श्रावण की पूर्णिमा, रक्षा का संकल्प और एक ऐसे पर्व की कथा जो भाई-बहन के स्नेह से कहीं अधिक व्यापक है
श्रावण का आकाश मेघों से भरा हो। वर्षा से धुली पृथ्वी हरी हो उठी हो। नदियों में नया जल उतर आया हो। वनस्पतियाँ नवजीवन से भर उठी हों और पूर्ण चन्द्र अपनी सम्पूर्ण कलाओं के साथ श्रावण को विदा देने आया हो—भारतीय कालगणना ने इसी क्षण में एक सूक्ष्म-सा सूत्र रखा और उसका नाम दिया—रक्षाबन्धन।
आज वह सूत्र बहन अपने भाई की कलाई पर बाँधती है। माथे पर तिलक लगाती है, अक्षत रखती है, दीप घुमाती है और मन ही मन उसके दीर्घ, धर्मपूर्ण और मंगलमय जीवन की कामना करती है। भाई भी बहन के प्रति स्नेह, सहयोग और संरक्षण का संकल्प दोहराता है।
भविष्यपुराण में रक्षाबन्धन: श्रावण पूर्णिमा का प्रत्यक्ष शास्त्रीय उल्लेख
रक्षाबन्धन के विषय में उपलब्ध सर्वाधिक स्पष्ट पुराणीय वर्णनों में भविष्यपुराण, उत्तरपर्व, अध्याय 137 अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। अध्याय स्वयं रक्षाबन्धनवर्णनम् के रूप में आता है और संवाद श्रीकृष्ण तथा युधिष्ठिर के बीच है।
श्रीकृष्ण श्रावण पूर्णिमा के उस प्राकृतिक परिवेश का वर्णन करते हैं जिसमें रक्षा-विधान किया जाना है—
घनावृतेऽम्बरे पार्थ शाद्वले धरणीतले ।
संप्राप्ते श्रावणे चैव पौर्णमास्यां दिनोदये ॥
अर्थात्—हे पार्थ! जब आकाश मेघों से आच्छादित हो, धरती हरियाली से युक्त हो और श्रावण मास की पूर्णिमा का दिन उपस्थित हो, तब यह विधान किया जाए।
यह उल्लेख अत्यन्त अर्थपूर्ण है। पर्व को केवल एक पारिवारिक रीति के रूप में नहीं, बल्कि ऋतु, काल, प्रकृति, पूर्णिमा और धार्मिक अनुष्ठान के सम्मिलित क्षण के रूप में देखा गया है। इसी अध्याय में स्नान, देव-पितृ तर्पण, ऋषि-स्मरण और उपाकर्म के पश्चात् रक्षा तैयार करने का विधान मिलता है। पुराण के पाठ में अपराह्न समय में अक्षत आदि से शुभ रक्षा-पोटलिकाएँ बनाने का निर्देश भी है।
अर्थात् प्राचीन रक्षाबन्धन केवल रंगीन धागे का उत्सव नहीं था; रक्षा को पहले संस्कारित किया जाता था, फिर वह किसी कलाई तक पहुँचती थी।
इन्द्र और शची: रक्षाबन्धन की प्राचीन कथा भाई-बहन की नहीं है
रक्षाबन्धन के इतिहास में यह तथ्य विशेष ध्यान देने योग्य है।
भविष्यपुराण के इसी अध्याय में देव–असुर संघर्ष और इन्द्र की पत्नी शची का उल्लेख आता है। पाठ बताता है कि शची द्वारा किये गए रक्षा-बन्धन के प्रभाव से शचीपति इन्द्र शत्रुओं के सम्मुख अजेय बने—
अजेयः सर्वशत्रूणां कृतः शच्या शचीपतिः ।
रक्षाबन्धप्रभावेन दानवेन्द्रो जितो महान् ॥
यहाँ सम्बन्ध पति-पत्नी का है, भाई-बहन का नहीं।
यही एक श्लोक रक्षाबन्धन के आध्यात्मिक विस्तार को समझने के लिए पर्याप्त है।

रक्षा का अधिकार किसी एक सम्बन्ध का अधिकार नहीं था।
जिसके कल्याण के लिए हृदय में शुद्ध संकल्प हो, उसके लिए रक्षा की कामना की जा सकती है।
कालान्तर में बहन और भाई का सम्बन्ध इस रक्षा-संस्कार का सबसे सजीव और सर्वाधिक लोकप्रिय रूप बन गया; किन्तु उसकी धार्मिक जड़ कहीं अधिक व्यापक है।
रक्षासूत्र केवल रक्षा नहीं—जय, सुख, आरोग्य और समृद्धि की मंगलकामना
