोई सामान्य गृह भी समझ सकता है। आज की यात्रा किसी एक भव्य शिखर तक पहुँचकर समाप्त नहीं होती। यह नौ दिनों में काशी के नौ भिन्न स्थानों पर जाती है—शैलपुत्री से सिद्धिदात्री तक।
यही काशी की नवदुर्गा-यात्रा की विशेषता है। देवीकवच में जिन नौ नामों का क्रम मिलता है, काशी की जीवित उपासना-परम्परा उन्हें नगर के भूगोल में प्रतिष्ठित करती है—
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥
पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः॥
“प्रमुख मन्दिर” – देवालय का सम्बन्ध उस नवदुर्गा-नाम से प्रत्यक्ष हो, वहाँ जीवित पूजा-परम्परा हो और नवरात्र में उस स्वरूप के दिन दर्शन का लोकाचार प्रचलित हो। इन मानकों पर काशी की नवदुर्गा-यात्रा सबसे सुसंगत उदाहरण प्रस्तुत करती है। वाराणसी नवरात्र की व्यवस्थाओं में शैलपुत्री से सिद्धिदात्री तक सभी नौ देवालयों को पृथक नवदुर्गा मन्दिरों के रूप में चिह्नित करता है।
एक दृष्टि में काशी की नवदुर्गा-यात्रा
| नवरात्र-दिवस | देवी-स्वरूप | काशी में प्रमुख उपासना-स्थान | क्षेत्र |
|---|---|---|---|
| प्रथम | माँ शैलपुत्री | शैलपुत्री देवी मन्दिर | मरहिया/मढ़िया घाट क्षेत्र |
| द्वितीय | माँ ब्रह्मचारिणी | ब्रह्मचारिणी देवी मन्दिर | दुर्गाघाट–ब्रह्माघाट क्षेत्र |
| तृतीय | माँ चन्द्रघण्टा | चन्द्रघण्टा देवी मन्दिर | चौक, चन्दू नाई की वीथि |
| चतुर्थ | माँ कूष्माण्डा | दुर्गाकुण्ड स्थित दुर्गा मन्दिर | भदैनी–दुर्गाकुण्ड, अस्सी के समीप |
| पञ्चम | माँ स्कन्दमाता | स्कन्दमाता मन्दिर, बागेश्वरी परिसर | जैतपुरा |
| षष्ठ | माँ कात्यायनी | कात्यायनी देवी, आत्मवीरेश्वर परिसर | सिंधिया घाट के समीप |
| सप्तम | माँ कालरात्रि | कालिका/कालरात्रि देवी मन्दिर | कालिका वीथि |
| अष्टम | माँ महागौरी | श्री अन्नपूर्णा मन्दिर में महागौरी-उपासना | विश्वनाथ वीथि |
| नवम | माँ सिद्धिदात्री | सिद्धिदात्री देवी मन्दिर | सिद्धमाता वीथि, सिद्धेश्वरी क्षेत्र |
१. माँ शैलपुत्री: यात्रा का प्रथम चरण, स्थैर्य का प्रथम पाठ
“शैल” केवल पर्वत नहीं; वह अचलता, धैर्य और आधार का भी बोध कराता है। पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण देवी का प्रथम नाम शैलपुत्री है। वृषभ पर आरूढ़, दाहिने कर में त्रिशूल और बाएँ कर में कमल—उनका विग्रह साधक को बताता है कि आध्यात्मिक आरोहण कल्पना से नहीं, दृढ़ भूमि से आरम्भ होता है।
काशी में माँ शैलपुत्री का प्रमुख देवालय नगर के उत्तरी भाग में मरहिया अथवा मढ़िया घाट के समीप संकरी वीथियों में स्थित है। यह किसी विराट प्रासाद की भाँति दूर से दिखाई नहीं देता। छोटे परिसर में शिवलिङ्ग, नन्दी और अन्य देवप्रतिष्ठाओं के मध्य माँ का स्थान है। यही लघुता उसका सौन्दर्य है—नवरात्र का प्रथम दर्शन बताता है कि शक्ति का आरम्भ बाह्य प्रदर्शन से नहीं, भीतर धारण की गई स्थिरता से होता है।
