Hindu priest conducting puja ritual before illuminated goddess statue surrounded by devotees

अधिक मास: चंद्र-सौर पंचांग का अद्भुत संतुलन और पुरुषोत्तम साधना का पवित्र समय

अधिक मास हिन्दू पंचांग का एक अत्यन्त विशेष महीना है। इसे मलमास और पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। यह केवल पंचांग में जोड़ा गया अतिरिक्त महीना नहीं है, बल्कि भारतीय कालगणना की उस गहरी समझ का उदाहरण है जिसमें चंद्रमा, सूर्य, ऋतु, पर्व और आध्यात्मिक जीवन—सबका संतुलन ध्यान में रखा गया है।

सरल शब्दों में कहें तो अधिक मास वह महीना है जो चंद्र-सौर पंचांग को प्रकृति और ऋतु-चक्र के साथ संतुलित रखने के लिए आता है। हिन्दू पंचांग केवल चंद्रमा पर आधारित नहीं है और केवल सूर्य पर भी आधारित नहीं है। यह चंद्र-सौर पंचांग है, यानी इसमें चंद्रमा की गति से महीनों की गणना होती है और सूर्य की गति से ऋतु और संक्रांति का तालमेल देखा जाता है।

सौर वर्ष लगभग 365 दिन और 6 घंटे का होता है, जबकि 12 चंद्र महीनों का वर्ष लगभग 354 दिनों का माना जाता है। इस प्रकार सौर वर्ष और चंद्र वर्ष के बीच हर वर्ष लगभग 11 दिनों का अन्तर आ जाता है। यदि इस अंतर को ठीक न किया जाए, तो दीपावली, होली, नवरात्र, रक्षाबंधन जैसे पर्व धीरे-धीरे ऋतुओं से खिसकने लगेंगे। कुछ वर्षों बाद वे अपने प्राकृतिक मौसम से मेल नहीं खाएँगे।

इसी अंतर को संतुलित करने के लिए लगभग 32.5 महीने, यानी लगभग 2 वर्ष 8 महीने के बाद एक अतिरिक्त चंद्र मास जोड़ा जाता है। इसी को अधिक मास कहा जाता है। पर अधिक मास केवल गणितीय जोड़ नहीं है। इसकी पहचान का एक मुख्य पंचांग-नियम यह है कि जिस चंद्र मास में सूर्य की कोई संक्रांति नहीं होती—अर्थात् सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश नहीं करता—वह मास अधिक मास माना जाता है।

इसी कारण अधिक मास को कभी-कभी मलमास भी कहा गया। “मल” शब्द को यहाँ केवल नकारात्मक अर्थ में नहीं लेना चाहिए। परम्परा में चूँकि इस मास में संक्रांति नहीं होती, इसलिए इसे सामान्य लौकिक मांगलिक संस्कारों—जैसे विवाह, गृहप्रवेश, मुंडन आदि—के लिए ग्रहण नहीं किया गया। लोक-प्रयोग में इसी कारण इसे मलमास कहा जाने लगा।

पर भारतीय धर्म-परम्परा की विशेषता यह है कि जिस समय को लौकिक कार्यों से विराम दिया गया, उसे आध्यात्मिक साधना के लिए श्रेष्ठ बना दिया गया। इसलिए अधिक मास वैष्णव परम्परा में अत्यन्त पवित्र माना गया और इसे पुरुषोत्तम मास कहा गया।

पुरुषोत्तम भगवान विष्णु का एक परम पावन नाम है। पौराणिक परम्परा के अनुसार, जब यह अतिरिक्त मास उपेक्षित माना जाने लगा, तब भगवान विष्णु ने इसे अपना नाम देकर उसका महत्त्व स्थापित किया। इसलिए यह मास केवल “अधिक” नहीं रहा; यह पुरुषोत्तम मास बन गया—भगवान की उपासना, आत्मशुद्धि और साधना का विशेष अवसर।

धार्मिक दृष्टि से अधिक मास जप, तप, दान, व्रत, पाठ, कथा, ध्यान और भगवान विष्णु/श्रीकृष्ण की भक्ति के लिए अत्यन्त फलदायी माना जाता है। इस मास में श्रीमद्भगवद्गीताश्रीमद्भागवतविष्णु सहस्रनामपुरुषोत्तम मास माहात्म्य और भगवान के नाम-जप का विशेष महत्त्व बताया गया है।

इस मास में साधक प्रायः सात्त्विक आहार, संयमित दिनचर्या, नाम-जप, दीपदान, अन्नदान, वस्त्रदान, गौसेवा, तुलसी-पूजन और भगवान श्रीविष्णु या श्रीकृष्ण की उपासना करते हैं। “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” जैसे मंत्रों का जाप, हरिनाम-स्मरण, भजन और पाठ इस समय विशेष रूप से शुभ माने जाते हैं।

अधिक मास का एक गहरा संदेश यह भी है कि मनुष्य समय-समय पर अपनी भौतिक दौड़ से विराम ले। जीवन केवल कमाने, बनाने, खरीदने और आगे बढ़ते रहने का नाम नहीं है। कभी-कभी समय स्वयं मनुष्य को रोकता है और कहता है—भीतर लौटो, अपने कर्मों को देखो, अपने मन को शुद्ध करो, भगवान को स्मरण करो।

इसीलिए इस मास में विवाह, गृहप्रवेश, नए बड़े व्यावसायिक आरम्भ या अन्य लौकिक मांगलिक कार्य सामान्यतः टाले जाते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि यह महीना अशुभ है। सही समझ यह है कि यह महीना आध्यात्मिक कार्यों के लिए अत्यन्त शुभ और लौकिक मांगलिक कार्यों से विराम का समय माना गया है।

अधिक मास हमें बताता है कि भारतीय पंचांग केवल तिथियों की गणना नहीं है। यह आकाश, ऋतु, धर्म, मनुष्य और ईश्वर के बीच का संतुलित संवाद है। यह महीना प्रकृति के काल-चक्र को ठीक करता है और मनुष्य को अपने भीतर के चक्र को भी ठीक करने का अवसर देता है।

एक पंक्ति में कहें तो—अधिक मास चंद्र-सौर पंचांग को ऋतु-चक्र से जोड़ने का अद्भुत खगोलीय उपाय है, और साधक को भगवान पुरुषोत्तम की शरण में लौटने का पवित्र आध्यात्मिक अवसर भी।

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