भविष्यपुराण रक्षाबन्धन के फल को केवल शत्रु अथवा संकट से रक्षा तक सीमित नहीं रखता। शची और इन्द्र के प्रसंग के पश्चात् स्वयं श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से रक्षा के प्रभाव का वर्णन करते हुए कहते हैं—
एष प्रभावो रक्षायाः कथितस्ते युधिष्ठिर ।
जयदः सुखदश्चैव पुत्रारोग्यधनप्रदः ॥
भावार्थ— हे युधिष्ठिर! रक्षा का यह प्रभाव मैंने तुमसे कहा है। यह विजय देने वाली, सुख प्रदान करने वाली तथा सन्तति, आरोग्य और धन देने वाली है।
यह श्लोक रक्षाबन्धन के आध्यात्मिक स्वरूप को अत्यन्त व्यापक कर देता है। बहन जब भाई की कलाई पर रक्षा-सूत्र बाँधती है, तब उसकी प्रार्थना केवल यह नहीं होती कि उसका भाई किसी बाहरी संकट से सुरक्षित रहे। उस सूक्ष्म सूत्र में उसके लिए विजय की कामना है, सुख की कामना है, आरोग्य की कामना है, परिवार की वृद्धि और जीवन में समृद्धि की कामना है।
इसीलिए राखी केवल “मैं तुम्हारी रक्षा करूँगा” का वचन नहीं है। यह एक-दूसरे के सम्पूर्ण मंगल की प्रार्थना है।
वह मन्त्र जिसमें आज भी राजा बलि जीवित हैं
राखी बाँधते समय बोला जाने वाला सर्वाधिक प्रसिद्ध मन्त्र भी भविष्यपुराण के इसी अध्याय में स्पष्ट रूप से मिलता है—
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः ।
तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल ॥
— भविष्यपुराण, उत्तरपर्व
भावार्थ
जिस रक्षा-बन्धन से महाबली दानवेन्द्र राजा बलि आबद्ध हुए, उसी रक्षा से मैं तुम्हें बाँधता हूँ। हे रक्षे! तुम अपने संकल्प से विचलित मत होना; दृढ़ रहना, दृढ़ रहना।
यहाँ ‘मा चल, मा चल’ केवल धागे को कलाई से न खिसकने की बात नहीं रह जाती।
उसका गहरा आध्यात्मिक अर्थ है—
जिस धर्म के लिए यह सूत्र बाँधा गया है, उस धर्म से मत हटना।
जिस उत्तरदायित्व को स्वीकार किया है, उससे मत हटना।
जिस सम्बन्ध की रक्षा का संकल्प लिया है, उससे मत हटना।
इसीलिए राखी का वास्तविक मूल्य उसके स्वर्ण, रजत, रेशम या अलंकरण में नहीं है।
उसका मूल्य संकल्प में है।

रक्षाबन्धन सबके लिए
रक्षामन्त्र के ठीक अगले श्लोक में कहा गया है—
ब्राह्मणैः क्षत्रियैर्वैश्यैः शूद्रैश्चान्यैश्च मानवैः ।
कर्तव्यो रक्षिकाबन्धो द्विजान्सम्पूज्य भक्तितः ॥
अर्थात् समाज के विविध वर्गों तथा अन्य मनुष्यों द्वारा भी रक्षा-बन्धन किया जाना चाहिए।
यहाँ एक बहुत सुन्दर सांस्कृतिक यात्रा दिखाई देती है।
राजा की रक्षा से आरम्भ हुआ विधान समाज की रक्षा तक आता है; और समाज से चलकर घर के सबसे आत्मीय सम्बन्ध—भाई और बहन—की कलाई तक पहुँच जाता है।
देवी लक्ष्मी और राजा बलि
रक्षाबन्धन की सर्वाधिक प्रिय कथाओं में देवी लक्ष्मी और महाबली की कथा आती है।
इसके मूल पात्र और कथा-भूमि पूर्णतः पुराण-परम्परा के हैं। भगवान विष्णु का वामनावतार, राजा बलि से तीन पग भूमि माँगना, विराट त्रिविक्रम रूप, बलि का आत्मसमर्पण और भगवान द्वारा उसे सुतल में प्रतिष्ठित करना—ये प्रसंग पुराणीय वामन-कथा का अंग हैं।
लोकप्रिय धार्मिक परम्परा इसके आगे एक अत्यन्त मार्मिक प्रसंग सुनाती है।