प्रतिपदा को यहाँ दर्शन की विशेष परम्परा है। श्रद्धालु जीवन के अस्थिर समय में स्थैर्य, आरोग्य और नयी साधना के लिए माता की शरण लेते हैं। नवदुर्गा-यात्रा की दृष्टि से यह केवल पहला पड़ाव नहीं, संकल्प का संस्कार है: पहले अपने पाँव धरती पर स्थिर कीजिए, तभी चेतना ऊपर उठेगी।
२. माँ ब्रह्मचारिणी: तप की निःशब्द ज्योति
ब्रह्मचारिणी का स्वरूप अलंकारों से नहीं, तप से दीप्त है। एक कर में जपमाला और दूसरे में कमण्डलु लिए देवी उस पार्वती-तत्त्व का स्मरण कराती हैं जिसने लक्ष्य की प्राप्ति हेतु दीर्घ तप स्वीकार किया। यहाँ “ब्रह्मचर्य” का व्यापक अर्थ है—अपने समस्त आचरण और चेतना को ब्रह्म, अर्थात् परम सत्य की दिशा में ले जाना।
काशी का ब्रह्मचारिणी देवालय दुर्गाघाट और ब्रह्माघाट के समीप स्थित लघु किन्तु श्रद्धामय स्थान है। गर्भगृह में सुशोभित माता के सम्मुख शिवलिङ्ग की उपस्थिति शैव और शाक्त तत्त्व के अभिन्न सम्बन्ध को सहज रूप से व्यक्त करती है। नवरात्र की द्वितीया को यहाँ श्रद्धालुओं का विशेष आगमन होता है; कार्तिक पूर्णिमा के अन्नकूट का स्थानीय उत्सव भी इस देवालय की जीवित परम्परा का भाग है।
माँ ब्रह्मचारिणी का मन्दिर विद्यार्थी, साधक, गृहस्थ—सबको एक ही शिक्षा देता है: बड़ा फल आकस्मिक उत्तेजना से नहीं, दीर्घ अनुशासन से प्राप्त होता है। जब जीवन में प्रयत्न का उत्तर शीघ्र न मिले, तब माता का माला और कमण्डलु धारण किए शान्त स्वरूप धैर्य का आश्वासन बनता है।
३. माँ चन्द्रघण्टा: सजग करुणा का सूक्ष्म देवालय
मस्तक पर अर्धचन्द्र घण्टिका के आकार में सुशोभित होने से देवी का नाम चन्द्रघण्टा है। उनका सिंहवाहिनी, आयुधधारिणी स्वरूप केवल युद्ध का चिह्न नहीं; वह धर्मरक्षा के लिए सदैव जाग्रत चेतना है। घण्टा का नाद भय को काटता है, चन्द्रमा मन को शीतल करता है—इस रूप में तेज और शान्ति एक-दूसरे के विरोधी नहीं रहते।
चौक क्षेत्र की चन्दू नाई की वीथि में स्थित चन्द्रघण्टा मन्दिर काशी की उन विलक्षण प्रतिष्ठाओं में है जिनकी भौतिक लघुता उनकी आध्यात्मिक महत्ता को तनिक भी कम नहीं करती। लौह-जाली के भीतर माता का दर्शन होता है; समीप अन्य नवदुर्गा स्वरूपों की लघु प्रतिमाएँ भी देखी जाती हैं। तृतीया को यह संकरी वीथि स्वयं तीर्थ-पथ बन जाती है।
इस देवालय का लोक-सन्देश अत्यन्त समीप का है। परिवार की रक्षा केवल कठोरता से नहीं होती और करुणा केवल निष्क्रिय कोमलता नहीं है। जहाँ प्रेम सजग है, वहाँ चन्द्र की शीतलता और घण्टा की चेतावनी साथ रहती है—यही चन्द्रघण्टा का धर्म है।
