उल्टा अश्वत्थ वृक्ष और परम पुरुष का दिव्य रहस्य
पंद्रहवाँ अध्याय श्रीमद्भगवद्गीता के सबसे संक्षिप्त, पर अत्यन्त प्रकाशमान अध्यायों में से एक है। यह आकार में छोटा है, पर अर्थ में बहुत विशाल। चौदहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया था कि प्रकृति सत्त्व, रज और तम—इन तीन गुणों के माध्यम से आत्मा को कैसे बाँधती है। अब पंद्रहवाँ अध्याय उस बंधे हुए अस्तित्व की पूरी रचना को एक अद्भुत प्रतीक के माध्यम से सामने रखता है।
यह अध्याय तर्क से नहीं, प्रतीक से आरम्भ होता है—ऊपर जड़ और नीचे शाखाओं वाले अश्वत्थ वृक्ष से (पीपल का पेड़)।
यह उल्टा वृक्ष संसार के बंधन का अत्यन्त शक्तिशाली चित्र है। इसकी जड़ ऊपर है, शाखाएँ नीचे फैली हैं, और यह गुणों से पोषित होता है। इस एक चित्र में गीता संसार के बारे में बहुत गहरी बात कह देती है। जो नीचे फैला हुआ दिखाई देता है, वह अपने आप खड़ा नहीं है। उसका स्रोत उसके ऊपर, उससे परे, उससे श्रेष्ठ है। संसार स्वयं अपना आधार नहीं है।
पर यही वृक्ष बाँधता भी है। इसकी नीचे की जड़ें कर्म के क्षेत्र में फैलती हैं। वे मनुष्य को इच्छाओं, संस्कारों, कर्मफलों और पुनः-पुनः जन्म लेने वाली आसक्तियों में उलझाती हैं। इसलिए यह संसार एक साथ दो बातों को प्रकट करता है—यह अर्थहीन नहीं है, क्योंकि इसका स्रोत ऊपर है; पर यह अंतिम घर भी नहीं है, क्योंकि इसमें बंधन है।
संसार को केवल तुच्छ समझना भी भूल है, और संसार को अंतिम सत्य समझ लेना भी भूल है। यह Divine Source पर निर्भर है, पर आत्मा के लिए अंतिम विश्रामस्थल नहीं है। यही पंद्रहवें अध्याय की आरम्भिक सूक्ष्मता है।
फिर अध्याय एक कठिन, पर अत्यन्त आवश्यक सत्य कहता है। इस वृक्ष का वास्तविक रूप, उसका आदि, उसका अंत और उसका पूर्ण आधार इस बंधे हुए दृष्टिकोण से पूरी तरह नहीं जाना जा सकता। जो स्वयं बंधन के भीतर खड़ा है, वह बंधन की पूरी रचना को केवल बुद्धि से नाप नहीं सकता।
यहाँ गीता साधक को विनम्र बनाती है। जिज्ञासा महत्त्वपूर्ण है, पर केवल जिज्ञासा मुक्ति नहीं देती। विश्लेषण आवश्यक है, पर विश्लेषण अकेला बंधन नहीं काटता। इसलिए अध्याय का पहला आदेश है—इस वृक्ष को असंगता की दृढ़ कुल्हाड़ी से काटो।
यह बहुत निर्णायक शिक्षा है। किसी बिंदु पर आत्मा को पकड़ छोड़नी ही पड़ती है। मनुष्य सब समझना चाहता है, पर छोड़ना नहीं चाहता। वह संसार का विश्लेषण करता है, पर उससे चिपका भी रहता है। गीता कहती है—समझो, पर केवल समझने में मत रुको। बंधन को पहचानो, फिर उसे काटने का साहस करो।
यह काटना संसार से घृणा नहीं है। यह आसक्ति से मुक्ति है। यह जिम्मेदारी छोड़ना नहीं है। यह स्वामित्व की जड़ काटना है। यह जीवन से भागना नहीं है। यह जीवन को अंतिम मान लेने की भूल से बाहर आना है।
