घर-घर में यह बात सुनी जाती है — “ॐ में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों बसते हैं।”
एक जिज्ञासु मन जब पूछता है — “यह लिखा किस ग्रंथ में है?” — तो एक उपनिषदिक स्रोत से — कृष्ण यजुर्वेद की ध्यानबिन्दु उपनिषद्, जो योग-उपनिषदों की परंपरा में गिनी जाती है।
साथ ही, स्वयं भगवद्गीता में भी ओंकार को लेकर तीन अत्यंत सारगर्भित श्लोक हैं, जो इस विवेचन को और पुष्ट करते हैं।
ध्यानबिन्दु उपनिषद् — जहाँ अ-उ-म को त्रिदेव का रूप मिलता है
ध्यानबिन्दु उपनिषद् में स्पष्ट रूप से कहा गया है:
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म ध्येयं सर्वैर्मुमुक्षुभिः। पृथिव्यग्निश्च ऋग्वेदो भूरिति च पितामहः॥ (मंत्र ९) अकारे तु लयं प्राप्ते प्रथमे प्रणवांशके। अन्तरिक्षं यजुर्वेदो भुवो विष्णुर्जनार्दनः॥ (मंत्र १०) उकारे तु लयं प्राप्ते द्वितीये प्रणवांशके। द्यौः सूर्यः सामवेदश्च स्वरिति च महेश्वरः॥ (मंत्र ११) मकारे तु लयं प्राप्ते तृतीये प्रणवांशके। अकारः पीतवर्णः स्याद्रजोगुण उदीरितः॥ (मंत्र १२)उकारः सात्त्विकः शुक्लो मकारः कृष्णतामसः। (मंत्र १३ पूर्वार्ध)
भावार्थ स्पष्ट है — प्रणव (ओंकार) का प्रथम अंश अकार, पृथ्वी, अग्नि, ऋग्वेद और भूः लोक के साथ पितामह ब्रह्मा का प्रतीक है। द्वितीय अंश उकार, अंतरिक्ष, यजुर्वेद, भुवः लोक के साथ जनार्दन विष्णु का प्रतीक है। तृतीय अंश मकार, द्यौः (आकाश), सूर्य, सामवेद और स्वः लोक के साथ महेश्वर (शिव) का प्रतीक है। और इन तीनों के गुण भी उपनिषद् बताती है — अकार पीतवर्ण और रजोगुण से युक्त, उकार श्वेतवर्ण और सात्त्विक गुण वाला, तथा मकार कृष्णवर्ण और तमोगुण से युक्त है।
यह वर्गीकरण — यह सृष्टि-स्थिति-संहार के त्रिक् सिद्धांत को ध्वनि, रंग, गुण और लोक के स्तर तक विस्तारित करता है। ब्रह्मा सृजन करते हैं, इसलिए रजोगुण उनके अनुरूप है। विष्णु पालन करते हैं, इसलिए सात्त्विक शुभ्रता उनसे जुड़ती है। शिव संहार करते हैं, इसलिए तमोगुण — जो अंत और लय का प्रतीक है — उनसे संबद्ध है।
प्राणायाम में भी त्रिदेव — पूरक, कुम्भक, रेचक
वही उपनिषद् आगे प्राणायाम की क्रिया में भी त्रिदेव को प्रतिष्ठित करती है:
ब्रह्मा पूरक इत्युक्तो विष्णुः कुम्भक उच्यते। रेचो रुद्र इति प्रोक्तः प्राणायामस्य देवताः॥ (मंत्र २१)
अर्थात् श्वास को भीतर खींचना (पूरक) ब्रह्मा है, उसे रोके रखना (कुम्भक) विष्णु है, और उसे बाहर छोड़ना (रेचक) रुद्र है। यहाँ त्रिदेव केवल दार्शनिक प्रतीक नहीं रह जाते — वे साधक की हर साँस में जीवंत हो उठते हैं। यही कारण है कि योग-साधना में प्राणायाम को केवल शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि त्रिदेव की उपासना माना गया है।