४. माँ कूष्माण्डा: दुर्गाकुण्ड में सृजन का महाप्रकाश
नवदुर्गा के चौथे स्वरूप कूष्माण्डा को ब्रह्माण्डीय सृजन-ऊर्जा से सम्बद्ध समझा जाता है। उनका अष्टभुजा स्वरूप, आयुध, अमृतकलश, जपमाला और कमल—सृजन, संरक्षण, साधना और प्रकाश के समन्वय को प्रकट करते हैं। लोकव्युत्पत्ति में “कूष्माण्ड” का सम्बन्ध ब्रह्माण्ड-अण्ड और देवी की सृजनकारी ऊष्मा से जोड़ा जाता है।
काशी में कूष्माण्डा के रूप में पूजित सर्वाधिक प्रसिद्ध स्थल दुर्गाकुण्ड का रक्तवर्णी दुर्गा मन्दिर है। अस्सी के निकट स्थित विशाल कुण्ड, ऊँचा शिखर, लाल प्राकार और सतत चलती पूजा इसे अन्य लघु नवदुर्गा देवालयों से भिन्न बनाते हैं। वर्तमान मन्दिर को सामान्यतः अठारहवीं शती की स्थापत्य-परम्परा से जोड़ा जाता है; इसके संरक्षक और कालविवरण के विषय में भिन्न स्थानीय कथन मिलते हैं, अतः उन्हें निश्चित शिलालेखीय तथ्य समझना उचित नहीं।
देवीभागवत में काशी, राजा सुबाहु, राजकुमारी शशिकला और निर्वासित राजपुत्र सुदर्शन का प्रसंग देवी-भक्ति और नवरात्र-व्रत से जुड़ता है। दुर्गाकुण्ड की स्थानीय स्मृति इस आख्यान को अपने तीर्थ-माहात्म्य के साथ संजोती है। चतुर्थी के दिन श्रद्धालु यहाँ आरोग्य, जीवन-ऊर्जा और अवरुद्ध कार्यों में गति की प्रार्थना करते हैं। कूष्माण्डा का आश्वासन है—जहाँ भीतर प्रकाश उत्पन्न होता है, वहीं से परिस्थितियों का रूपान्तरण आरम्भ होता है।
५. माँ स्कन्दमाता: जैतपुरा में मातृत्व और उत्तरदायित्व
देवसेनापति स्कन्द को अंक में धारण करने वाली माता का पञ्चम रूप बताता है कि शक्ति केवल स्वयं युद्ध करने वाली नहीं; वह सामर्थ्यवान अगली पीढ़ी का निर्माण करने वाली भी है। सिंहवाहिनी देवी के करों में कमल हैं और गोद में बाल-स्कन्द। यहाँ वात्सल्य निर्बल भावुकता नहीं, भविष्य की रक्षा करने वाला उत्तरदायित्व है।
काशी में स्कन्दमाता का देवालय जैतपुरा स्थित बागेश्वरी देवी मन्दिर-परिसर के ऊपरी तल पर है। नीचे बागेश्वरी अथवा स्थानीय परम्परा में अश्वारूढ़ा देवी का स्थान और ऊपर स्कन्दमाता की नियमित पूजा—एक ही परिसर में शक्ति के गतिशील और मातृरूपों को साथ रखती है। पञ्चमी को यहाँ विशेष दर्शन होता है।
माता-पिता, शिक्षक और पालनकर्ता इस रूप से सहज सम्बन्ध अनुभव करते हैं। स्कन्दमाता की उपासना पुत्र-प्राप्ति तक सीमित कर देना उनके तत्त्व को संकुचित करना होगा। उनका व्यापक सन्देश है—जिस जीवन, विचार या प्रतिभा को आपने जन्म दिया है, उसे साहस, मर्यादा और धर्मबुद्धि भी दीजिए। केवल संरक्षण नहीं, समर्थ बनाना ही पूर्ण मातृत्व है।
६. माँ कात्यायनी: आत्मवीरेश्वर में संकल्प की सिंहिनी