जब यह काटना आरम्भ होता है, तब आत्मा को उस परम पद की ओर मुड़ना है जहाँ पहुँचकर लौटना नहीं पड़ता। उस आदिपुरुष की शरण में जाना है, जिससे यह प्राचीन प्रवाह निकला है। अध्याय का प्रवाह स्पष्ट है—उलझन से पारगमन की ओर, बंधन से परम आश्रय की ओर, संसार-वृक्ष से पुरुषोत्तम की ओर।
संसार-वृक्ष की पूजा अंतिम सत्य की तरह नहीं करनी है। उसे समझना है। उससे गुजरना है। उससे सीखना है। पर अंततः उससे ऊपर उठना है।
इसके बाद भगवान जीवों के बारे में बहुत कोमल वचन कहते हैं। वे कहते हैं कि जीवात्माएँ उनका सनातन अंश हैं, पर प्रकृति में स्थित होकर मन और छह इन्द्रियों के साथ संघर्ष करती हैं।
यह वचन dignity और distress—गरिमा और पीड़ा—दोनों को एक साथ संभालता है। आत्मा कोई जड़ पदार्थ की उपज नहीं है। वह भगवान से सम्बन्धित सनातन तत्त्व है। उसमें दिव्य मूल का संकेत है। पर वह संघर्ष कर रही है। मन से, इन्द्रियों से, इच्छा से, आसक्ति से, प्रकृति के आकर्षण से।
गीता आत्मा का अपमान नहीं करती। वह यह नहीं कहती कि जीव तुच्छ है। पर वह उसकी वर्तमान अवस्था को romantic भी नहीं करती। जीव भगवान का सनातन अंश है, पर जब तक वह भगवान की ओर नहीं लौटता, तब तक संघर्ष में है।
यह मनुष्य की बहुत वास्तविक स्थिति है। हम भीतर से ऊँचे की ओर खिंचते हैं, पर इन्द्रियाँ नीचे खींचती हैं। मन भगवान को याद करना चाहता है, पर विषयों में भटकता है। बुद्धि जानती है कि क्या स्थायी है, पर इच्छा क्षणिक सुखों की ओर दौड़ती है। यही जीव का संघर्ष है।
फिर भगवान देहांतरण का वर्णन करते हैं। जैसे वायु फूलों से गन्ध लेकर चलती है, वैसे ही जीवात्मा एक शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर में जाते समय मन और इन्द्रियों के संस्कारों को साथ ले जाती है।
यह rebirth की शिक्षा है, पर यहाँ वह अकेली doctrine की तरह नहीं आती। इसे अश्वत्थ वृक्ष और जीव की लंबी wandering के व्यापक परिप्रेक्ष्य में रखा गया है। आत्मा देह बदलती है, पर उसके संस्कार, उसकी प्रवृत्तियाँ, उसका मनो-सूक्ष्म बोझ यात्रा में साथ रहते हैं। अज्ञानी इसे नहीं देख पाते। ज्ञान-चक्षु वाले इसे समझते हैं।
इससे जीवन के प्रति जिम्मेदारी बढ़ती है। कोई भी कर्म खोता नहीं। कोई भी आदत केवल क्षणिक नहीं। कोई भी गहरी आसक्ति केवल एक दिन की बात नहीं। मनुष्य अपने भीतर जो बनाता है, वह आगे की यात्रा में प्रभाव डालता है। इसलिए गीता बार-बार कहती है—स्मरण करो, विवेक रखो, आसक्ति काटो, भगवान की ओर मुड़ो।
अध्याय का मध्य भाग अत्यन्त सुन्दर और devotional warmth से भरा हुआ है। भगवान कहते हैं कि सूर्य में जो तेज है, चन्द्रमा में जो शीतल प्रकाश है, अग्नि में जो चमक है—वह उनका तेज है। वे पृथ्वी में प्रवेश करके प्राणियों को धारण करते हैं। वे सोमरूप होकर औषधियों और वनस्पतियों को पोषित करते हैं। वे वैश्वानर अग्नि बनकर जीवों के शरीर में भोजन पचाते हैं। वे सबके हृदय में स्थित हैं, और स्मृति, ज्ञान तथा अपोहन—अर्थात् भूलने की शक्ति—भी उन्हीं से आती है।
