श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 17 – श्रद्धात्रय विभाग योग

श्रद्धा का स्वरूप और धर्म का आन्तरिक रंग

सत्रहवाँ अध्याय श्रीमद्भगवद्गीता के सबसे सूक्ष्म और मनोवैज्ञानिक रूप से गहरे अध्यायों में से एक है। सोलहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने दैवी और आसुरी प्रवृत्तियों का भेद बताया था। वहाँ प्रश्न था—मनुष्य के भीतर कौन-सा चरित्र बन रहा है? वह निर्भयता, शुद्धता, दया और विनय की ओर जा रहा है, या दम्भ, अहंकार, क्रोध और अज्ञान की ओर?

अब सत्रहवाँ अध्याय उस चर्चा को और भीतर ले जाता है। यहाँ प्रश्न केवल यह नहीं कि मनुष्य धार्मिक है या अधार्मिक। प्रश्न इससे भी सूक्ष्म है—उसकी श्रद्धा कैसी है?

बहुत लोग धर्म को खुले रूप से अस्वीकार नहीं करते। वे पूजा करते हैं, दान देते हैं, उपवास रखते हैं, तप करते हैं, अनुशासन निभाते हैं, पवित्र कर्म करते हैं। पर गीता पूछती है—इन सबके भीतर कौन-सी श्रद्धा काम कर रही है? क्या वह शुद्ध, शांत और सत्य से जुड़ी श्रद्धा है? क्या वह इच्छा, प्रदर्शन और परिणाम की भूख से भरी श्रद्धा है? या वह भ्रम, अज्ञान और असंतुलन से ढकी हुई श्रद्धा है?

यही इस अध्याय का केंद्रीय संदेश है—धर्म का बाहरी रूप ही पर्याप्त नहीं। धर्म भी उस आत्मा का रंग ग्रहण कर लेता है जो उसे कर रही है।

अर्जुन का आरम्भिक प्रश्न बहुत विवेकपूर्ण है। वे पूछते हैं—जो लोग शास्त्र-विधि को छोड़कर, पर श्रद्धा से युक्त होकर पूजा करते हैं, उनकी स्थिति क्या है? उनकी श्रद्धा सत्त्व की है, रज की है या तम की?

यह प्रश्न आज भी उतना ही प्रासंगिक है। कई बार मनुष्य ईमानदार होता है, पर सही मापदण्ड से रहित होता है। वह तीव्र होता है, पर सत्य से पूरी तरह जुड़ा नहीं होता। वह धार्मिक उत्साह रखता है, पर विवेक और शास्त्रीय मार्गदर्शन नहीं रखता। गीता इस नाजुक स्थिति को पहचानती है।

हर intensity पवित्र नहीं होती। हर उत्साह सही नहीं होता। हर श्रद्धा शुद्ध नहीं होती। कोई मनुष्य ईमानदार होकर भी भ्रमित हो सकता है। वह sincerely wrong हो सकता है। इसलिए यह अध्याय श्रद्धा की परीक्षा करता है—श्रद्धा किस गुण से रंगी है?

भगवान श्रीकृष्ण उत्तर में अत्यन्त गहरी बात कहते हैं। श्रद्धा तीन प्रकार की होती है—सात्त्विक, राजसिक और तामसिक। यह जीवों की प्रकृति से जन्म लेती है। मनुष्य श्रद्धामय है; जिसकी जैसी श्रद्धा होती है, वह वैसा ही बन जाता है।

यह वाक्य अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। श्रद्धा जीवन की सजावट नहीं है। यह केवल किसी विचार पर औपचारिक सहमति नहीं है। श्रद्धा मनुष्य को आकार देती है। वह उसकी इच्छा, सम्मान, कल्पना, व्यवहार, भय, आकांक्षा और पूजा को दिशा देती है।

मनुष्य भीतर से जिस पर भरोसा करता है, वह धीरे-धीरे उसी जैसा बनने लगता है। जिसे वह ऊँचा मानता है, वैसा बनने का प्रयास करता है। जिसके सामने झुकता है, उसी से उसका मन आकार पाता है। इसलिए श्रद्धा केवल भाव नहीं; आत्मा को गढ़ने वाला सिद्धान्त है।

फिर भगवान बताते हैं कि तीन प्रकार की श्रद्धा पूजा में कैसे व्यक्त होती है। सात्त्विक श्रद्धा स्पष्टता, मर्यादा, शुद्धता और भगवान की ओर उन्मुख होती है। राजसिक श्रद्धा इच्छा, फल, प्रतिष्ठा, महत्वाकांक्षा और दिखावे से प्रभावित होती है। तामसिक श्रद्धा अज्ञान, भ्रम, भय, विकृति और असंतुलन से ढकी होती है।