कात्यायनी देवी का नाम ऋषि कात्यायन से सम्बद्ध परम्परा में प्रतिष्ठित है। देवीमाहात्म्य के महिषासुरमर्दिनी तत्त्व और नवदुर्गा-पूजन की षष्ठी पर यह रूप धर्मसम्मत प्रतिरोध, निर्णय और कर्म का प्रतीक बनता है। भागवतपुराण में व्रज की कुमारिकाएँ मार्गशीर्ष में कात्यायनी-व्रत करती हैं और प्रार्थना करती हैं—
कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि।
नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः॥
काशी में कात्यायनी का उपासना-स्थान सिंधिया घाट के समीप आत्मवीरेश्वर मन्दिर-परिसर में है। चौक अथवा घाट—दोनों दिशाओं से पहुँचा जा सकता है। स्थानीय तीर्थ-परम्परा इस क्षेत्र को पञ्चमुद्रा महापीठ भी कहती है। षष्ठी के दिन कात्यायनी-दर्शन नवदुर्गा-यात्रा का वह चरण है जहाँ तप और मातृत्व के पश्चात् साधक निर्णय की शक्ति माँगता है।
भारत में कात्यायनी नाम से काशी के बाहर भी अत्यन्त प्रसिद्ध देवालय हैं। दिल्ली का श्री आद्या कात्यायनी शक्तिपीठ, छतरपुर, आधुनिक काल का विशाल मन्दिर-परिसर है और नवरात्र में विशेष रूप से जनसमूह को आकर्षित करता है। वृन्दावन की कात्यायनी-उपासना का आधार भागवत में वर्णित गोपियों का व्रत है; वर्तमान कात्यायनी पीठ उसी ब्रज-स्मृति को जीवित रखता है।
७. माँ कालरात्रि: कालिका वीथि में भय के पार
कालरात्रि का स्वरूप प्रथम दृष्टि में उग्र है—विकसित केश, गहन वर्ण, अग्निमय श्वास और गर्दभ-वाहन। फिर भी उनका एक नाम “शुभङ्करी” है। यह विरोध नहीं, रहस्य है: जो शक्ति असत्य, अन्याय और भय के मूल को नष्ट करती है, वही साधक के लिए परम मङ्गलकारी होती है। कालरात्रि अन्धकार की आराधना नहीं; उस चेतना की उपासना हैं जो अन्धकार से भागती नहीं।
काशी का कालरात्रि देवालय विश्वनाथ वीथि के समानान्तर कालिका वीथि में, दशाश्वमेध क्षेत्र से पैदल पहुँचने योग्य दूरी पर है। यहाँ देवी कालिका रूप में भी पूजित हैं। स्थानीय परम्परा मन्दिर को शक्तिपीठ-सम्मान देती है। सप्तमी को यह स्थान काशी की नवदुर्गा-यात्रा का सातवाँ केन्द्र है।
हर परिवार किसी न किसी रात्रि से होकर जाता है—रोग, वियोग, असफलता, अनिश्चितता अथवा अपने ही मन का भय। कालरात्रि कहती हैं कि आध्यात्मिकता केवल सुखद प्रकाश की भाषा नहीं; वह उस रात्रि में भी साथ बैठने का साहस है जहाँ अभी उत्तर दिखाई नहीं देता। भय मिटना ही कृपा नहीं, भय के मध्य धर्मपूर्वक खड़े रहना भी कृपा है।
८. माँ महागौरी: अन्नपूर्णा के रूप में करुणा का अन्न
महागौरी तप के पश्चात् प्रकट निर्मलता का रूप हैं। श्वेत वृषभ, शान्त मुद्रा और गौर प्रभा भीतर के परिष्कार का संकेत देती है। काशी की यात्रा-परम्परा में नगर की अन्नदात्री माँ अन्नपूर्णा को अष्टमी के दिन महागौरी रूप में पूजा जाता है। इस प्रकार “शुद्धि” को यहाँ केवल देह अथवा वस्त्र की श्वेतता नहीं, भूखे को अन्न देने वाली करुणा के रूप में समझा जाता है।