यह theology बहुत संक्षिप्त है, पर अत्यन्त गहरी है। भगवान संसार-वृक्ष से परे हैं, पर संसार के भीतर अनुपस्थित नहीं। वे केवल मृत्यु के बाद प्राप्त होने वाले धाम नहीं हैं। वे अभी जीवन की सूक्ष्म प्रक्रियाओं में भी उपस्थित हैं।
सूर्य का प्रकाश। चन्द्रमा की शीतलता। पृथ्वी की धारण-शक्ति। पौधों का पोषण। शरीर के भीतर भोजन पचने की अदृश्य प्रक्रिया। स्मरण। ज्ञान। भूलने की क्षमता। विचार का उठना। यह सब भगवान की व्यवस्था से बाहर नहीं है।
यहाँ पंद्रहवाँ अध्याय विशेष रूप से भक्तिपूर्ण हो उठता है। साधक को सिखाया जाता है कि भगवान को केवल संसार से परे न खोजो; उन्हें संसार को धारण करने वाली प्रत्येक गहरी प्रक्रिया में भी पहचानो।
जब अन्न खाया जाए, तो स्मरण रहे कि पाचन तक में दिव्य व्यवस्था है। जब ज्ञान उदित हो, तो गर्व न हो; वह भी भगवान की देन है। जब स्मृति लौटे, तो कृतज्ञता हो। जब विस्मृति भी हो, तो समझो कि जीवन केवल मेरी निजी बुद्धि से नहीं चल रहा। भगवान भीतर भी हैं, बाहर भी हैं, पार भी हैं।
यही इस अध्याय का मधुर संतुलन है। संसार से अनासक्ति रखो, पर संसार में भगवान की उपस्थिति को नकारो मत। वृक्ष को काटो, पर उस परम जड़ को पहचानो जिससे सब जीवन धारण है।
फिर अध्याय अपने theological शिखर पर पहुँचता है—क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम का भेद।
क्षर वह है जो बदलता है—सारा नश्वर जगत, शरीर, रूप, नाम, परिवर्तन, उत्पत्ति और विनाश के क्षेत्र। यह embodied existence का बदलता हुआ संसार है।
अक्षर वह है जो क्षर से परे स्थिर चेतन सिद्धान्त के रूप में जाना जाता है। वह नश्वर रूपों के समान नहीं है। पर भगवान कहते हैं कि इन दोनों से भी परे एक उत्तम पुरुष है—परमात्मा, जो तीनों लोकों में प्रवेश करके उन्हें धारण करता है। वही अविनाशी ईश्वर है।
क्योंकि वे क्षर से भी परे हैं और अक्षर से भी उत्तम हैं, इसलिए वे पुरुषोत्तम कहलाते हैं—Supreme Person, परम पुरुष।
यह गीता का अत्यन्त अंतिम और निर्णायक theological उद्घाटन है। श्रीकृष्ण किसी ज्ञात श्रेणी के भीतर केवल सबसे ऊँचे उदाहरण नहीं हैं। वे श्रेणियों को भी पार करने वाले हैं। वे परिवर्तनशील जगत से भी परे हैं और निम्न अक्षर स्थिरता से भी ऊपर हैं। वे जगत में प्रवेश करके उसे धारण करते हैं, पर जगत में सीमित नहीं हो जाते।
जो उन्हें पुरुषोत्तम के रूप में जानता है, वह सचमुच जानता है। ऐसा ज्ञान केवल दार्शनिक निष्कर्ष नहीं रहता; वह पूर्ण हृदय से उपासना में खिलता है।
यहाँ ज्ञान फिर भक्ति बन जाता है। जब साधक समझता है कि भगवान ही क्षर से परे, अक्षर से परे, सबको धारण करने वाले परम पुरुष हैं, तब उसका प्रणाम गहरा हो जाता है। वह भगवान को केवल संकटमोचक या फलदाता नहीं मानता। वह उन्हें अपने अस्तित्व के परम केन्द्र के रूप में पहचानता है।