यहाँ गीता बहुत महत्त्वपूर्ण practical teaching देती है। पूजा केवल इसलिए शुद्ध नहीं हो जाती कि वह तीव्र है। यदि पूजा अहंकार, लोभ, भय, हिंसा या भ्रम से प्रेरित है, तो उसका रूप धार्मिक हो सकता है, पर उसका गुण शुद्ध नहीं होगा।

धार्मिक उत्साह को भी जाँचना होगा। मैं पूजा क्यों कर रहा हूँ? भगवान को पाने के लिए, या लोगों को दिखाने के लिए? मैं दान क्यों दे रहा हूँ? करुणा से, या नाम के लिए? मैं तप क्यों कर रहा हूँ? आत्मशुद्धि के लिए, या अहंकार की विजय-घोषणा के लिए?

सत्रहवाँ अध्याय हमें बताता है कि साधना की गुणवत्ता उसके भीतर की प्रेरणा से तय होती है।

भगवान फिर कठोर तप और भ्रमित austerity पर बहुत महत्त्वपूर्ण चेतावनी देते हैं। वे उन लोगों की निन्दा करते हैं जो शास्त्र-विधि से रहित, दम्भ और अहंकार से प्रेरित, कामना और आसक्ति से भरे हुए, अपने शरीर को पीड़ा देकर और भीतर स्थित परमात्मा को भी कष्ट पहुँचाते हुए कठोर तप करते हैं।

यह शिक्षा अत्यन्त आवश्यक है। हर कठोरता पवित्र नहीं होती। हर कष्ट साधना नहीं होता। हर त्याग शुद्ध नहीं होता। यदि तप अहंकार से है, तो वह आत्मशुद्धि नहीं, आत्म-प्रदर्शन बन सकता है। यदि अनुशासन भ्रम से है, तो वह साधना नहीं, विकृति बन सकता है। यदि शरीर को नष्ट करने में ही धर्म समझा जाए, तो गीता उसे स्वीकार नहीं करती।

सच्चा तप शुद्ध करता है। झूठा तप कठोर बनाता है। सच्चा तप विनम्रता लाता है। झूठा तप अहंकार बढ़ाता है। सच्चा तप भगवान की ओर ले जाता है। झूठा तप स्वयं को ही आध्यात्मिक नायक सिद्ध करने का साधन बन जाता है।

गीता यहाँ साधक को extremity और holiness के भ्रम से बचाती है। बहुत कठोर दिखना हमेशा बहुत पवित्र होना नहीं है। धर्म का अर्थ शरीर, मन और आत्मा को भगवान की दिशा में साधना है, अपने ही भीतर हिंसा पैदा करना नहीं।

इसके बाद अध्याय दैनिक जीवन में उतरता है। भोजन, यज्ञ, तप और दान—सबको तीन गुणों के अनुसार समझाया जाता है। यह गीता का अत्यन्त practical gift है। आध्यात्मिकता केवल दुर्लभ समाधि या ऊँचे दर्शन के क्षणों तक सीमित नहीं। वह खाने में भी आती है, देने में भी आती है, बोलने में भी आती है, अनुशासन में भी आती है, उद्देश्य में भी आती है।

सात्त्विक आहार वह है जो आयु, सत्त्व, बल, आरोग्य, सुख और प्रसन्नता बढ़ाता है—स्वच्छ, रसयुक्त, स्थिर और हृदय को प्रिय। इसका भाव यह है कि भोजन शरीर को साधना का साधन बनाए, उसे जड़ता या उत्तेजना का केंद्र न बनाए।

राजसिक आहार अत्यधिक कड़वा, खट्टा, नमकीन, तीखा, गरम, रूखा और जलन पैदा करने वाला बताया गया है, जो दुःख, शोक और रोग को जन्म देता है। यह आहार केवल स्वाद की तीव्रता का प्रतीक नहीं; यह उस जीवन-दृष्टि का भी संकेत है जो लगातार उत्तेजना चाहती है।

तामसिक आहार बासी, स्वादहीन, दुर्गन्धयुक्त, दूषित और अशुद्ध बताया गया है। यह जड़ता और असावधानी का प्रतीक है। यहाँ गीता केवल भोजन-सूची नहीं बना रही। वह बताती है कि जो हम ग्रहण करते हैं, वह शरीर और मन की गुणवत्ता को प्रभावित करता है।

फिर यज्ञ की बात आती है। सात्त्विक यज्ञ वह है जो शास्त्र-विधि के अनुसार, कर्तव्य समझकर, फल की आकांक्षा छोड़े हुए किया जाए। यहाँ श्रद्धा शुद्ध है। कर्म भगवान को अर्पित है।

