विसर्जन: जब बप्पा जल में नहीं, हमारे आचरण में उतरते हैं

आज 21 सितम्बर है। विसर्जन की मुख्य विदाई में अभी चार दिन शेष हैं, लेकिन घर के किसी कोने में बच्चे ने प्रश्न पहले ही पूछ दिया है—“जब इतना प्रेम है तो बप्पा को जाने क्यों देंगे?” 25 सितम्बर को ढोल की आवाज दूर से पास आएगी। किसी की आँखों में उत्साह होगा, किसी की पलकों पर विदाई की नमी। जिस प्रतिमा के सामने बारह कैलेंडर तारीखों तक दीप जलेगा, वही घर से बाहर जाएगी।

गणेश विसर्जन का सबसे सुन्दर उत्तर इसी प्रश्न में छिपा है। सनातन साधना रूप का आदर करती है, पर रूप को पकड़कर बैठना नहीं सिखाती। मिट्टी से बने विग्रह में हमने देवत्व का आवाहन किया; अब उसी मिट्टी को सम्मानपूर्वक प्रकृति को लौटाते हैं। आगमन ने सिखाया—ईश्वर को निकट बुलाया जा सकता है। विसर्जन सिखाता है—ईश्वर को किसी एक रूप में बाँधा नहीं जा सकता।

25 सितम्बर 2026: दो उपासनाओं का संगम

2026 में मुख्य गणेश विसर्जन 25 सितम्बर, अनन्त चतुर्दशी को है। यह भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी भगवान विष्णु के अनन्त स्वरूप की उपासना का भी पर्व है। अनेक परिवार इस दिन अनन्त-व्रत करते और चौदह गाँठों वाला अनन्त-सूत्र धारण करते हैं; विधि क्षेत्र तथा कुल-परम्परा के अनुसार बदलती है। अतः अपने पारिवारिक आचार या योग्य आचार्य का अनुसरण करना उचित है।

“अनन्त” का अर्थ है जिसका अन्त न हो। दिन का दृश्य कितना गहरा है—एक ओर सीमित आकार वाली गणेश प्रतिमा विदा हो रही है, दूसरी ओर अनन्त सत्ता का स्मरण हो रहा है। मिट्टी का रूप समाप्त होता दिखाई देता है, लेकिन आराध्य की उपस्थिति असीम मानी जाती है।

क्या विसर्जन केवल उत्सव का अन्त है?

नहीं। विसर्जन तीन स्तरों पर घटित होता है।

पहला, प्रतिमा का विसर्जन—पूजा में प्रतिष्ठित रूप को आदर से विदा करना। दूसरा, अहंकार का विसर्जन—यह स्वीकार करना कि घर, उपलब्धि और उत्सव पर हमारा स्थायी अधिकार नहीं। तीसरा, संकल्प का आत्मसात होना—जिन गुणों की पूजा की, उन्हें जीवन में उतारना।

गणपति अथर्वशीर्ष गणेश को प्रत्यक्ष तत्त्व और सर्वव्यापक चेतना के रूप में प्रणाम करता है। इस भावभूमि में विसर्जन अनुपस्थिति नहीं, विस्तार है। चौकी से उठी प्रतिमा जल में मिलती है; पूजा-स्थान से उठी सीख घर के प्रत्येक कमरे में फैलनी चाहिए।

विदाई से पहले घर की पूजा

परम्पराएँ भिन्न हो सकती हैं, किन्तु सामान्य भाव-विधि सरल है:

