कालीघाट और तारापीठ: बंगभूमि में माता के दो द्वार—एक नगर के मध्य, एक महाश्मशान के समीप

दो तीर्थ, दो स्वर, एक ही मातृकरुणा

कोलकाता के स्पन्दित नगर में कालीघाट है—भीड़, घंटा, पुष्प, पुकार और दक्षिणाकाली की तीव्र उपस्थिति। बीरभूम में द्वारका नदी के निकट तारापीठ है—तारा की वात्सल्यमयी किन्तु गूढ़ छवि, वसिष्ठ की साधना की परम्परा और महाश्मशान का वैराग्य। दोनों को एक ही परिच्छेद में समेट देना सरल है, पर उनके तत्त्व भिन्न हैं। कालीघाट काल का सामना कराता है; तारापीठ मृत्यु के बीच मातृ-आश्रय दिखाता है।

प्रथम द्वार: कालीघाट

कालीपीठ की परम्परा

कालीपीठ को कोलकाता के कालीघाट से पहचाना जाता है। यहाँ सती के दाहिने पाँव की अँगुलियाँ गिरीं; शक्ति कालिका और भैरव नकुलेश्वर माने जाते हैं।

काली का रूप प्रथम दृष्टि में उग्र है—कृष्ण वर्ण, विस्तृत जिह्वा, मुण्डमाला और शिव पर स्थित चरण। पर भक्त इस उग्रता में विनाशकारी क्रूरता नहीं, अहंकार-विनाशिनी करुणा देखता है। काल सब कुछ ले जाता है; काली उस काल की भी अधिष्ठात्री हैं। इसलिए उनके चरण में बैठा मनुष्य अपनी नश्वरता से भागना छोड़ता है।

वर्तमान मन्दिर और प्राचीन स्थल-स्मृति

कालीघाट की तीर्थ-स्मृति वर्तमान स्थापत्य से पुरानी है। पन्द्रहवीं-सत्रहवीं शती के बंगाली साहित्य में स्थल के संकेत मिलते हैं; वर्तमान प्रमुख मन्दिर उन्नीसवीं शती के प्रारम्भ, सामान्यतः १८०९ ईस्वी, से जोड़ा जाता है। कोलकाता नगर निगम और मन्दिर के इतिहास-विवरण इसे सावर्ण रायचौधुरी परिवार की परम्परा से सम्बद्ध करते हैं।

मन्दिर की काली-प्रतिमा बंगाल की विशिष्ट दक्षिणाकाली छवि है। विशाल नेत्र और स्वर्णिम जिह्वा भक्त की स्मृति में गहरे उतरते हैं। वे मानो पूछती हैं—क्या तुम्हारी आँखें सत्य देखने को तैयार हैं और क्या तुम्हारी जिह्वा असत्य से लौट सकती है?

नगर-माता का अर्थ

कालीघाट किसी निर्जन पर्वत पर नहीं। व्यापार, यातायात, श्रम, संघर्ष और असमानता से भरे महानगर के बीच माता का मन्दिर है। यह स्थान बताता है कि साधना केवल संसार छोड़ने में नहीं; संसार के तीव्र प्रवाह में विवेक बचाए रखने में भी है। कोलकाता की सांस्कृतिक पहचान, काली-उपासना और लोककला पर कालीघाट का व्यापक प्रभाव है।

दूसरा द्वार: तारापीठ

तारा कौन हैं?

तारा दशमहाविद्याओं में दूसरी महाविद्या मानी जाती हैं। “तारा” का एक अर्थ है—तारने वाली, पार उतारने वाली। उनकी छवि कहीं उग्र, कहीं मातृमयी और कहीं ज्ञानदायिनी है। तारापीठ के गर्भगृह में बाहरी आवरण से सज्जित मूर्ति के भीतर एक प्राचीन शिलारूप से सम्बद्ध मातृ-परम्परा है, जिसमें देवी शिशु शिव को स्तनपान कराती हैं—यह उपासना की अत्यन्त मार्मिक छवि मानी जाती है।

समुद्रमन्थन में हलाहल पीकर अचेत हुए शिव को देवी ने मातृरूप में पोषित किया। इसका भाव स्पष्ट है: जो स्वयं जगत् का आधार है, वह भी माता की गोद में विश्राम पाता है। मनुष्य कितना ही समर्थ क्यों न हो, उसे करुणा की आवश्यकता रहती है।

