जहाँ प्रतिमा नहीं, अग्नि स्वयं आरती है: कांगड़ा की माँ ज्वालाजी

पर्वत की गोद में जलती हुई प्रार्थना

कांगड़ा की पहाड़ियों के बीच ज्वालामुखी नगर में एक ऐसा गर्भगृह है जहाँ भक्त माता को शिला अथवा मानवीय विग्रह में नहीं, धरती की दरारों से निकलती ज्वालाओं में देखते हैं। दीप यहाँ भक्त नहीं जलाता; मानो धरती स्वयं दीप बनी हुई है। यही माँ ज्वालाजी का प्रथम चमत्कार है—प्रकृति और पूजा के बीच की रेखा मिट जाती है।

शक्तिपीठ-परम्परा में ज्वालामुखी

प्रचलित पीठनिर्णय परम्परा ज्वालामुखी को उन ५१ शक्तिपीठों में मानती है जहाँ सती की जिह्वा गिरी। शक्ति का नाम सिद्धिदा अथवा अम्बिका और भैरव का नाम उन्मत्त मिलता है। “जिह्वा” का संकेत केवल शरीर के अंग का नहीं; वह वाणी, मन्त्र, सत्य और अग्नि का भी प्रतीक है। असत्य बोलने वाली जिह्वा मनुष्य को भीतर से निर्बल करती है, जबकि मन्त्र, सत्य और करुणा से युक्त वाणी जीवन में प्रकाश जगाती है। ज्वालाजी का तीर्थ इसीलिए वाणी-साधना का भी आह्वान है।

देवीमाहात्म्य में देवी अग्नि की एक सीमित लौ मात्र नहीं, समस्त प्राणियों में स्थित चेतना हैं—

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

ज्वालाजी में यह “शक्तिरूपेण संस्थिता” आँखों के सम्मुख प्रकाश बन जाती है।

नौ ज्वालाएँ औ उपासना

मन्दिर-परम्परा गर्भगृह में प्रकट ज्वालाओं को देवी के विविध रूपों से जोड़ती है। भक्त के लिए मूल भाव यह है कि एक ही अग्नि अनेक नामों में पूजित होती है—जैसे एक सूर्य असंख्य जलपात्रों में अलग-अलग प्रतिबिम्ब देते हैं।

नीली-सुनहरी लौ को देखकर मन अनायास मौन हो जाता है। वहाँ भव्य मूर्ति की आवश्यकता नहीं रहती। लौ का स्वभाव ऊपर उठना है; ज्वालाजी मानो मनुष्य को भी स्मरण कराती हैं कि परिस्थिति चाहे धरती से बाँधे, चेतना की दिशा ऊर्ध्व हो सकती है।

राजा भूमिचन्द्र से ध्यानू भक्त तक: परम्परा की कथाएँ

स्थानीय स्थल-परम्परा मन्दिर की खोज और स्थापना को कांगड़ा के एक प्राचीन राजा से जोड़ती है। राजा ने पूर्वजों से सुनी उस दिव्य ज्वाला की खोज कराई और स्थल मिलने पर मन्दिर बनवाया—ऐसा जनश्रुत वर्णन है।

भक्त ध्यानू की कथा उत्तर भारत में विशेष प्रिय है। कहा जाता है कि विशाल यात्री-समूह के साथ जाते समय शासकीय परीक्षा के सामने उसकी श्रद्धा को चुनौती मिली। उसने माता से प्राणपूर्ण प्रार्थना की और देवी ने भक्त की लाज रखी। कथा के संस्करण भिन्न हैं, किन्तु उसका केन्द्र—विपत्ति में अडिग विश्वास है। ध्यानू इसलिए स्मरणीय है कि उसने शक्ति में उसकी भक्ति अडिग थी; संकट में भी उसने समर्पण नहीं छोड़ा।

मुगल सम्राट अकबर द्वारा स्वर्णछत्र अर्पित किए जाने की कथा भी व्यापक लोकपरम्परा का भाग है। मन्दिर का धातु-छत्र उस स्मृति को जीवंत रखता है।

अग्नि: वैदिक स्मृति से मातृ-प्रकाश तक

ऋग्वेद का आरम्भ “अग्निमीळे पुरोहितम्” से होता है। वैदिक यज्ञ में अग्नि देवताओं और मनुष्यों के बीच हवि ले जाने वाले पुरोहित हैं। शाक्त उपासना में वही अग्नि देवी की तेजोमयी सत्ता का संकेत है। अग्नि पदार्थ को बदलती है—कच्चे को पका देती है, अपवित्रता को भस्म करती है, अन्धकार को प्रकाश देती है। साधना में तप भी यही करता है: क्रोध को साहस, वासना को सृजन, आलस्य को कर्म और भय को प्रार्थना में रूपान्तरित करता है।

ज्वालाजी की ज्वाला के सम्मुख बैठना इसलिए केवल दर्शनीय अनुभव नहीं; स्वयं से प्रश्न है—मेरे भीतर कौन-सी अशुद्धि अग्नि को समर्पित होनी चाहिए और कौन-सा सत्य प्रकाश बनकर उठना चाहिए?

आस्था

हिमाचल पर्यटन के आधिकारिक विवरण में इन ज्वालाओं को शैल-विदरों से निकलने वाली प्राकृतिक गैस की अनवरत लौ कहा गया है। विज्ञान ज्वाला की भौतिक प्रक्रिया बताता है; आस्था पूछती है कि मनुष्य उस दृश्य में किस सत्य का अनुभव करता है।

हिमाचल की वादियों में स्थित माँ ज्वालाजी का पावन तीर्थ प्रकृति के रहस्य और सनातन आस्था के संगम का अनुपम उदाहरण है। शताब्दियों से यहाँ बिना किसी लौकिक साधन—तेल या बाती—के अनवरत धधकती नौ ज्योतियाँ वैज्ञानिकों की समझ से परे एक पहेली हैं, जबकि आस्तिक जगत इन्हें माँ भगवती का जाग्रत और प्रत्यक्ष स्वरूप मानकर शीश नवाता है।

नवरात्र में ज्वालाजी

चैत्र और शारदीय नवरात्र में मन्दिर की यात्रा विशेष रूप से बढ़ती है। लाल ध्वज, नारियल, पुष्प और माता के जयकारों से पर्वतीय मार्ग भर उठता है। भक्त दर्शन के साथ कन्या-पूजन, पाठ और दान करते हैं। किन्तु मन्दिर का सबसे बड़ा उपदेश भीड़ के उल्लास से परे गर्भगृह की लौ देती है – अद्भुत प्राकट्य और निरंतरता।

उपसंहार: अपने भीतर की लौ बचाए रखिए

जीवन में ऐसे समय आते हैं जब बाहर का प्रकाश अल्प पड़ता है—शोक, रोग, असफलता अथवा अनिश्चितता सब ओर घिर जाती है। ज्वालाजी कहती हैं कि धरती की कठोर शिला के भीतर से भी अग्नि निकल सकती है। मनुष्य के भीतर भी एक ऐसी लौ है जिसे परिस्थिति पूर्णतः बुझा नहीं सकती। श्रद्धा उसका ईंधन है, सत्य उसकी दिशा और सेवा उसका प्रकाश।

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