मनुष्य प्रायः धर्म को बाहरी रूपों में खोजता है — व्रत में, यज्ञ में, जप में, शास्त्र-पाठ में, वनवास में, वस्त्रों में, वाणी की कठोरता में और अपने ज्ञान के प्रदर्शन में। पर महाभारत की धर्मव्याध कथा मनुष्य को भीतर तक झकझोरती है। यह कथा बताती है कि धर्म केवल वेद पढ़ लेने से नहीं आता; धर्म तब जागता है जब मनुष्य के भीतर सत्य, संयम, क्षमा, करुणा, मातृ-पितृसेवा और अपने कर्तव्य के प्रति निर्मल निष्ठा जागती है।
वनपर्व में मार्कण्डेय ऋषि धर्मराज युधिष्ठिर से अनेक धर्मकथाएँ कहते हैं। इसी प्रवाह में वे कौशिक नामक एक ब्राह्मण, एक पतिव्रता गृहिणी और मिथिला के धर्मव्याध की कथा सुनाते हैं। यह कथा अत्यन्त सूक्ष्म है, क्योंकि इसमें धर्म किसी राजमहल, आश्रम या यज्ञशाला में नहीं, बल्कि जीवन के सहज कर्मक्षेत्र में प्रकट होता है।
कौशिक ब्राह्मण का तप और अभिमान
कौशिक नामक एक ब्राह्मण था। वह वेदों का अध्ययन करने वाला, तप में रत और धर्मशील माना जाता था। वह वन में एक वृक्ष के नीचे बैठकर वेदपाठ कर रहा था। उसी समय वृक्ष पर बैठी एक बगुली ने उसके ऊपर मल त्याग दिया। ब्राह्मण का मन क्रोध से भर उठा। उसने ऊपर देखा। उसके तप से उत्पन्न तेज और क्रोध की अग्नि से वह बगुली भूमि पर गिर पड़ी और प्राणहीन हो गई।
क्षण भर को कौशिक के भीतर पश्चात्ताप जागा। उसने सोचा — “अरे, मैंने क्रोध में आकर यह क्या कर दिया? एक निरपराध पक्षी मेरे क्रोध से भस्म हो गया।” पर यह पश्चात्ताप अधिक देर न टिक सका।
यहीं से कथा का वास्तविक आरम्भ होता है। तप से तेज तो उत्पन्न हुआ था, पर उस तेज पर विनय का नियन्त्रण नहीं था। ज्ञान था, पर उसके भीतर करुणा और क्षमा अभी पूर्ण नहीं हुए थे। वेद-पाठ था, पर वेद का हृदय अभी जागृत नहीं हुआ था।
गृहस्थ के द्वार पर खड़ा ब्राह्मण
एक दिन भिक्षा का समय हुआ। कौशिक एक गृहस्थ के घर पहुँचा और भिक्षा माँगी। घर की स्त्री पतिव्रता थी। उसी समय उसका पति थका, क्षुधित और श्रान्त अवस्था में घर आया था। उसने पहले पति की सेवा को अपना धर्म माना। उसने पति को आसन दिया, जल दिया, भोजन कराया, उसके श्रम को शान्त किया। इसके बाद उसे स्मरण हुआ कि द्वार पर एक ब्राह्मण भिक्षा की प्रतीक्षा कर रहा है।
वह लज्जित होकर बाहर आई और ब्राह्मण को भिक्षा दी। कौशिक का क्रोध भड़क उठा। उसने तीखे वचन कहे — “तुमने मुझे इतने समय तक क्यों खड़ा रखा? क्या तुम्हें ज्ञात नहीं कि ब्राह्मण अग्नि के समान तेजस्वी होते हैं? देवता भी ब्राह्मणों का सम्मान करते हैं। यदि मैं चाहूँ तो अपने क्रोध से तुम्हें भस्म कर दूँ।”
