आरम्भ: यह केवल मानचित्र नहीं, माता के स्मरण की माला है
हिंगलाज की शैलगुहा से कामाख्या के नीलाचल तक, ज्वालाजी की अनवरत अग्नि से कालीघाट की सघन आराधना तक—भारतीय उपमहाद्वीप में माता के तीर्थ कहाँ नहीं हैं – मानो धरती ने स्वयं शक्ति का मन्त्र लिख दिया हो। इन स्थलों को शक्तिपीठ कहते हैं। प्रत्येक पीठ में देवी का एक नाम है, उनके साथ एक भैरव हैं और किसी नदी, पर्वत, वन, शिला, ज्वाला अथवा नगर से भी उस स्मृति को देखा जाता है।
दक्षयज्ञ में सती के देहत्याग के पश्चात् शोकातुर शिव उनके शरीर को लेकर विचरण करने लगे। सृष्टि की गति सुरक्षित रखने के लिए विष्णु ने सुदर्शन से सती-विग्रह का विभाजन किया; जहाँ-जहाँ अंग अथवा आभूषण गिरे, वहाँ शक्ति का पीठ प्रतिष्ठित हुआ। यह कथा देवी के अनेक स्थानीय रूपों को एक ही आदिशक्ति के सूत्र में पिरोती है। इसका आध्यात्मिक संकेत अत्यन्त मार्मिक है—माता खण्डित नहीं होतीं; वे प्रत्येक खण्ड में पूर्ण रहती हैं।
शक्तिपीठों की संख्या
तान्त्रिक और पौराणिक परम्पराओं में चार आदि-पीठ, अठारह महापीठ, इक्यावन पीठ, बावन पीठ, चौंसठ पीठ और एक सौ आठ देवीस्थानों की गणनाएँ मिलती हैं। देवीभागवत पुराण के सप्तम स्कन्ध में १०८ देवीस्थानों का माहात्म्य मिलता है; ५१ की प्रसिद्ध सूची मुख्यतः पीठनिर्णय अथवा महापीठनिरूपण नाम से प्रसारित तान्त्रिक पाठ-परम्परा से सम्बद्ध मानी जाती है। विभिन्न हस्तलिखित और मुद्रित पाठों में नाम, अंग, शक्ति, भैरव तथा आधुनिक स्थान के विषय में पाठभेद हैं।
अतः “भारत के ५१ शक्तिक्षेत्र” का अर्थ कोई अपरिवर्तनीय सूची नहीं, अपितु एक व्यापक जीवित परम्परा है। ५१ का सम्बन्ध मातृका-वर्णों—शक्ति के बीजस्वरूप अक्षरों—से भी जोड़ा जाता है। वाणी का प्रत्येक अक्षर जिस प्रकार सम्पूर्ण शब्द-जगत् की सम्भावना रखता है, उसी प्रकार प्रत्येक पीठ सम्पूर्ण देवी का आवास माना गया है।
शिव के बिना शक्ति-पीठ पूर्ण क्यों नहीं?
