काञ्ची की करुणामयी दृष्टि: कामाक्षी, श्रीचक्र और इच्छा का दिव्य रूपान्तरण

सहस्र मन्दिरों के नगर में एक मातृकेन्द्र

काञ्चीपुरम् में शिव के मन्दिर हैं, विष्णु के दिव्यदेश हैं, जैन और बौद्ध स्मृतियों के चिह्न हैं—किन्तु नगर की आध्यात्मिक धुरी के रूप में माँ कामाक्षी का स्थान विलक्षण है। नगर के मध्य पद्मासनस्थ देवी मानो समस्त दिशाओं को एक करुणामयी दृष्टि से बाँधती हैं। “कामाक्षी”—जिसके नेत्र करुणा से कामनाओं को देखते और उन्हें कल्याण की दिशा देते हैं। प्रचलित व्युत्पत्ति में “का” सरस्वती, “मा” लक्ष्मी और “अक्षी” नेत्र से जोड़े जाते हैं; यह उपासना-परम्परा का सुन्दर संकेत है—ज्ञान और समृद्धि दोनों माता की दृष्टि में समाहित हैं।

देवी का रूप: युद्ध के पश्चात् शान्त अधिष्ठान

काञ्ची कामाक्षी पद्मासन में विराजती हैं। उनके हाथों में पाश, अंकुश, इक्षुधनुष और पुष्पबाण श्रीविद्या की ललिता-त्रिपुरसुन्दरी परम्परा का स्मरण कराते हैं। पाश केवल बन्धन नहीं; प्रेम से जोड़ने वाली शक्ति भी है। अंकुश मन को दिशा देता है। ईख का धनुष मन की मधुर किन्तु चंचल प्रकृति है और पाँच पुष्पबाण इन्द्रिय-विषयों के संकेत हैं। देवी मन और इन्द्रियों को सौन्दर्य, मर्यादा और ईश्वराभिमुखता में रूपान्तरित करती हैं।

यही कामाक्षी का लोकजीवन से गहरा सम्बन्ध है। मनुष्य इच्छा-रहित नहीं जी सकता। प्रश्न यह नहीं कि कामना है या नहीं; प्रश्न यह है कि वह स्वार्थ की आग बनेगी या सेवा, परिवार, कला और साधना की रचनाशक्ति।

श्रीविद्या और श्रीचक्र

काञ्ची कामाक्षी श्रीविद्या उपासना के प्रमुख केन्द्रों में गिनी जाती हैं। श्रीचक्र नौ परस्पर सम्बद्ध त्रिकोणों का सूक्ष्म मण्डल है—शिव और शक्ति, अन्तर्मुखता और अभिव्यक्ति, बिन्दु और विश्व के ऐक्य का रूप। मन्दिर-परम्परा आदिशंकराचार्य को यहाँ श्रीचक्र की प्रतिष्ठा और देवी के उग्र तेज को सौम्य अनुग्रह में व्यवस्थित करने से जोड़ती है।

इस प्रसंग को समझने का श्रेष्ठ मार्ग यह है कि श्रीचक्र ज्यामिति बाहर से भीतर की ओर चलते आवरण साधक की यात्रा हैं—इन्द्रिय-जगत् से हृदय-बिन्दु तक। कामाक्षी के सम्मुख प्रार्थना करते समय भक्त अपनी बिखरी इच्छाओं को उसी केन्द्र की ओर लौटाता है।

भण्डासुर-वध की स्थल-परम्परा

मन्दिर के आधिकारिक स्थल-वृत्त में भण्डासुर से पीड़ित देवताओं की रक्षा के लिए पराशक्ति के कामाक्षी रूप में प्राकट्य और उसके विनाश का वर्णन मिलता है। भण्डासुर की विस्तृत कथा ललितोपाख्यान परम्परा से सम्बद्ध है, जहाँ ललिता महात्रिपुरसुन्दरी देवसेना का नेतृत्व करती हैं। काञ्ची की परम्परा इस विजय को स्थानीय देवी के अधिष्ठान से जोड़ती है।