वसिष्ठ और सिद्धपीठ की कथा

तारापीठ की स्थल-परम्परा महर्षि वसिष्ठ को यहाँ तारा-साधना और सिद्धि से जोड़ती है। कथा के विविध रूप हैं—कहीं उन्हें दूर देश से साधना-विधि प्राप्त होती है, कहीं श्मशान के समीप शिमूल वृक्ष तले देवी का अनुभव। इन विवरणों को तान्त्रिक स्थलपरम्परा के रूप में पढ़ना चाहिए। उनका मूल संदेश है कि ज्ञान केवल बाह्य विधि से नहीं; गुरु, धैर्य और पूर्ण समर्पण से प्रकट होता है।

बामाखेपा: नियम से परे नहीं, प्रेम के भीतर

उन्नीसवीं शती के सिद्ध-साधक बामाखेपा तारापीठ की जीवित स्मृति का अभिन्न भाग हैं। “खेपा” अर्थात् लोकदृष्टि में उन्मत्त; भक्तदृष्टि में माता के प्रेम में आत्मविस्मृत। उनके जीवन से अनेक कथाएँ जुड़ी हैं—भोग को पहले ग्रहण कर लेना, सामाजिक औपचारिकताओं की उपेक्षा और माता से बालक की भाँति वार्ता। ऐतिहासिक व्यक्ति के चारों ओर भक्तिकथा का विस्तार स्वाभाविक है।

बामाखेपा का केन्द्रीय सत्य यह है कि साधना बाहरी प्रतिष्ठा नहीं, हृदय की अनन्यता है। सिद्ध के आचरण को अनुकरण करने से पहले उसके तप, गुरु-दीक्षा और आत्मत्याग को समझना चाहिए।

महाश्मशान: भय के पार माता

तारापीठ का महाश्मशान मन्दिर से अलग होकर भी उसकी आध्यात्मिक पहचान से जुड़ा है। श्मशान वह स्थान है जहाँ पद, रूप, सम्पत्ति और अहंकार की अन्तिम सीमाएँ स्पष्ट होती हैं। तान्त्रिक परम्परा इस नग्न सत्य से भागती नहीं; मृत्यु को माता की व्यापक सत्ता में रखकर देखती है।

सामान्य यात्री को श्मशान में अनुचित जिज्ञासा, छायांकन अथवा गुप्त अनुष्ठानों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। तान्त्रिक साधना अधिकार और गुरु-निर्देशन का विषय है। श्रद्धा का अर्थ सीमा जानना भी है।

तारापीठ सिद्धपीठ

तारापीठ – महान तारा-महाविद्या सिद्धपीठ – तारापीठ को अनेक स्थानीय और आधुनिक सूचियाँ सती के नेत्र अथवा तारक-नेत्र से जोड़कर शक्तिपीठ कहती हैं; पश्चिम बंगाल पर्यटन भी इससे जुड़ी ५१-पीठ की एक प्रसिद्ध कथा का उल्लेख करता है।

कालीघाट और तारापीठ हमें क्या देते हैं?

कालीघाट कहता है—समय से मत भागो; असत्य का सिर काटो। तारापीठ कहता है—मृत्यु से मत डरो; माता की गोद उससे भी बड़ी है। एक नगर के मध्य कर्म का साहस देता है, दूसरा श्मशान के समीप वैराग्य। दोनों मिलकर सम्पूर्ण साधना बनाते हैं—जीवन को पूरे उत्साह से जीना और उसकी अनित्यता को सदैव स्मरण रखना।

यात्रा की मर्यादा

  • तारापीठ के महाश्मशान में मौन, गोपनीयता और स्थानीय मर्यादा का पालन करें।
  • बलि अथवा अन्य संवेदनशील प्रथाओं पर उत्तेजक चित्रण के स्थान पर मन्दिर की वर्तमान अधिकृत व्यवस्था और अपनी नैतिक मर्यादा का पालन करें।
  • माता की आराधना को करुणा, निर्भयता और सत्य में परिणत करें।

उपसंहार: माता काल भी हैं, तारा भी

जब जीवन हमारे बनाए हुए सभी आश्वासनों को तोड़ देता है, तब बंगभूमि के ये दो तीर्थ एक साथ बोलते हैं। काली कहती हैं—जो असत्य है, उसे जाने दो। तारा कहती हैं—जो डरा हुआ है, उसे मेरी गोद में रख दो। एक हाथ अज्ञान काटता है, दूसरा आँसू पोंछता है। यही शक्ति की पूर्णता है।

Discover more from TatvaDhi

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading