सोमवार, 10 अगस्त 2026 को सोम प्रदोष व्रत है। उत्तर भारत में प्रचलित पूर्णिमान्त पंचांग के अनुसार यह श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी है। इसी दिन श्रावण का दूसरा सोमवार भी है। इस प्रकार श्रावण मास, सोमवार और प्रदोष—तीनों का एक ही दिन संयोग हो रहा है।
(दिल्ली – प्रदोषकालीन शिव-पूजा का मुख्य मुहूर्त – सायं 7:05 बजे से रात्रि 9:14 बजे तक)
सोम प्रदोष व्रत
| सोम प्रदोष व्रत | सोमवार, 10 अगस्त 2026 |
| मास | श्रावण, कृष्ण पक्ष |
| तिथि | कृष्ण त्रयोदशी |
| त्रयोदशी आरम्भ | 10 अगस्त, प्रातः 8:00 बजे |
| त्रयोदशी समाप्त | 11 अगस्त, प्रातः 4:54 बजे |
| प्रदोष पूजा मुहूर्त – दिल्ली | सायं 7:05 बजे से रात्रि 9:14 बजे तक |
| पूजा अवधि | 2 घंटे 9 मिनट |
| श्रावण सोमवार | उत्तर भारतीय पंचांग के अनुसार दूसरा श्रावण सोमवार |
(समय स्थानीय सूर्यास्त के अनुसार)
त्रयोदशी तिथि की सायंकालीन संधिवेला को प्रदोष कहा जाता है। जब प्रदोष सोमवार को पड़ता है, तब इसे सोम प्रदोष कहा जाता है।
स्कन्दपुराण में प्रदोषकाल को भगवान शिव की आराधना की विशेष बेला कहा गया है। स्कन्दपुराण के ब्राह्मखण्ड–ब्रह्मोत्तरखण्ड में वर्णन है कि त्रयोदशी की सायंकालीन बेला प्रदोष है और इस समय भगवान महादेव की पूजा, होम, कथा तथा गुणगान का विधान है।
10 अगस्त को त्रयोदशी प्रातः 8 बजे आरम्भ होकर पूरी प्रदोष बेला में विद्यमान रहेगी और 11 अगस्त की प्रातः 4:54 बजे समाप्त होगी। इसलिए प्रदोष व्रत और सायंकालीन शिव-पूजा 10 अगस्त को ही की जाएगी।
श्रावण में सोम प्रदोष का विशेष संयोग
उत्तर भारत के पूर्णिमान्त पंचांग के अनुसार श्रावण मास 30 जुलाई 2026 को आरम्भ हुआ। पहला श्रावण सोमवार 3 अगस्त और दूसरा श्रावण सोमवार 10 अगस्त को है। इसी 10 अगस्त को श्रावण कृष्ण त्रयोदशी का सोम प्रदोष व्रत भी पड़ रहा है।
इस प्रकार एक ही दिन शिव-आराधना से जुड़े तीन कालगत तत्व उपस्थित हैं—
श्रावण मास — सोमवार — प्रदोष।
श्रावण परम्परागत रूप से भगवान शिव की उपासना का मास माना जाता है। सोमवार भी शिवपूजन से सम्बद्ध है और त्रयोदशी की प्रदोष बेला तो स्कन्दपुराण में विशेष रूप से महादेव की आराधना के लिए कही गई है। इसलिए 10 अगस्त का सोम प्रदोष शिवभक्तों के लिए विशेष धार्मिक महत्त्व रखता है।
सायं 7:05 बजे से रात्रि 9:14 बजे तक
यही प्रदोषकाल भगवान शिव और माता पार्वती की सायंकालीन पूजा का प्रमुख समय है।
स्कन्दपुराण में शाण्डिल्य ऋषि द्वारा बताई गई प्रदोष-व्रत विधि में साधक को सूर्यास्त से पहले स्नान, शुद्ध वस्त्र, संध्या और जप आदि पूर्ण करके संयमपूर्वक भगवान शिव की पूजा आरम्भ करने का निर्देश है।