कथा कहती है कि भगवान विष्णु जब बलि के समीप रहने लगे, तब लक्ष्मीजी ने बलि को अपना भ्राता बनाकर उनकी कलाई पर रक्षा-सूत्र बाँधा। बलि ने उनसे वर माँगने को कहा। लक्ष्मी ने अपने स्वामी को पुनः अपने साथ ले जाने की इच्छा प्रकट की और बलि ने बहन के भाव का सम्मान किया।
भविष्यपुराण के उपलब्ध रक्षाबन्धन-अध्याय में राजा बलि का नाम रक्षामन्त्र में स्पष्टतः आता है, किन्तु उसी अध्याय में लक्ष्मी द्वारा बलि को राखी बाँधने की यह पूरी लोकप्रिय कथा नहीं सुनाई गई है। इसी प्रकार पुराणों में वामन और बलि का मूल आख्यान मिलता है, जबकि लक्ष्मी–राखी प्रसंग मुख्यतः उत्तरकालीन भक्तिपरक और लोकपरम्परा में विकसित रूप में प्रसिद्ध है।
यह जीवित धार्मिक परम्परा है—यह अत्यन्त प्रसिद्ध वैष्णव लोक-आस्था की कथा है—यही शास्त्र के प्रति श्रद्धा भी है और सत्य के प्रति श्रद्धा भी।
श्रीकृष्ण और द्रौपदी: प्रेम की अत्यन्त सुन्दर लोकस्मृति
रक्षाबन्धन आते ही एक और कथा घर-घर सुनाई जाती है – महाभारत-प्रेरित लोकप्रिय भक्तिपरक लोककथा।
श्रीकृष्ण की अँगुली से रक्त निकला। द्रौपदी ने तत्काल अपने वस्त्र का अंश फाड़कर अँगुली पर बाँध दिया। कृष्ण उस निष्कपट स्नेह से अभिभूत हुए और द्रौपदी की रक्षा का संकल्प उनके दिव्य सखा-भाव से जुड़ गया।
यह कथा रक्षाबन्धन के भाव को अत्यन्त सुन्दर ढंग से व्यक्त करती है—जहाँ गणना नहीं, सहज करुणा पहले आती है।
यम और यमुना: रक्षाबन्धन से अधिक भ्रातृद्वितीया की परम्परा
यमराज और उनकी भगिनी यमुना की कथा को भी रक्षाबन्धन से जोड़ा जाता है।
परम्परा में यमुना द्वारा अपने भाई यम का स्वागत, पूजन और उनके मंगल की कामना का प्रसंग अत्यन्त प्रसिद्ध है। किन्तु इसका अधिक प्रत्यक्ष पर्वीय सम्बन्ध यम-द्वितीया अथवा भाई-दूज से है।
इसलिए यम–यमुना को रक्षाबन्धन की मूल कथा घोषित करने की अपेक्षा उसे भारतीय भाई-बहन धार्मिक परम्पराओं की समानान्तर कथा कहना अधिक उचित है।
1905: जब राखी बंगाल की एकता का सूत्र बनी
1905 का बंग-भंग आन्दोलन।
16 अक्टूबर 1905 – पूरे बंगाल में ‘शोक दिवस’ – और – ‘राखी बंधन दिवस’ के रूप में मनाया गया।
रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने बंगाल के विभाजन के विरोध में राखी को सामाजिक एकता के प्रतीक के रूप में अपनाया। 27 सितम्बर 1905 की एक बैठक में पूर्वी और पश्चिमी बंगाल के लोगों के बीच पीले सूत्र के आदान-प्रदान का प्रस्ताव सामने आया और 16 अक्टूबर 1905, जिस दिन बंगाल विभाजन लागू हुआ, राखी-बन्धन को एकता के सार्वजनिक प्रतीक के रूप में प्रयोग किया गया।
लोग एक-दूसरे की कलाई पर सूत्र बाँध रहे थे।
यहाँ बहन अपने जैविक भाई को ही राखी नहीं बाँध रही थी।
एक मनुष्य दूसरे मनुष्य से कह रहा था—
हम विभाजित नहीं होंगे।
भारत सरकार से सम्बद्ध स्रोत भी बंग-भंग विरोध के समय ठाकुर द्वारा राखी को हिन्दू-मुस्लिम एकता और परस्पर संरक्षण के प्रतीक के रूप में प्रयोग किये जाने का उल्लेख करते हैं।
इस प्रकार रक्षा का सूत्र फिर अपने पुराने व्यापक अर्थ में लौट आया—
व्यक्ति से समाज की ओर।
एक पूर्णिमा, अनेक भारतीय परम्पराएँ
श्रावण पूर्णिमा भारत के अनेक भागों में केवल राखी का दिवस नहीं है।
महाराष्ट्र और कोंकण में इसी समय नारळी पूर्णिमा की परम्परा है, जिसमें समुद्र और वरुण से सुरक्षित जीवन तथा अनुकूल जलयात्रा की प्रार्थना की जाती है। दक्षिण भारत के अनेक समुदायों में यही काल उपाकर्म/अवनि अवित्तम् से जुड़ता है। उत्तर एवं मध्य भारत के कुछ क्षेत्रों में श्रावणी और कजरी पूर्णिमा की परम्पराएँ भी मिलती हैं।
राजस्थान और मारवाड़ी परिवारों में लुम्बा राखी की परम्परा विशेष रूप से प्रसिद्ध है, जिसमें विवाहित भाई की पत्नी को भी पारिवारिक मंगल-संकल्प में सम्मिलित किया जाता है।
इस विविधता में ही रक्षाबन्धन का भारतीय स्वरूप दिखाई देता है—
कहीं भाई की कलाई,
कहीं पुरोहित का रक्षासूत्र,
कहीं समुद्र से सुरक्षा की प्रार्थना,
कहीं यज्ञोपवीत का नवीकरण,
कहीं परिवार,
कहीं समाज,
और कहीं सम्पूर्ण राष्ट्र को जोड़ता एक सूत्र।
रक्षाबन्धन का आध्यात्मिक अर्थ
राखी का सबसे सरल अर्थ है—बहन भाई की रक्षा की कामना करती है और भाई बहन की रक्षा का संकल्प लेता है।
किन्तु आध्यात्मिक स्तर पर प्रश्न इससे आगे जाता है।
मनुष्य किस-किस की रक्षा का उत्तरदायी है?
अपने सम्बन्धों की।
अपने वचन की।
अपने माता-पिता की गरिमा की।
अपने परिवार की एकता की।
अपनी सन्तानों के भविष्य की।
अपने धर्म की मर्यादा की।
अपने ज्ञान की।
प्रकृति की।
समाज में निर्बल की।
और अन्ततः—अपने भीतर विद्यमान मनुष्यता की।
यदि कलाई पर बँधा सूत्र रह जाए किन्तु सम्बन्ध टूट जाए, तो रक्षा कहाँ हुई?
यदि राखी की थाली सजी रहे किन्तु वृद्ध माता-पिता अकेले रह जाएँ, तो बन्धन किस बात का?
यदि भाई बहन की स्वतन्त्रता और सम्मान की रक्षा न करे, अथवा बहन भाई के संकट में साथ न दे, तो केवल एक दिन का अनुष्ठान अपने सम्पूर्ण अर्थ को प्राप्त नहीं करता।
इसीलिए भविष्यपुराण का वह छोटा-सा वाक्य अत्यन्त विशाल हो उठता है—
रक्षे मा चल मा चल।
हे रक्षा-संकल्प, विचलित मत होना।

राखी बाँधते समय मन्त्र
राखी बाँधते समय यह प्रामाणिक पुराणीय मन्त्र बोला जा सकता है—
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः ।
तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल ॥
सरल भावार्थ
जिस रक्षा-संकल्प से महाबली राजा बलि आबद्ध हुए, उसी रक्षा-संकल्प से मैं तुम्हें बाँधता/बाँधती हूँ। हे रक्षा! तुम दृढ़ रहो, अपने उद्देश्य से कभी विचलित न होना।
राखी बाँधते समय संस्कृत उच्चारण न आ सके तो भी उसके भाव को समझकर ईश्वर से अपने भाई, बहन और परिवार के मंगल की प्रार्थना की जा सकती है। धर्म में शब्द के साथ भाव और संकल्प भी महत्त्वपूर्ण हैं।
रक्षाबन्धन – 2026 – शुक्रवार, 28 अगस्त
| पंचांग विवरण | समय |
| श्रावण पूर्णिमा प्रारम्भ | 27 अगस्त, प्रातः 9:08 |
| भद्रा समाप्त | 27 अगस्त की रात्रि में; 28 अगस्त के सूर्योदय से पहले |
| दिल्ली में सूर्योदय | 28 अगस्त, प्रातः 5:57 |
| पूर्णिमा समाप्त | 28 अगस्त, प्रातः 9:48 |
| मुख्य रक्षाबन्धन समय | प्रातः 5:57 से 9:48 |
| चर चौघड़िया | 5:57–7:33 |
| लाभ चौघड़िया | 7:33–9:10 |
| अमृत चौघड़िया का पूर्णिमा-अन्तर्गत भाग | 9:10–9:48 |
दिल्ली के लिए पंचांग में पूर्णिमा 9:48 बजे तक तथा रक्षाबन्धन अनुष्ठान का मुख्य समय सूर्योदय 5:57 बजे से 9:48 बजे तक दिया गया है। भद्रा सूर्योदय से पहले समाप्त हो चुकी है।
सबसे सुविधाजनक क्रम
5:57–7:33 प्रातः: रक्षा-बन्धन किया जा सकता है।
7:33–9:10 प्रातः: लाभ चौघड़िया।
9:10–9:48 प्रातः: अमृत चौघड़िया का वह भाग जिसमें पूर्णिमा अभी विद्यमान है।
कुछ परिवार उदया-तिथि के आधार पर पूरे पर्व-दिवस में सुविधानुसार राखी बाँधते हैं।
यदि किसी कारण सुबह के मुख्य रक्षाबन्धन मुहूर्त में राखी न बाँध पाई हो, तो शाम को भी राखी बांधने का समय है।
शाम का समय और सामान्य शुभ चौघड़िया
| समय | चौघड़िया | सलाह |
| 5:11–6:47 PM | चर | आवश्यकता हो तो स्वीकार्य |
| 6:47–8:11 PM | रोग | टालें |
| 8:11–9:35 PM | काल | टालें |
| 9:35–10:59 PM | लाभ | सामान्य शुभ चौघड़िया; मजबूरी में बेहतर विकल्प |
| 10:59 PM–12:22 AM | उद्वेग | टालें |
ये दिल्ली के चौघड़िया हैं।
सुबह 9:48 बजे तक बाँधना सर्वोत्तम है। यदि वह सम्भव न हो, तो उसी दिन शाम 5:11–6:47 बजे बाँध सकते हैं; और बहुत देर हो जाए तो 9:35–10:59 बजे का लाभ चौघड़िया सामान्य शुभ समय है।

सरल पूजा-विधि
प्रातः स्नान के पश्चात् देवपूजन कर राखी की थाली में दीप, अक्षत, कुमकुम अथवा रोली, रक्षा-सूत्र और मिष्टान्न रखा जा सकता है। परिवार की परम्परा के अनुसार पहले ईश्वर का स्मरण करें।
बहन भाई के मस्तक पर तिलक और अक्षत लगाए, मंगलकामना करे और दाहिनी कलाई पर रक्षा-सूत्र बाँधते समय रक्षामन्त्र बोले।
भाई बहन को केवल उपहार न दे—उसके सम्मान, आवश्यकता और संकट में साथ रहने का संकल्प भी दे।
और बहन भी केवल अपने भाई से अपनी रक्षा की अपेक्षा न करे; उसके आरोग्य, सद्बुद्धि, धर्म और जीवन की रक्षा के लिए प्रार्थना करे।
तभी रक्षा एकतरफा दायित्व नहीं रहती।
वह परस्पर धर्म बन जाती है।
राखी आखिर किसे बाँधती है?
बचपन में राखी कलाई को बाँधती है।
युवावस्था में वह दूर बसे भाई-बहन को स्मृतियों से बाँधती है।
समय बीतने पर वही सूत्र दो परिवारों, दो घरों, भतीजों, भांजों, पुरानी हँसी, पुराने झगड़ों और माता-पिता के आँगन को एक साथ बाँधे रखता है।
और जब जीवन बहुत दूर निकल जाता है, तब कभी-कभी डाक से पहुँचा एक छोटा-सा सूत्र मनुष्य को यह याद दिलाता है कि संसार में कोई है जिसने आज भी उसके मंगल के लिए दीप जलाया है।
यही रक्षाबन्धन का सबसे बड़ा चमत्कार है।
यह किसी धागे की अलौकिक शक्ति की कथा नहीं—
यह मनुष्य के संकल्प की शक्ति की कथा है।
श्रावण पूर्णिमा आती है, सूत्र बाँधा जाता है और भविष्यपुराण का प्राचीन मन्त्र फिर सुनाई देता है—
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः ।
तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल ॥
और कलाई पर बँधा सूत्र मानो मन से कहता है—
अपने प्रेम से मत हटना।
अपने वचन से मत हटना।
अपने धर्म से मत हटना।
रक्षा के संकल्प से मत हटना।
यही राखी है।
यही बन्धन है।
और यही रक्षाबन्धन का सनातन तत्त्व है।

