जन्माष्टमी के पावन अवसर पर प्रस्तुत है—श्रीकृष्ण जन्म से कालिया मर्दन तक बाल लीलाओं की दिव्य यात्रा।
मथुरा के कारागार में माता देवकी और वसुदेव के पुत्र रूप में भगवान् श्रीकृष्ण के प्राकट्य से यह कथा आरम्भ होती है। मध्यरात्रि के अन्धकार में बन्धन खुलते हैं, कारागार के द्वार स्वयं मार्ग देते हैं और वसुदेव नवजात कृष्ण को लेकर उफनती यमुना में उतरते हैं। शेषनाग अपने फनों से छत्र बनाते हैं और यमुना बालकृष्ण के चरणों का स्पर्श कर उन्हें गोकुल जाने का मार्ग देती है।
गोकुल में यही दिव्य बालक कभी माता यशोदा के लाड़ले कान्हा बनते हैं, कभी माखन चुराकर गोपियों के हृदय जीतते हैं और कभी कंस द्वारा भेजी गई पूतना को उसके विष से मुक्त करते हुए उद्धार प्रदान करते हैं।
कथा का विराट दृश्य तब सामने आता है, जब कालिया नाग के विष से यमुना और समूचा व्रज व्याकुल हो उठता है। श्रीकृष्ण यमुना में उतरते हैं, कालिया के फनों पर नृत्य करते हैं और उसका अहंकार समाप्त कर उसे जीवनदान देते हैं।
यह केवल चमत्कारों की कथा नहीं, बल्कि उस बाल-स्वरूप का दर्शन है जिसमें वात्सल्य भी है, करुणा भी, धर्मरक्षा भी और प्रत्येक विष को निष्प्रभावी करने वाली दिव्य शक्ति भी।
TatvaDhi की यह जन्माष्टमी विशेष प्रस्तुति श्रीकृष्ण जन्म कथा, यमुना पार, पूतना उद्धार, माखन-चोरी और कालिया मर्दन की प्रमुख लीलाओं का AI-सहायित कलात्मक पुनर्सृजन है।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