वह स्त्री हँसी नहीं, घबराई नहीं। वह विनीत थी, पर दुर्बल नहीं। वह धर्म में स्थित थी, अतः उसके भीतर भय नहीं था। उसने शान्त स्वर में कहा — “हे ब्राह्मण! मैं वह बगुली नहीं हूँ जिसे आप क्रोध से भस्म कर देंगे। क्रोध को धर्म मत समझिए। मेरे लिए पति ही परम देवता हैं। वे भूखे और श्रान्त घर आये थे; अतः पहले उनकी सेवा करना मेरा धर्म था। अब मैंने आपको भिक्षा दे दी है।”
इन वचनों ने कौशिक को भीतर तक चौंका दिया। उसने सोचा — इस स्त्री को बगुली की घटना कैसे ज्ञात हुई? यह सामान्य स्त्री नहीं हो सकती।
पतिव्रता का धर्मोपदेश
पतिव्रता ने आगे कहा — “ब्राह्मण पूजनीय हैं, इसमें सन्देह नहीं। उनका तेज अग्नि के समान है, उनका ज्ञान संसार का कल्याण कर सकता है। परन्तु ब्राह्मण का धर्म क्रोध नहीं है। जो क्रोध और मोह के वश में आ जाए, वह धर्म से च्युत हो जाता है। वेद पढ़ना पर्याप्त नहीं; वेद का अर्थ जीवन में धारण करना आवश्यक है।”
उसने कहा — “यदि मनुष्य विनयहीन है तो उसका वेदाध्ययन, उसका तप, उसका वनवास और उसका बाहरी व्रत क्या फल देगा? धर्म वही है जो शिष्ट आचार से जुड़ा हो। जो धर्म करुणा से रिक्त हो, वह धर्म नहीं; वह धर्म के नाम पर अधर्म है।”
पतिव्रता ने कौशिक को समझाया कि धर्म की सूक्ष्मता केवल ग्रन्थों के पठन से नहीं खुलती। धर्म को जानने के लिए अहंकार का त्याग, मन का संयम और जीवन की सत्य परीक्षा आवश्यक है। उसने कहा — “मिथिला में एक धर्मव्याध रहते हैं। वे माता-पिता की सेवा करने वाले, सत्यवादी और जितेन्द्रिय हैं। वे तुम्हें धर्म का यथार्थ मर्म समझाएँगे।”
कौशिक के भीतर लज्जा जागी। उसने उस स्त्री से क्षमा माँगी। उसे अनुभव हुआ कि उसके क्रोध का गर्व टूट रहा है। उसने प्रणाम किया और मिथिला की ओर प्रस्थान किया।
मिथिला में धर्मव्याध
कौशिक अनेक ग्रामों, वनप्रदेशों और सरोवरों को पार करता हुआ मिथिला पहुँचा। उसने वहाँ उस धर्मव्याध को खोजा। उसे एक ऐसे व्यक्ति के रूप में पाया जो मांस-विक्रय से सम्बद्ध कर्म कर रहा था। कौशिक के भीतर संकोच और प्रश्न दोनों उठे — “क्या यही धर्मज्ञ है? क्या धर्म मुझे ऐसे व्यक्ति से सीखना होगा?”
किन्तु धर्मव्याध ने ब्राह्मण को आते ही पहचान लिया। उसने आदरपूर्वक कहा — “हे ब्राह्मण! आपको उस पतिव्रता ने मेरे पास भेजा है। आपका स्वागत है।”
यह सुनकर कौशिक चकित हुआ। महाभारत के वनपर्व के अनुसार, कौशिक को ये दूसरा आश्चर्य हुआ – पहली उस पतिव्रता स्त्री को देखकर – फिर धर्म व्याध को देख कर जो पेशे से कसाई थे – पर जो तत्त्व-ज्ञान में उनसे श्रेष्ठ थे।
धर्मव्याध ने उसे आसन दिया, जल दिया और विनय से बैठाया। उसके व्यवहार में कोई दम्भ न था, कोई हीनता न थी और कोई आडम्बर भी न था। वह अपने कर्म में स्थित था, पर उसके भीतर धर्म का प्रकाश था।
कौशिक ने पूछा — “तुम यह कर्म करते हो; मुझे यह उचित प्रतीत नहीं होता। ऐसे कर्म में धर्म कैसे रह सकता है?”