पीठ-परम्परा की विलक्षणता यह है कि प्रत्येक स्थल पर देवी के साथ भैरव का नाम आता है। इसका तात्पर्य केवल एक साथ दो देवताओं की पूजा नहीं है। शक्ति अभिव्यक्ति, सृजन और गति हैं; शिव चेतना, साक्षित्व और आधार हैं। पीठ बताता है कि चेतना और उसकी शक्ति को पृथक् करके जीवन को नहीं समझा जा सकता। इसलिए कामाख्या के साथ उमानन्द, कालीपीठ के साथ नकुलेश्वर और ज्वालामुखी के साथ उन्मत्त भैरव का स्मरण किया जाता है।
सृष्टि के मूल में शिव मौन, अचल और साक्षी भाव रूपी ‘बोध’ हैं, जबकि देवी उस बोध को स्पंदित करने वाली प्राणमयी ‘गति’ हैं।
सती के देह-अंगों के विभिन्न स्थानों पर गिरने से जो तीक्ष्ण और विराट आध्यात्मिक कंपन उत्पन्न हुआ, उसे साधने हेतु महादेव ने प्रत्येक पावन केंद्र पर अपने ‘भैरव’ रूप का आह्वान किया। भैरव उस प्रचंड दैवीय प्रवाह के स्थिर लंगर और रक्षक हैं। इसी कारण हर शक्ति केंद्र पर भैरव की उपस्थिति अपरिहार्य मानी गई है; क्योंकि चेतना के धरातल (भैरव) को छुए बिना शक्ति के गहन प्रवाह को पूर्णतः आत्मसात कर पाना असंभव है।
पीठनिर्णय-परम्परा में प्रचलित ५१ पीठ
नीचे दी गई सूची प्रचलित पीठनिर्णय परम्परा का उपयोगी परिचय है, अन्तिम और निर्विवाद अभिलेख नहीं। जिन स्थलों की आधुनिक पहचान विवादित है, उन्हें स्पष्ट लिखा गया है। क्रम केवल सुविधा के लिए है।
| क्रम | पीठ | आज प्रचलित पहचान | शक्ति |
|---|---|---|---|
| १ | कालीपीठ | कालीघाट, कोलकाता | कालिका |
| २ | किरीट | किरीटकोणा, मुर्शिदाबाद | विमला |
| ३ | बहुला | केतुग्राम, पश्चिम बंगाल | बहुला |
| ४ | उजानी | गुसकरा क्षेत्र, पश्चिम बंगाल | मंगलचण्डिका |
| ५ | युगाद्या | क्षीरग्राम, पश्चिम बंगाल | युगाद्या |
| ६ | अट्टहास | लाभपुर, बीरभूम | फुल्लरा |
| ७ | वक्रेश्वर | वक्रेश्वर, बीरभूम | महिषमर्दिनी |
| ८ | नन्दीपुर | सैंथिया, बीरभूम | नन्दिनी |
| ९ | नलहाटी | नलहाटी, बीरभूम | कालिका |
| १० | काञ्ची | कोपाई-तट, बीरभूम की एक परम्परागत पहचान | देवगर्भा |
| ११ | विभाष | तमलुक, पश्चिम बंगाल | कपालिनी/भीमरूपा |
| १२ | त्रिस्रोता | जलपाईगुड़ी क्षेत्र | भ्रामरी |
| १३ | रत्नावली | हुगली क्षेत्र की परम्परा | कुमारी |
| १४ | कामाख्या | नीलाचल, गुवाहाटी | कामाख्या |
| १५ | जयन्ती | नरतियांग, मेघालय | जयन्ती |
| १६ | त्रिपुरसुन्दरी | माताबाड़ी, उदयपुर, त्रिपुरा | त्रिपुरसुन्दरी |
| १७ | मगध | पटना की पटनदेवी परम्परा | सर्वानन्दकरी |
| १८ | वैद्यनाथ | देवघर, झारखण्ड | जयदुर्गा |
| १९ | उत्कल/विरजा | जाजपुर; विमला की अन्य पाठ-परम्परा पुरी से जुड़ती है | विमला/विरजा |
| २० | प्रयाग | प्रयागराज | ललिता |
| २१ | वाराणसी | विशालाक्षी, मीरघाट | विशालाक्षी |
| २२ | वृन्दावन | भूतेश्वर क्षेत्र, मथुरा | उमा |
| २३ | रामगिरि | चित्रकूट; कुछ पाठ रामटेक कहते हैं | शिवानी |
| २४ | भैरवपर्वत | उज्जैन | अवन्ती |
| २५ | शोणदेश | अमरकण्टक क्षेत्र | नर्मदा |