“भण्ड” का आध्यात्मिक अर्थ उस जड़ संचय से लिया जा सकता है जिसमें शक्ति बन्द हो जाए—ज्ञान संग्रह बन जाए, धन दम्भ बन जाए और सम्बन्ध अधिकार। कामाक्षी उस बन्द शक्ति को पुनः प्रवाहित करती हैं। उनका अंकुश दिशा देता है और पाश प्रेम से जोड़ता है।

कामाक्षी शक्तिपीठ

काञ्चीपुरम् एक प्रमुख शक्तिपीठ और शक्तिस्थल है। अष्टादश शक्तिपीठ स्तोत्र की दक्षिण भारतीय परम्परा में “काञ्चिकापुरे कामाक्षी” अत्यन्त प्रसिद्ध है।

काञ्ची कामाक्षी भारत का महान श्रीविद्या-शक्तिक्षेत्र है।

कामकोटि और कामाक्षी

काञ्ची की धार्मिक स्मृति में कामाक्षी मन्दिर और काञ्ची कामकोटि पीठ का निकट सम्बन्ध है। “कामकोटि” को इच्छाओं की पराकाष्ठा अथवा वह केन्द्र कहा जाता है जहाँ अनन्त कामनाएँ परमकाम—आत्मकल्याण—में लय पाती हैं। परम्परा आदिशंकराचार्य को इस पीठ से जोड़ती है।

उत्सव और जीवित उपासना

नवरात्र, पौष/माघ के पर्व, रथोत्सव और देवी के विविध अलंकार काञ्ची में भक्ति को उत्सव में बदलते हैं। यहाँ देवी कभी बालिका, कभी राजराजेश्वरी, कभी तपस्विनी और कभी अन्नपूर्ण मातृभाव में अनुभव की जाती हैं। दक्षिण भारतीय मन्दिर-सेवा की अनुशासित लय—दीप, नादस्वरम्, मन्त्र, अलंकार और प्रसाद—भक्त को बताती है कि सौन्दर्य स्वयं साधना हो सकता है, यदि उसका केन्द्र अहंकार नहीं, अर्पण हो।

भक्त के जीवन में कामाक्षी

जब मन अनेक इच्छाओं में बिखर जाए, कामाक्षी का स्मरण उपयोगी है। वे इच्छा को अपराध नहीं बनातीं; उसे आँख देती हैं। कौन-सी कामना धर्मसंगत है? कौन-सी किसी दूसरे का अधिकार छीनती है? कौन-सी हमें अधिक उदार बनाएगी? माता की करुणामयी दृष्टि में खड़े होकर मनुष्य अपनी माँगों की परीक्षा कर सकता है। कभी सबसे बड़ा वर किसी इच्छा की पूर्ति नहीं, उससे मुक्ति होता है।

दर्शन की मर्यादा

  • श्रीचक्र अथवा बीजमन्त्र की गूढ़ उपासना स्वयं आरम्भ न करें; योग्य गुरु का निर्देशन आवश्यक है।
  • सामान्य भक्त ललिता सहस्रनाम, देवी स्तुति, नामस्मरण और दीपाराधना कर सकता है।
  • काञ्ची के अन्य प्रमुख शिव-विष्णु मन्दिरों का दर्शन कर नगर की समन्वयी आध्यात्मिकता अनुभव करें।
  • मन्दिर के वस्त्र, छायांकन और गर्भगृह सम्बन्धी नियमों का पालन करें।

उपसंहार: माता की दृष्टि में इच्छा भी साधना बन सकती है

कामाक्षी हमें यह आश्वासन नहीं देतीं कि हमारी प्रत्येक चाह उसी रूप में पूर्ण होगी। उनका वर इससे अधिक गहन है—वे चाहने वाले मन को परिष्कृत करती हैं। उनकी दृष्टि में ज्ञान लक्ष्मी से अलग नहीं, सौन्दर्य संयम से अलग नहीं और प्रेम स्वतंत्रता से अलग नहीं। काञ्ची से लौटता भक्त यदि अपनी एक स्वार्थी इच्छा को सेवा में बदल सके, तो श्रीचक्र का एक आवरण सचमुच उसके भीतर खुल गया।

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