अध्याय के अंत में भगवान कहते हैं कि यह अत्यन्त गोपनीय शास्त्र है। जो इसे जानता है, वह बुद्धिमान होता है और कृतकृत्य हो जाता है—अर्थात् उसके जीवन का धर्म पूर्णता की दिशा में पहुँचता है।
यहाँ लक्ष्य speculative triumph नहीं है। यह intellectual victory नहीं है कि मैंने एक कठिन दर्शन समझ लिया। लक्ष्य है पूर्णता—wholeness। आत्मा संसार को उसके सही स्थान पर देखे, स्वयं को भगवान का सनातन अंश समझे, अपनी संघर्षशील अवस्था को पहचाने, और पुरुषोत्तम भगवान को परम आश्रय माने।
जब ज्ञान अपना सही केन्द्र पा लेता है, तब वह भक्ति में बदलता है। जब संसार को derivative समझा जाता है, तब मोह कम होता है। जब आत्मा को भगवान का सनातन अंश समझा जाता है, तब आत्महीनता मिटती है। जब संघर्ष पहचाना जाता है, तब साधना जागती है। और जब पुरुषोत्तम का बोध होता है, तब जीवन भगवान की ओर व्यवस्थित हो जाता है।
पहले अध्याय में अर्जुन शोक से टूटे थे। दूसरे में आत्मा का ज्ञान मिला। तीसरे में कर्म यज्ञ बना। चौथे में ज्ञान की अग्नि और अवतार रहस्य आया। पाँचवें में कर्म के भीतर संन्यास बताया गया। छठे में मन को साधना सिखाया गया। सातवें में भगवान की प्रकृति और माया का रहस्य खुला। आठवें में अंतिम स्मरण की शिक्षा मिली। नौवें में राजविद्या और राजगुह्य भक्ति का मधुर रहस्य आया। दसवें में विभूतियों से संसार भगवान-स्मरण की पाठशाला बना। ग्यारहवें में विश्वरूप का विराट दर्शन हुआ। बारहवें में भक्ति का जीने योग्य मार्ग सामने आया। तेरहवें में क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का विवेक मिला। चौदहवें में तीन गुणों के बंधन और उनसे परे जाने का मार्ग समझाया गया। पंद्रहवें अध्याय में गीता संसार-वृक्ष की उलझन दिखाकर आत्मा को पुरुषोत्तम की ओर मोड़ देती है।
यह अध्याय साधक से कहता है—संसार में रहो, पर इसे अंतिम घर मत मानो। अपने संघर्ष को पहचानो, पर स्वयं को केवल संघर्ष मत समझो। अपने भीतर के दिव्य मूल को याद रखो। और उस परम पुरुष की शरण में जाओ जो सूर्य का तेज भी है, हृदय की स्मृति भी है, और संसार-वृक्ष से परे स्थित सर्वोच्च आश्रय भी।
यही पुरुषोत्तम योग का दिव्य और प्रकाशमान संदेश है।
अध्याय 16 की ओर
जब पुरुषोत्तम भगवान को क्षर और अक्षर से परे परम सत्य के रूप में प्रकट कर दिया गया, तब अगला प्रश्न नैतिक और व्यावहारिक बन जाता है। कौन-सा मनुष्य उस परम पुरुष की ओर मुड़ता है? और कौन-सा मनुष्य अपने अहंकार, दम्भ, क्रोध और अधर्म में कठोर होकर उनसे दूर चला जाता है?
सोलहवाँ अध्याय इसी प्रश्न का उत्तर देगा। वहाँ गीता दैवी और आसुरी सम्पदाओं का अंतर स्पष्ट करेगी और बताएगी कि मनुष्य का चरित्र उसकी आध्यात्मिक दिशा को कैसे निर्धारित करता है।