आगे यह भी कहा गया है कि जब त्रिगुणमय संसार के सृजन-पालन-संहार का कारण मन विलीन हो जाता है, तब साधक विष्णु के परमपद को प्राप्त करता है (मंत्र २५), और उपनिषद् के अंतिम भाग में नाद-बिन्दु को स्पष्टतः “बिन्दुमाहेश्वरं पदम्” — महेश्वर का पद — कहा गया है (मंत्र १०५)। इस प्रकार उपनिषद् केवल आरंभ में ही नहीं, अपने समापन तक त्रिदेव-चिंतन को ओंकार-साधना से गूँथे रखती है।
एक तालिका में सम्पूर्ण विवेचन
| ओंकार अंश | देवता | वर्ण | गुण | वेद | लोक | कार्य |
|---|---|---|---|---|---|---|
| अ (अकार) | ब्रह्मा (पितामह) | पीत (पीला) | रजोगुण | ऋग्वेद | भूः | सृष्टि (रचना) |
| उ (उकार) | विष्णु (जनार्दन) | श्वेत (सफ़ेद) | सात्त्विक | यजुर्वेद | भुवः | स्थिति (पालन) |
| म (मकार) | महेश्वर (शिव) | कृष्ण (काला) | तमोगुण | सामवेद | स्वः | संहार (लय) |
भगवद्गीता में ओंकार — कृष्ण स्वयं कहते हैं
गीता में ओंकार को लेकर तीन अत्यंत महत्वपूर्ण श्लोक आते हैं, जो इस बात को और पुष्ट करते हैं कि ओम केवल ध्वनि नहीं, स्वयं परमात्मा का सूक्ष्मतम रूप है।
अध्याय ९ में श्रीकृष्ण कहते हैं:
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः। वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक्साम यजुरेव च॥ (गीता ९.१७)
अर्थात् — मैं ही इस जगत का पिता, माता, धाता और पितामह हूँ; मैं ही जानने योग्य पवित्र ओंकार हूँ, और मैं ही ऋक्, साम तथा यजुः तीनों वेद हूँ। यहाँ श्रीकृष्ण स्वयं को ओंकार से अभिन्न घोषित करते हैं — और चूँकि परंपरा में कृष्ण को विष्णु का पूर्णावतार माना जाता है, यह श्लोक ओम और विष्णु-तत्त्व के बीच एक गहरा सम्बन्ध रेखांकित करता है।
अध्याय ८ में मृत्यु के क्षण की साधना बताते हुए कृष्ण कहते हैं:
ॐ इत्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्। यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्॥ (गीता ८.१३)
अर्थात् जो साधक शरीर त्यागते समय ओंकार का उच्चारण करते हुए भगवान का स्मरण करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।
और अध्याय १७ में ओंकार को ब्रह्म के त्रिविध निर्देश के रूप में परिभाषित किया गया है:
ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः। ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा॥ (गीता १७.२३)
अर्थात् “ॐ”, “तत्” और “सत्” — ये तीनों शब्द ब्रह्म के त्रिविध निर्देशक माने गए हैं, और सृष्टि के आरंभ में इन्हीं के आधार पर ब्राह्मण, वेद और यज्ञ की रचना हुई। यहाँ ध्यान देने योग्य है कि गीता का यह त्रिविध निर्देश (ॐ-तत्-सत्) ध्यानबिन्दु उपनिषद् के त्रिदेव-विभाजन (अ-उ-म) से भिन्न एक स्वतंत्र वर्गीकरण है — दोनों ओंकार के बहुआयामी स्वरूप के दो भिन्न दृष्टिकोण हैं।
भारतीय मानस में त्रिदेव और ओंकार का यह सामंजस्य — मंदिरों की आरती, गुरुकुल की शिक्षा और घर की संध्या-वंदना का हिस्सा है। जब कोई पुरोहित यज्ञ आरंभ करने से पहले ॐ का उच्चारण करता है, तब वह अनजाने में ही सृष्टि, स्थिति और संहार — तीनों शक्तियों का आवाहन कर रहा होता है।