  1. नियत समय पर अन्तिम पूजा, दीप और आरती करें।
  2. उपलब्ध पुष्प, दूर्वा और सात्त्विक नैवेद्य अर्पित करें। यात्रा के लिए अत्यधिक सामग्री जोड़ना आवश्यक नहीं।
  3. इन दिनों में हुई किसी भूल के लिए क्षमा माँगें और परिवार के मंगल की प्रार्थना करें।
  4. उत्तरपूजा की अपनी पारिवारिक विधि हो तो उसका पालन करें; औपचारिक प्राण-प्रतिष्ठा पुरोहित ने कराई हो तो विसर्जन-विधि भी उनके निर्देश से करें।
  5. प्रतिमा को सम्मान से उठाएँ। जयघोष हो, पर ऐसा शोर नहीं जो रोगी, वृद्ध, शिशु, पशु या पड़ोसी के लिए पीड़ा बन जाए।
  6. स्थानीय प्रशासन द्वारा निर्धारित घाट, कृत्रिम तालाब या संग्रह-केन्द्र का उपयोग करें। घर में छोटी प्राकृतिक-मिट्टी की प्रतिमा विसर्जित करें तो जल का बाद में पौधों/मिट्टी में सम्मानजनक उपयोग स्थानीय निर्देशों के अनुरूप किया जा सकता है।

प्रकृति-विरोधी सामग्री और भक्ति का प्रश्न

कभी प्रतिमाएँ स्थानीय मिट्टी और प्राकृतिक रंगों से बनती थीं। आज प्लास्टर ऑफ पेरिस, रासायनिक रंग, प्लास्टिक और थर्मोकोल जल में लम्बे समय तक बने रह सकते हैं और प्रदूषण बढ़ा सकते हैं। केन्द्रीय प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड के संशोधित दिशा-निर्देश प्राकृतिक, जैव-अवक्रमणीय सामग्री और निर्धारित विसर्जन-व्यवस्था पर बल देते हैं।

पर्यावरण-सम्मत विसर्जन परम्परा के विरुद्ध नहीं, उसके मूल भाव की रक्षा है। जिस नदी में हम देवता को विदा कहते हैं, उसी नदी को विषाक्त छोड़ देना आध्यात्मिक विरोधाभास होगा। पृथ्वी, जल, वनस्पति और जीव—इन सबमें दिव्यता देखने वाली दृष्टि के लिए स्वच्छ विसर्जन पूजा का अन्तिम उपचार है।

“मोरया” की पुकार में क्या है?

“गणपति बप्पा मोरया” केवल भीड़ का नारा नहीं; हमारी अपनी और सामूहिक गणेश-भक्ति का हृदय है। इसके साथ बोला जाने वाला “पुढच्या वर्षी लवकर या”—अगले वर्ष शीघ्र आइए—विदाई को अन्तिम नहीं रहने देता। मनुष्य जानता है कि जीवन में रूप बदलते हैं, लोग दूर होते हैं, ऋतुएँ लौटती हैं। वह विरह को आशा में बदलने के लिए पुकारता है।

यह पुकार हमें एक और बात सिखाती है: अगले वर्ष वही बप्पा आएँगे, पर क्या वही पुराना मन उनका स्वागत करेगा? यदि क्रोध वैसा ही रहा, अपव्यय वैसा ही रहा और सम्बन्धों की दूरी वैसी ही रही, तो उत्सव लौटेगा—साधना नहीं।

घर लौटते समय एक मौन संकल्प

विसर्जन-स्थल से लौटते समय हाथ खाली होते हैं। यही खालीपन पूजा का अन्तिम प्रसाद हो सकता है। उसमें नया संकल्प रखा जा सकता है—वाणी में संयम, काम में अनुशासन, परिवार में श्रवण, समाज में सेवा और प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व।

घर पहुँचकर चौकी सूनी दिखेगी। दीपक का धुआँ कुछ क्षण हवा में रहेगा। किन्तु यदि बप्पा की विशाल श्रवण-शक्ति हमारे धैर्य में, उनका एकदन्त हमारे लक्ष्य में, उनका वक्रतुण्ड हमारी समाधान-क्षमता में और उनका मंगल हमारी करुणा में उतर आया—तो विसर्जन हुआ ही कहाँ?

प्रतिमा जल में गई है। गणेश अब जीवन में प्रतिष्ठित हैं।

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