धर्मव्याध ने उत्तर दिया — “हे ब्राह्मण! यह कर्म मेरी कुलपरम्परा से प्राप्त है। मैं इसे अपने स्वधर्म के रूप में करता हूँ। मैं अपनी सामर्थ्य के अनुसार सत्य बोलता हूँ, दान देता हूँ, देवताओं, अतिथियों, आश्रितों और माता-पिता की सेवा करता हूँ। मैं किसी की निन्दा नहीं करता। मैं लोभ, दम्भ और असत्य से दूर रहने का प्रयत्न करता हूँ। कर्म का बाहरी रूप देखकर त्वरित निर्णय न कीजिए; धर्म का निर्णय मन की स्थिति, आचरण की शुद्धता और कर्तव्यपालन से होता है।”
व्याध ने ब्राह्मण का आदर करते हुए कहा – हे भगवन्, आपसे निवेदन है की मेरे घर चलें क्यूंकि ये स्थान आपके योग्य नहीं है – फिर दोनों धर्मव्याध के घर पहुंचे।
धर्म की सूक्ष्मता
धर्मव्याध ने कौशिक को बताया कि धर्म सूक्ष्म है। उसका निर्णय केवल बाहरी दृष्टि से नहीं हो सकता। कई बार जो कार्य बाहर से छोटा लगता है, वह भीतर से महान हो सकता है; और जो बाहर से महान प्रतीत होता है, वह भीतर से अहंकार से दूषित हो सकता है।
उसने कहा — “यज्ञ, दान, तप, वेदाध्ययन और सत्य — ये पवित्र हैं; पर शिष्टाचार से अलग होकर ये भी अधूरे रह जाते हैं। जो काम, क्रोध, लोभ, दम्भ और कपट को अपने वश में रखता है, वही शिष्ट है। गुरुसेवा, सत्य, अक्रोध और दान — ये ब्राह्मण के गुण हैं। स्वाध्याय और इन्द्रियनिग्रह के बिना ब्राह्मणत्व पूर्ण नहीं होता।”
धर्मव्याध ने कहा — “सत्य धर्म की नींव है। पर सत्य केवल कटु वचन बोल देने का नाम नहीं। सत्य वह है जो धर्म, करुणा और कल्याण से संयुक्त हो। मनुष्य को किसी के प्रति द्वेष नहीं रखना चाहिए। क्षमा, दया, शुचिता, संयम, सरलता और सर्वभूतहित — ये धर्म के प्राण हैं।”
हिंसा और अहिंसा का गूढ़ विचार
“यदि अहिंसा धर्म है तो संसार में जीवन कैसे चले? अन्न उत्पन्न करने में भी अनेक सूक्ष्म प्राणी नष्ट होते हैं। जल, भूमि, वायु, अग्नि — प्रत्येक उपयोग में किसी न किसी रूप में जीवों का स्पर्श होता है।”
धर्मव्याध — “पूर्ण अहिंसा का आदर्श अत्यन्त ऊँचा है। सामान्य मनुष्य जीवनयात्रा में अनजाने अनेक सूक्ष्म जीवों से सम्पर्क करता है। अतः धर्म का अर्थ यह है कि मनुष्य जान-बूझकर क्रूरता न करे, लोभ से प्रेरित होकर प्राणियों को पीड़ा न दे, जितना सम्भव हो उतनी दया रखे और अपने कर्मों को धर्मबुद्धि से शुद्ध करे।”
उसने स्पष्ट किया कि धर्म का मर्म संवेदना में है। मनुष्य का कर्तव्य है कि वह अनावश्यक हिंसा से बचे, दया रखे, लोभ और स्वाद के अधीन न हो, और जो कर्म जीवन की व्यवस्था में मिले हैं, उनमें भी आत्मसंयम तथा प्रायश्चित्त का भाव रखे।
धर्मव्याध के उपदेश में यह गूढ़ता है कि वह जीवन को छोड़कर धर्म नहीं सिखाता; वह जीवन के भीतर धर्म को जागृत करता है। वह कहता है — धर्म संसार से भागने में नहीं, संसार में स्थित होकर मन को निर्मल रखने में है।
कर्मफल और जन्म-मृत्यु का विधान
कौशिक ने कर्म के विषय में भी प्रश्न किये। धर्मव्याध ने कहा — “मनुष्य अपने कर्मों का फल भोगता है। शुभ कर्म सुख का कारण बनते हैं और अशुभ कर्म दुःख का। देह नश्वर है, पर आत्मा सनातन है। शरीर छूटता है, पर कर्मबन्धन से संयुक्त जीव दूसरे देह में जाता है।”
उसने समझाया कि मनुष्य की दशा केवल वर्तमान कर्म से नहीं, पूर्वकृत कर्मों से भी जुड़ी होती है। फिर भी वर्तमान कर्म अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यही मनुष्य को पतन से उन्नति की ओर ले जा सकता है। पश्चात्ताप, सत्य, दान, सेवा, संयम और धर्म में स्थिरता से मनुष्य अपने जीवन को शुद्ध कर सकता है।
धर्मव्याध ने यह भी कहा कि रोग, सुख, दुःख, मान, अपमान, हानि और लाभ — ये सब कर्मक्षेत्र में आते हैं। ज्ञानी मनुष्य इनसे विचलित नहीं होता। वह सुख में उन्मत्त नहीं होता और दुःख में धर्म नहीं छोड़ता।
इन्द्रियनिग्रह और मन की साधना
कौशिक ने पूछा — “इन्द्रियों का निग्रह कैसे हो? मनुष्य विषयों में क्यों फँसता है?”