इसके बाद शिव-पार्वती का ध्यान, अभिषेक, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करने का विस्तृत विधान आता है। अभिषेक में जल और पंचामृत का उल्लेख है तथा शिवपूजन के लिए बिल्व सहित उपलब्ध पुष्प अर्पित करने की बात कही गई है।
किन्तु स्कन्दपुराण का एक अत्यन्त सुंदर निर्देश यह भी है कि यदि किसी साधक के पास विस्तृत पूजा-सामग्री अथवा पर्याप्त धन न हो तो वह अपनी सामर्थ्य के अनुसार पूजा करे—गौरीपति भगवान शंकर भक्तिभाव से अर्पित पुष्पमात्र से भी प्रसन्न होते हैं।
सोम प्रदोष पर सरल शिव-पूजा
व्रती दिनभर श्रद्धा और संयम रखकर संध्या में स्नान के बाद शिवालय अथवा घर के पूजास्थल में भगवान शिव का पूजन कर सकते हैं। शिवलिंग का जल अथवा पंचामृत से अभिषेक, बिल्वपत्र और पुष्प अर्पण, दीप-धूप तथा नैवेद्य के बाद शिव-मन्त्र का जप और प्रदोष-व्रत कथा का श्रवण-पाठ किया जा सकता है। ये क्रियाएँ स्कन्दपुराण में वर्णित विस्तृत प्रदोष-पूजा के मूल तत्वों के अनुरूप हैं।
पंचाक्षर मन्त्र—ॐ नमः शिवाय का श्रद्धापूर्वक जप शिवोपासना की सर्वाधिक प्रचलित परम्पराओं में है।
प्रदोष-व्रत की विस्तृत कथा में राजा सत्यरथ, उनकी विधवा रानी, निर्धन ब्राह्मणी उमा, शाण्डिल्य ऋषि तथा राजकुमार धर्मगुप्त का दीर्घ आख्यान आता है। धर्मगुप्त प्रदोषकाल में नियमित शिव-आराधना करता है और अन्ततः अपने खोए हुए विदर्भ राज्य को पुनः प्राप्त करता है।
प्रदोष का आध्यात्मिक अर्थ
प्रदोष अपने आप में एक सन्धि है।
दिन जा चुका है, पर रात्रि अभी पूरी तरह नहीं आई।
प्रकाश क्षीण हो रहा है, लेकिन समाप्त नहीं हुआ।
स्कन्दपुराण की प्रदोष-कथा भी इसी सन्धि का आध्यात्मिक रूप प्रस्तुत करती है। धर्मगुप्त का राज्य समाप्त हो जाता है, माता-पिता नहीं रहते, वह भिक्षा के अन्न पर पलता है—पर उसकी कथा वहीं समाप्त नहीं होती। शाण्डिल्य का मार्गदर्शन और शिव की उपासना उसके जीवन को दूसरी दिशा देती है।
इस दृष्टि से प्रदोष उस समय का प्रतीक भी बनता है जब मनुष्य एक समाप्त होती अवस्था और आरम्भ होने वाली नई अवस्था के बीच खड़ा है।
श्रावण के सोमवार को पड़ने वाला यह प्रदोष इसी भाव को और गहरा करता है—
जब बाहर का प्रकाश धीरे-धीरे क्षीण हो, तब साधक अपने भीतर शिव का स्मरण जाग्रत करे।
प्रदोष व्रत कथा सुनने का विधान
स्कन्दपुराण के इस प्रसंग के अन्त में सूतजी प्रदोष-व्रत के दिन शिवपूजन के पश्चात् प्रदोष-माहात्म्य को एकाग्रचित्त होकर सुनने या पढ़ने का फल बताते हैं। ग्रन्थ इसे दरिद्रता-निवारण और अन्ततः भगवान शंकर के परमधाम की प्राप्ति से जोड़ता है। यह पुराण का अपना श्रद्धामूलक फलश्रुति-वचन है और उसी रूप में इसे ग्रहण करना चाहिए।
इस बार सोम प्रदोष का महत्त्व इसलिए भी विशिष्ट है कि उत्तर भारतीय पंचांग में यह श्रावण के दूसरे सोमवार के दिन ही पड़ रहा है।
हर हर महादेव।
ॐ नमः शिवाय।