श्री अन्नपूर्णा मन्दिर काशी विश्वनाथ के समीप विश्वनाथ वीथि में स्थित है। भारत सरकार के पर्यटन-विवरण और वाराणसी की सांस्कृतिक धरोहर परियोजना—दोनों अष्टमी पर अन्नपूर्णा की महागौरी रूप में पूजा का उल्लेख करते हैं। वर्तमान ऐतिहासिक मन्दिर मराठा संरक्षण से जुड़ा है; स्रोत इसके निर्माण-वर्ष को 1725 अथवा 1729 बताते हैं, इसलिए किसी एक वर्ष को निर्विवाद न मानकर अठारहवीं शती का कहना उचित है। नित्य दर्शन की धातु-प्रतिमा से पृथक स्वर्णमयी विग्रह विशेष पर्वकाल में ही दर्शन देता है। अन्नदान इस मन्दिर की केन्द्रीय साधना है।
अन्नपूर्णा-महागौरी का देवालय नवदुर्गा-यात्रा को सामाजिक धर्म से जोड़ता है। साधना यदि पड़ोसी की क्षुधा नहीं देखती, तो उसकी शुचिता अधूरी है। माता के पात्र और कलछी में काशी का एक गहन सिद्धान्त समाया है—अन्न केवल पदार्थ नहीं; जीवन को जीवन द्वारा दिया गया आश्वासन है।
९. माँ सिद्धिदात्री: सिद्धमाता वीथि में पूर्णता का विनय
नवम स्वरूप सिद्धिदात्री हैं—सिद्धियाँ प्रदान करने वाली। पुराणिक परम्परा में अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व जैसी अष्टसिद्धियों का वर्णन मिलता है। किन्तु नवदुर्गा-यात्रा के अन्त में उनका स्थान यह भी स्मरण कराता है कि प्राप्त सामर्थ्य अहंकार के लिए नहीं, लोकमङ्गल के लिए है। सिद्धि तभी पूर्ण है जब वह सेवा में विनीत हो।
काशी में माँ सिद्धिदात्री सिद्धमाता वीथि, सिद्धेश्वरी क्षेत्र में प्रतिष्ठित हैं। परिसर में चन्द्रेश्वर महादेव और चन्द्रकूप की उपस्थिति इस स्थान को संयुक्त शैव-शाक्त तीर्थानुभव देती है। नवमी को श्रद्धालु यहाँ यात्रा पूर्ण करते हैं। स्थानीय श्रद्धा इसे सिद्धपीठ मानती है।
नवमी तक आते-आते साधक ने स्थैर्य, तप, सजगता, सृजन, वात्सल्य, संकल्प, निर्भयता और करुणा के आठ सोपान पार किए हैं। सिद्धिदात्री का अन्तिम प्रश्न है—अब प्राप्त शक्ति का उपयोग किसके लिए होगा? यदि उत्तर केवल “मेरे लिए” है, तो यात्रा अभी पूर्ण नहीं हुई। यदि उत्तर “समष्टि के हित के लिए” है, तभी सिद्धि प्रसाद बनती है।
नौ मन्दिर, एक आन्तरिक यात्रा
काशी की नवदुर्गा-यात्रा का मानचित्र बिखरा हुआ प्रतीत हो सकता है—कहीं उत्तरी घाट, कहीं चौक की वीथियाँ, कहीं दुर्गाकुण्ड, कहीं जैतपुरा। परन्तु आध्यात्मिक क्रम अत्यन्त सुस्पष्ट है:
- शैलपुत्री—आधार और स्थैर्य;
- ब्रह्मचारिणी—अनुशासन और तप;
- चन्द्रघण्टा—सजगता और रक्षा;
- कूष्माण्डा—सृजन और प्राणशक्ति;
- स्कन्दमाता—वात्सल्य और उत्तरदायित्व;