धर्मव्याध ने उत्तर दिया — “इन्द्रियाँ विषयों की ओर दौड़ती हैं। मन शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध में आसक्त होता है। बार-बार विषयसेवन से आसक्ति बढ़ती है; आसक्ति से लोभ उत्पन्न होता है; लोभ से मोह; मोह से विवेक नष्ट होता है; और विवेक के नाश से मनुष्य धर्म से गिरता है।”
उसने कहा — “जो मनुष्य विषयों के दोष को समझता है, वह उनसे विरक्त होता है। जो मन को बार-बार धर्म की ओर लगाता है, वह धीरे-धीरे इन्द्रियों को वश में कर सकता है। संयम कोई एक दिन का कार्य नहीं; यह निरन्तर अभ्यास है।”
धर्मव्याध ने मनुष्य को सावधान किया कि विद्या, तप, यज्ञ, जन्म, व्रत और बाहरी आचार भी यदि अहंकार को बढ़ाएँ तो वे बन्धन बन सकते हैं। सच्ची साधना अहंकार को घटाती है, करुणा को बढ़ाती है और सेवा को सहज करती है।
गुणत्रय और मनुष्य का स्वभाव
धर्मव्याध ने सत्त्व, रज और तम के विषय में भी कहा। उसने समझाया कि मनुष्य के भीतर तीनों गुण विभिन्न रूपों में कार्य करते हैं। सत्त्व से शान्ति, ज्ञान, धर्मबुद्धि और प्रसन्नता उत्पन्न होती है। रज से इच्छा, चेष्टा, आसक्ति और स्पर्धा जन्म लेती है। तम से आलस्य, मोह, प्रमाद और अज्ञान बढ़ते हैं।
मनुष्य का लक्ष्य सत्त्व की वृद्धि और अन्ततः गुणों से ऊपर उठना है। पर इसके लिए जीवन से पलायन नहीं, बल्कि जागृत आचरण आवश्यक है। शुचिता, सात्त्विक आहार, सत्य, क्षमा, गुरुसेवा, मातृ-पितृसेवा, दान और इन्द्रियनिग्रह से सत्त्व बढ़ता है। क्रोध, लोभ, निन्दा, असत्य, हिंसा और प्रमाद से तम और रज प्रबल होते हैं।
आत्मा, देह और परम तत्त्व
कौशिक ने आत्मा और शरीर के विषय में भी प्रश्न किये। धर्मव्याध ने गूढ़ उत्तर दिया। उसने कहा कि देह पंचमहाभूतों से बनी है। प्राण उसके भीतर गति देता है। अग्नि पाचन करती है। मन संकल्प-विकल्प करता है। बुद्धि निर्णय देती है। अहंकार ‘मैं’ का बोध कराता है। पर इन सबके भीतर जो साक्षी है, वह आत्मा है।
आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है। वह देह के परिवर्तन से नष्ट नहीं होती। जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र त्यागकर नये धारण करता है, वैसे ही जीव कर्मानुसार देह बदलता है। जो इस सत्य को जानता है, वह देह के सुख-दुःख में अत्यधिक आसक्त नहीं होता।
धर्मव्याध ने कहा कि परम तत्त्व इन्द्रियों की पकड़ से परे है। उसे बाहरी चेष्टा से नहीं, शुद्ध बुद्धि, संयम, सत्य और अन्तर्मुख साधना से जाना जाता है। धर्म, ज्ञान और सेवा — ये उस दिशा में ले जाने वाले पथ हैं।
धर्मव्याध का वास्तविक तेज: माता-पिता की सेवा
धर्मव्याध कौशिक को अपने घर ले गया। वहाँ उसके वृद्ध माता-पिता थे। धर्मव्याध ने अत्यन्त श्रद्धा से उनका परिचय कराया। वह उनके चरणों में झुका। उसने उन्हें देवतुल्य मानकर सेवा की।