| २६ | कालमाधव | शोण-तट, अमरकण्टक क्षेत्र; स्थान अनिश्चित | काली |
| २७ | मणिबन्ध | पुष्कर, राजस्थान | गायत्री |
| २८ | विराट | बैराठ क्षेत्र; पहचान विवादित | अम्बिका |
| २९ | कुरुक्षेत्र | भद्रकाली/सावित्री परम्परा | सावित्री |
| ३० | जालन्धर | देवीतालाब, जालन्धर | त्रिपुरमालिनी |
| ३१ | ज्वालामुखी | ज्वालाजी, कांगड़ा | सिद्धिदा/अम्बिका |
| ३२ | महामाया | कश्मीर की परम्परा; पहचान में पाठभेद | महामाया |
| ३३ | प्रभास | सोमनाथ-प्रभास क्षेत्र | चन्द्रभागा |
| ३४ | जनस्थान | गोदावरी-तट, नासिक क्षेत्र | भ्रामरी |
| ३५ | श्रीपर्वत | श्रीशैल; कुछ पाठ अन्य स्थान बताते हैं | श्रीसुन्दरी |
| ३६ | शुचि | शुचीन्द्रम्, तमिलनाडु | नारायणी |
| ३७ | कन्याश्रम | कन्याकुमारी | सर्वाणी |
| ३८ | हिंगलाज | हिंगोल, बलूचिस्तान, पाकिस्तान | कोट्टरी/भैरवी |
| ३९ | करवीर/शिवहरकराय | सिंध की एक परम्परा; करवीर को कोल्हापुर से भी जोड़ा जाता है | महिषमर्दिनी |
| ४० | सुगन्धा | शिकारपुर, बरिशाल, बांग्लादेश | सुनन्दा |
| ४१ | चट्टल | चन्द्रनाथ, सीताकुण्ड, बांग्लादेश | भवानी |
| ४२ | यशोर | ईश्वरपुर, सतखीरा, बांग्लादेश | यशोरेश्वरी |
| ४३ | करतोया/भवानीपुर | बोगुरा क्षेत्र, बांग्लादेश | अपर्णा |
| ४४ | श्रीशैल/श्रीहट्ट | जैंतियापुर-सिलहट परम्परा | महालक्ष्मी |
| ४५ | गुह्येश्वरी | काठमाण्डू, नेपाल | महामाया |
| ४६ | गण्डकी | मुक्तिनाथ-गण्डकी क्षेत्र, नेपाल | गण्डकीचण्डी |
| ४७ | मिथिला | जनकपुर-मिथिला क्षेत्र | उमा |
| ४८ | मानस | मानसरोवर, तिब्बत | दाक्षायणी |
| ४९ | इन्द्राक्षी | नैनातीवु अथवा त्रिंकोमाली, श्रीलंका; पाठभेद | इन्द्राक्षी |
| ५० | कर्णाट | आधुनिक स्थान निश्चित नहीं | जयदुर्गा |
| ५१ | पञ्चसागर | आधुनिक स्थान निश्चित नहीं | वाराही |
पीठयात्रा
तीर्थयात्रा केवल इच्छापूर्ति की सूची लेकर माता के सम्मुख पहुँचना नहीं। वह अपने जीवन के विखण्डित अंशों को पुनः जोड़ने की साधना है। किसी ने मातृभूमि छोड़ी, किसी ने परिवार खोया, कोई रोग से जूझ रहा है, कोई भय से—पीठ का संदेश है कि टूटने के बाद भी चेतना में पूर्णता शेष रहती है। सती की स्मृति जहाँ गिरी, वहाँ पृथ्वी ने उसे विस्मृत नहीं होने दिया।
इसीलिए शक्तिपीठ पर्वतों, नदियों, सीमाओं और आधुनिक राष्ट्रों से परे फैले हैं। कुछ आज भारत में हैं, कुछ पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, तिब्बत और श्रीलंका में। श्रद्धा का यह भूगोल बताता है कि संस्कृति की स्मृति राजनीतिक सीमाओं से कहीं प्राचीन और व्यापक है।
उपसंहार: माता एक हैं, द्वार अनेक
इक्यावन पीठों की सबसे उज्ज्वल शिक्षा संख्या में नहीं, सम्बन्ध में है। कहीं माता शिला हैं, कहीं ज्वाला, कहीं जलसिक्त योनिमुद्रा, कहीं मूर्ति, कहीं केवल नाम और स्मृति। रूप बदलता है; मातृत्व नहीं। जो भक्त एक पीठ पर सिर रखता है, वह वस्तुतः सम्पूर्ण धरती को मातृरूप में प्रणाम करना सीखता है।