राजसिक यज्ञ फल और प्रदर्शन के लिए किया जाता है। “लोग देखें”, “मेरा नाम हो”, “मुझे फल मिले”—यह भावना यज्ञ को राजसिक बना देती है। कर्म धार्मिक है, पर भीतर स्वार्थ बैठा है।

तामसिक यज्ञ शास्त्र-विधि से रहित, अन्नदान से रहित, मन्त्रहीन, श्रद्धाहीन और अनुशासनहीन होता है। उसमें पवित्रता की आत्मा अनुपस्थित होती है।

इसके बाद भगवान तप को तीन स्तरों पर बताते हैं—शरीर का तप, वाणी का तप और मन का तप।

देव, द्विज, गुरु और ज्ञानीजनों का पूजन, शुद्धता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा—ये शरीर का तप हैं।

सत्य, प्रिय, हितकर और ऐसा वचन जो दूसरों को व्याकुल न करे, तथा स्वाध्याय—यह वाणी का तप है। यह शिक्षा आज के जीवन में अत्यन्त आवश्यक है। कठोर सत्य बोल देना ही धर्म नहीं। सत्य भी ऐसा हो जो हितकर हो, मर्यादित हो, और अनावश्यक घाव न दे। वाणी का तप केवल चुप रहना नहीं, सही बोलना है।

मन की प्रसन्नता, सौम्यता, मौन, आत्मसंयम और भाव की शुद्धता—ये मन का तप हैं। यहाँ गीता दिखाती है कि साधना केवल बाहर नहीं। मन का ताप, मन की कठोरता, मन का द्वेष भी तप से शुद्ध होना चाहिए।

जब ये तप श्रद्धा से, फल की इच्छा छोड़े हुए, स्थिरता से किया जाए, तो वह सात्त्विक है। जब यह मान, सम्मान और पूजा पाने के लिए किया जाए, तो राजसिक है। जब यह मूढ़ता से, स्वयं को या दूसरों को पीड़ा देने के लिए किया जाए, तो तामसिक है।

दान भी ऐसा ही है। सात्त्विक दान वह है जो योग्य स्थान, योग्य समय और योग्य व्यक्ति को, प्रत्युपकार की आशा छोड़े हुए, कर्तव्य और करुणा से दिया जाए।

राजसिक दान फल, प्रत्युपकार या मन में अनिच्छा रखते हुए दिया जाता है। बाहर से दान है, भीतर हिसाब है।

तामसिक दान अनुचित स्थान, अनुचित समय, अयोग्य व्यक्ति को, अपमान से या असम्मान के साथ दिया जाता है। यहाँ गीता बताती है कि दान की वस्तु से अधिक दान की चेतना महत्त्वपूर्ण है।

इस प्रकार सत्रहवाँ अध्याय धर्म को जीवन की छोटी-छोटी क्रियाओं तक ले आता है। क्या खा रहे हो? क्यों दे रहे हो? कैसे बोल रहे हो? तप क्यों कर रहे हो? पूजा किस भाव से कर रहे हो?

धर्म केवल मंदिर में नहीं। धर्म रसोई में भी है। वाणी में भी है। दान के भाव में भी है। शरीर के अनुशासन में भी है। मन की शुद्धता में भी है।

अध्याय के अंत में भगवान “ॐ तत् सत्” की महान सूत्र-त्रयी बताते हैं। यह केवल कोई ceremonial phrase नहीं है। यह पवित्र जीवन की सही दिशा बताने वाला मंत्र है।

“ॐ” — यह परम ब्रह्म का स्मरण है। यह कर्म को Divine Root से जोड़ता है। जब पवित्र कर्म “ॐ” की भावना से होता है, तो वह केवल निजी कर्म नहीं रहता; वह भगवान की स्मृति में स्थापित होता है।

“तत्” — अर्थात् “वह”, परम सत्य, भगवान। यह अहंकार से मुक्त करता है। कर्म मेरे लिए नहीं, मेरे नाम के लिए नहीं, मेरे स्वामित्व के लिए नहीं—“तत्”, उस परम के लिए। यह कर्म को निजी कब्जे से मुक्त करता है।

“सत्” — सत्य, शुभ, अस्तित्व, पवित्रता, स्थिरता। जो सत्य में है, जो भगवान की दिशा में है, जो शुभ है, जो धर्मपूर्ण है—वह सत् है।

इस प्रकार “ॐ तत् सत्” धर्म को तीन गुणों की सीमाओं से ऊपर उठाने की दिशा देता है। कर्म का आधार Divine हो, स्वामित्व भगवान को अर्पित हो, और उसका स्वरूप सत्य में स्थित हो। यही sacred life की सही orientation है।