कौशिक ने देखा कि धर्मव्याध की सारी विद्या, सारी शान्ति, सारी धर्मनिष्ठा का मूल यही सेवा है। वह माता-पिता को स्नान कराता है, उन्हें भोजन देता है, उनके अंग दबाता है, मधुर वचन बोलता है, उनके मन को प्रसन्न रखता है और उन्हें सदा देवता मानता है।
धर्मव्याध ने कहा — “मेरे लिए माता-पिता ही परम देवता हैं। मैं जो भी शुभ करता हूँ, उन्हीं की सेवा से करता हूँ। उनके प्रसन्न होने में ही मेरा धर्म है। जिस प्रकार देवता पूजनीय हैं, उसी प्रकार माता-पिता मनुष्य के प्रत्यक्ष देवता हैं। जो मनुष्य माता-पिता की सेवा करता है, वह महान् तप करता है।”
यहाँ कथा अपने सर्वोच्च बिन्दु पर पहुँचती है। वन में तप करने वाले ब्राह्मण को धर्म का पाठ एक गृहिणी और एक व्याध से मिलता है। वह समझता है कि धर्म केवल ऊँचे आसन पर नहीं बैठता; धर्म वहाँ भी रहता है जहाँ सेवा है, सत्य है, विनय है और कर्तव्य है।
धर्मव्याध का पूर्वजन्म
कौशिक ने धर्मव्याध के ज्ञान से आश्चर्यचकित होकर पूछा कि ऐसा ज्ञान उसे कैसे प्राप्त हुआ। धर्मव्याध ने अपना पूर्ववृत्तान्त कहा।
पूर्वजन्म में वह ब्राह्मण था। वेदज्ञ और धनुर्विद्या में पारंगत भी था। एक बार राजा के साथ वन में गया। वहाँ उसने मृग समझकर बाण छोड़ा। पर वह बाण एक तपस्वी ऋषि को लगा। घायल ऋषि पीड़ा से व्याकुल हुए। धर्मव्याध ने, जो उस जन्म में ब्राह्मण था, उनके चरणों में गिरकर क्षमा माँगी और कहा — “यह अपराध अनजाने में हुआ है।”
ऋषि ने शाप दिया कि उसे व्याधयोनि में जन्म लेना होगा। पर उसके पश्चात्ताप और विनय से प्रसन्न होकर उन्होंने यह भी कहा कि माता-पिता की सेवा से उसे पुनः धर्मज्ञान प्राप्त होगा, पूर्वजन्म का स्मरण रहेगा और अन्ततः उसका कल्याण होगा।
इसी शाप और वर के फलस्वरूप वह वर्तमान जन्म में व्याधकुल में उत्पन्न हुआ, पर भीतर से धर्म में स्थित रहा। उसने अपने कुलगत कर्म को अहंकार या घृणा से नहीं, बल्कि संयम, सत्य और सेवा से शुद्ध किया।
कौशिक की आत्मजागृति
धर्मव्याध के उपदेश ने कौशिक का अभिमान तोड़ दिया। वह समझ गया कि केवल तप से धर्म नहीं आता। केवल शास्त्र-पाठ से अन्तःकरण निर्मल नहीं होता। ब्राह्मणत्व जन्म और पाठ से ऊपर उठकर आचरण में सिद्ध होता है।
धर्मव्याध ने उसे स्मरण कराया कि वह अपने माता-पिता को छोड़कर तप के लिए निकला था। उसके वृद्ध माता-पिता उसके वियोग से दुःखी हैं। यदि वह वास्तव में धर्म चाहता है, तो उसे लौटकर उनकी सेवा करनी चाहिए।
कौशिक ने धर्मव्याध को प्रणाम किया। उसके भीतर अब वह कठोरता न थी जो बगुली को देखकर जागी थी। उसका क्रोध शान्त हो चुका था। अभिमान गल चुका था। वह लौट गया और अपने माता-पिता की सेवा में लग गया।
कथा का धर्मसन्देश
गीता का सार जिन वाक्यों में दिखता है।
धर्मव्याध कथा का मर्म अत्यन्त गहरा है। यह मनुष्य को कई स्तरों पर शिक्षा देती है।