- कात्यायनी—निर्णय और धर्मयुक्त कर्म;
- कालरात्रि—भय का अतिक्रमण;
- महागौरी—परिष्कार और करुणा;
- सिद्धिदात्री—प्राप्ति का लोकमङ्गल में समर्पण।
इसीलिए ये देवालय केवल नौ पृथक पते नहीं हैं। वे मनुष्य की परिपक्वता के नौ पड़ाव हैं। एक में वृषभ की दृढ़ता है, दूसरे में कमण्डलु का संयम; एक में घण्टा की चेतना है, दूसरे में ब्रह्माण्ड की ऊष्मा; कहीं गोद में बालक है, कहीं खड्ग, कहीं रात्रि, कहीं अन्न और अन्त में सिद्धि। एक ही माँ जीवन के प्रत्येक प्रश्न के अनुरूप अपना भाव बदलती हैं।
यदि काशी में नवदुर्गा-यात्रा करनी हो
परम्परागत रूप से प्रत्येक नवरात्र-दिवस पर उसी दिन के देवी-स्वरूप का दर्शन सर्वोत्तम माना जाता है। समयाभाव हो तो स्थानीय मार्गदर्शक के साथ नौ देवालयों का एक-दिवसीय क्रम भी किया जाता है, किन्तु इसे शास्त्रीय अनिवार्यता न समझें। अनेक मन्दिर अत्यन्त संकरी वीथियों में हैं; अंतिम दूरी पैदल चलनी पड़ती है।
दर्शन-समय उत्सव, शृङ्गार और स्थानीय व्यवस्था के अनुसार बदल सकता है। प्रस्थान से पूर्व मन्दिर अथवा स्थानीय धर्मशाला से उसी दिन पुष्टि करें। नवरात्र में प्रातः शीघ्र पहुँचना उपयोगी है। देवालयों की लघुता का सम्मान रखें, चित्रग्रहण से पूर्व अनुमति लें और पुष्प-पत्र ऐसा न छोड़ें जिससे मार्ग अथवा गंगा प्रदूषित हो। यदि कोई विशिष्ट अनुष्ठान, संकल्प अथवा मन्त्र-जप करना हो तो अपने कुलाचार और योग्य आचार्य के निर्देश को प्रधानता दें।
नवदुर्गा के नाम देवीकवच में स्पष्ट क्रम से प्राप्त होते हैं; उनके ध्यानरूप बाद की पूजा-पद्धतियों और क्षेत्रीय परम्पराओं में विकसित दिखाई देते हैं। काशी की नवदुर्गा-यात्रा को स्कन्दपुराण के काशीखण्ड-प्रेरित तीर्थ-माहात्म्य से जोड़ा जाता है।
जब काशी स्वयं देवी का मण्डल बन जाती है
नवमी की संध्या में जब यात्री सिद्धिदात्री से लौटता है, उसके पाँव काशी की धूल से भरे होते हैं। उसने विशाल दुर्गाकुण्ड भी देखा और जाली के पीछे स्थित लघु चन्द्रघण्टा देवालय भी; अन्नपूर्णा के अन्न का भाव भी पाया और कालरात्रि की निर्भय दृष्टि भी। तब समझ में आता है कि मन्दिर की महत्ता केवल उसके शिखर की ऊँचाई में नहीं होती। कभी सम्पूर्ण आध्यात्मिक आकाश एक छोटे गर्भगृह में समा जाता है।
नवदुर्गा की यात्रा अन्ततः देवी को नौ स्थानों में बाँटना नहीं, जीवन के नौ आयामों में एक ही शक्ति को पहचानना है। माँ पर्वत की पुत्री भी हैं, तपस्विनी भी; जननी भी हैं, योद्धा भी; रात्रि भी हैं, गौर प्रभा भी; साधना का लक्ष्य भी और सिद्धि को बाँट देने वाली करुणा भी। काशी इस सत्य को ग्रन्थ के पृष्ठ से उठाकर पगडण्डी, घाट, कुण्ड और जनजीवन में प्रतिष्ठित कर देती है।