अध्याय का अंतिम वचन अत्यन्त गंभीर है। श्रद्धा के बिना किया गया यज्ञ, दान, तप या कोई भी कर्म असत् है। वह न इस लोक में फल देता है, न परलोक में।

यह अध्याय फिर अपने मूल सत्य पर लौटता है—कर्म का बाहरी रूप पर्याप्त नहीं। आत्मा का भाव महत्त्वपूर्ण है। श्रद्धा महत्त्वपूर्ण है। सत्य महत्त्वपूर्ण है। धर्म की आन्तरिक गुणवत्ता महत्त्वपूर्ण है।

सत्रहवाँ अध्याय हमें सिखाता है कि श्रद्धा केवल इसलिए पवित्र नहीं हो जाती कि वह श्रद्धा है। उसे शुद्ध होना होगा। साधक को केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि क्या मैं विश्वास करता हूँ। उसे यह भी पूछना चाहिए—मेरे विश्वास को कौन-सा गुण चला रहा है?

क्या मेरी पूजा सत्त्व से है या इच्छा से? क्या मेरा दान करुणा से है या प्रतिष्ठा से? क्या मेरा तप शुद्धि के लिए है या अहंकार के लिए? क्या मेरी वाणी सत्य और हितकारी है या तीखी और आत्म-प्रदर्शक? क्या मेरा धर्म भगवान की ओर जा रहा है या मेरी अपनी छवि को बड़ा कर रहा है?

यही इस अध्याय की तपती हुई परन्तु करुणामय शिक्षा है। यह साधक को धर्म के भीतर भी जागरूक बनाती है। क्योंकि धर्म का रूप हो सकता है, पर धर्म का भाव खो सकता है। पूजा हो सकती है, पर समर्पण न हो। दान हो सकता है, पर दया न हो। तप हो सकता है, पर अहंकार छिपा हो।

गीता कहती है—भीतर देखो। श्रद्धा को शुद्ध करो। कर्म को “ॐ तत् सत्” की दिशा दो। धर्म को भगवान का मार्ग बनाओ, स्वयं के प्रदर्शन का मंच नहीं।

पहले अध्याय में अर्जुन शोक से टूटे थे। दूसरे में आत्मा का ज्ञान मिला। तीसरे में कर्म यज्ञ बना। चौथे में ज्ञान की अग्नि और अवतार रहस्य आया। पाँचवें में कर्म के भीतर संन्यास बताया गया। छठे में मन को साधना सिखाया गया। सातवें में भगवान की प्रकृति और माया का रहस्य खुला। आठवें में अंतिम स्मरण की शिक्षा मिली। नौवें में राजविद्या और राजगुह्य भक्ति का मधुर रहस्य आया। दसवें में विभूतियों से संसार भगवान-स्मरण की पाठशाला बना। ग्यारहवें में विश्वरूप दर्शन हुआ। बारहवें में भक्ति का जीने योग्य मार्ग सामने आया। तेरहवें में क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का विवेक मिला। चौदहवें में गुणों का बंधन समझाया गया। पंद्रहवें में पुरुषोत्तम का दिव्य सत्य प्रकट हुआ। सोलहवें में दैवी और आसुरी स्वभाव का भेद खुला। सत्रहवें अध्याय में गीता अब धर्म के भीतर की गुणवत्ता को जाँचती है—श्रद्धा किस गुण से रंगी है?

यह अध्याय साधक से कहता है—केवल धार्मिक मत बनो; शुद्ध श्रद्धावान बनो। केवल कर्म मत करो; सही भाव से करो। केवल दान मत दो; सम्मान और करुणा से दो। केवल तप मत करो; अहंकार छोड़े हुए करो। केवल बोलो मत; सत्य, प्रिय और हितकर बोलो। और हर पवित्र कर्म को “ॐ तत् सत्” की दिशा में अर्पित करो।

यही श्रद्धात्रय विभाग योग का दिव्य और अत्यन्त व्यावहारिक संदेश है।

अध्याय 18 की ओर

जब श्रद्धा स्वयं तीन गुणों के रंग में परखी जा चुकी, तब गीता अपने अंतिम कार्य के लिए तैयार होती है। अब संपूर्ण शिक्षा को एक साथ समेटना है—कर्म, संन्यास, त्याग, ज्ञान, गुण, कर्तव्य, भक्ति और परम शरणागति।

अठारहवाँ अध्याय इसी महान synthesis को पूर्ण करेगा। वहाँ भगवान श्रीकृष्ण गीता की समूची शिक्षा को अंतिम निर्णय, अंतिम आह्वान और अंतिम करुणा में समेटेंगे।

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