पहली शिक्षा यह है कि क्रोध धर्म का रूप नहीं ले सकता। तपस्वी का क्रोध भी यदि करुणा से रिक्त है, तो वह विनाशकारी है।
दूसरी शिक्षा यह है कि स्त्री का पतिव्रत भारत में आध्यात्मिक शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित है। वह गृहिणी किसी दार्शनिक सभा में नहीं बैठी थी, पर उसकी धर्मनिष्ठा ने उसे ऋषि के समान दृष्टि दी।
तीसरी शिक्षा यह है कि जन्म या व्यवसाय से अधिक महत्त्व आचरण का है। धर्मव्याध बाहर से साधारण कर्म में स्थित था, पर भीतर से सत्य, संयम और सेवा में स्थिर था।
चौथी शिक्षा यह है कि माता-पिता की सेवा महान् तप है। वे प्रत्यक्ष देवता हैं। जो उनके प्रति श्रद्धा, सेवा और कृतज्ञता रखता है, वह धर्म के मूल को छूता है।
पाँचवीं शिक्षा यह है कि धर्म सूक्ष्म है। वह केवल बाहरी शुद्धता नहीं; वह अन्तःकरण की शुद्धता है। वह केवल वचन नहीं; वह व्यवहार है। वह केवल ज्ञान नहीं; वह विनय है। वह केवल व्रत नहीं; वह करुणा है।
आज के जीवन में धर्मव्याध कथा
धर्मव्याध कथा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी प्राचीन काल में थी। आज मनुष्य ज्ञान का प्रदर्शन शीघ्र करता है, पर विनय कठिन लगता है। शब्दों में धर्म सरल है, व्यवहार में कठिन। पूजा सरल है, सेवा कठिन। उपदेश सरल है, अपने क्रोध को रोकना कठिन।
यह कथा कहती है — धर्म को दूर मत खोजो। धर्म उस समय प्रकट होता है जब तुम अपने घर के वृद्धों की सेवा करते हो। धर्म तब प्रकट होता है जब तुम क्रोध के स्थान पर क्षमा चुनते हो। धर्म तब प्रकट होता है जब तुम अपने कर्तव्य को तिरस्कार से नहीं, श्रद्धा से करते हो। धर्म तब प्रकट होता है जब तुम किसी को उसके बाहरी कर्म से नहीं, उसके सत्य और आचरण से परखते हो।
धर्मव्याध की वाणी आज भी यह कहती है — अपने भीतर देखो। क्या तुम्हारा ज्ञान तुम्हें विनीत बना रहा है? क्या तुम्हारा तप तुम्हें करुणामय बना रहा है? क्या तुम्हारी साधना से तुम्हारे माता-पिता, गुरु, अतिथि और आश्रित सुखी हो रहे हैं? यदि नहीं, तो धर्म अभी केवल शब्द है, जीवन नहीं।
आध्यात्मिक उपसंहार
धर्मव्याध कथा महाभारत की उन विलक्षण कथाओं में है जो मनुष्य के अहंकार को धीरे से नहीं, भीतर तक काटती हैं। यह कथा बताती है कि धर्म की दीक्षा कहीं से भी मिल सकती है — एक पतिव्रता गृहिणी से, एक कर्तव्यनिष्ठ व्याध से, एक वृद्ध माता-पिता की सेवा से, या अपने ही पश्चात्ताप से।
धर्म का प्रकाश वंश, वेष और वचन से नहीं; सत्य, संयम और सेवा से प्रकट होता है। जो मनुष्य अपने कर्तव्य को शुद्ध बुद्धि से करता है, माता-पिता को देवतुल्य मानता है, क्रोध को जीतता है और सब प्राणियों के प्रति करुणा रखता है, वही वास्तविक धर्ममार्ग पर चलता है।धर्मव्याध की कथा यही अमर सन्देश देती है —
धर्म दूर नहीं है। वह मनुष्य के अपने कर्म में, अपने घर में, अपने माता-पिता के चरणों में और अपने संयमित हृदय में स्थित है।

