Krishna figure playing a flute on a flower-filled forest path

श्रीकृष्ण का दिव्य तेज और आभामण्डल

श्रीकृष्ण का रंग श्याम है, पर उनका स्वरूप—अनन्त प्रकाश का आश्रय है। वे वर्षा से भरे मेघ जैसे गम्भीर नीलवर्ण हैं, फिर भी उनकी एक मुस्कान ब्रज के हृदय को आलोकित कर देती है। माता देवकी के गर्भ में उनका आगमन होता है तो कारागार की निस्तब्धता में छिपी हुई अग्नि जैसी प्रभा जागती है। वसुदेव उन्हें पहली बार देखते हैं तो पीताम्बर, कौस्तुभ और दिव्य आभूषणों से प्रकाशित चतुर्भुज बालक सामने है। अर्जुन उसी आत्मीय कृष्ण का विश्वरूप देखता है तो उसकी दीप्ति की तुलना एक साथ उदित हजार सूर्यों से की जाती है।

श्रीकृष्ण का आभामण्डल – श्रीकृष्ण का दिव्य प्रकाश – तेजस्, प्रभा, भा, द्युति, कान्ति, ज्योति, त्विषा और दीप्ति 

ये शब्द भगवान् के स्वरूप की प्रत्यक्ष कान्ति हैं – कहीं उनका विराट तेज, कहीं भक्त के हृदय में जागने वाला ज्ञान-प्रकाश और कहीं वह दिव्य आकर्षण जिसके सामने ब्रज का प्रत्येक प्राणी स्वयं को भूल जाता है।

संस्कृत पदसामान्य अर्थ
तेजस्दिव्य सामर्थ्य, ओज और प्रकाश
प्रभाफैलने वाली दीप्ति अथवा प्रकाश
कान्तिमनोहर आभा और सौन्दर्य की चमक
द्युतिउज्ज्वलता, चमक अथवा दिव्य शोभा
ज्योतिप्रकाश; कई प्रसंगों में आध्यात्मिक प्रकाश
त्विषाचमक, वर्ण-दीप्ति अथवा तेज
दीप्तिप्रकाशित अथवा प्रज्वलित अवस्था
भा/भास्प्रकाश, शोभा और उज्ज्वलता

“श्याम” का अर्थ प्रकाश का अभाव नहीं है – पर प्रभु का अद्भुत तेज़ है। कृष्ण-वर्णन में यह नवीन, जलपूर्ण मेघ की गहरी नील-श्याम कान्ति का बोध कराता है। मेघ स्वयं गहरा दिखाई देता है, किन्तु उसी में जीवनदायिनी वर्षा और विद्युत् का प्रकाश स्थित होता है।

श्रीमद्भागवत में जन्म के समय श्रीकृष्ण के स्वरूप के लिए “सान्द्रपयोदसौभगम्” पद आता है—घने जलद अर्थात् मेघ जैसी अनुपम शोभा।

तमद्भुतं बालकमम्बुजेक्षणं
चतुर्भुजं शङ्खगदाद्युदायुधम्।
श्रीवत्सलक्ष्मं गलशोभिकौस्तुभं
पीताम्बरं सान्द्रपयोदसौभगम्॥

श्रीमद्भागवत महापुराण

वसुदेव ने उस अद्भुत बालक को देखा जिसके नेत्र कमल जैसे थे, चार भुजाओं में दिव्य आयुध थे, वक्षस्थल पर श्रीवत्स, कण्ठ में कौस्तुभ मणि और शरीर पर पीताम्बर था। उनकी शोभा सघन मेघ जैसी थी।

श्याम वर्ण और उसका प्रकाश साथ-साथ हैं। भगवान् की त्वचा की मेघ-सी गम्भीरता को कौस्तुभ, पीताम्बर और दिव्य आभूषणों की द्युति आलोकित करती है। वे किसी एक रंग के प्रकाश-वृत्त नहीं, सौन्दर्य के अनेक विरोधाभासों का दिव्य सामंजस्य हैं।

वसुदेव के हृदय में प्रकट हुआ तेज

श्रीकृष्ण जन्म से पहले श्रीमद्भागवत एक सूक्ष्म और आध्यात्मिक वर्णन देता है। भगवान् पहले वसुदेव के निर्मल हृदय में प्रकट होते हैं। उनके भीतर परमेश्वर की उपस्थिति से वसुदेव सूर्य के समान तेजस्वी दिखाई देते हैं।

इसके बाद भगवान् का दिव्य स्वरूप वसुदेव के हृदय से देवकी के हृदय में स्थापित होने का वर्णन आता है। भागवत इसकी तुलना पूर्व दिशा में उदित होने वाले चन्द्रमा से करता है।

ततो जगन्मङ्गलमच्युतांशं
समाहितं शूरसुतेन देवी।
दधार सर्वात्मकमात्मभूतं
काष्ठा यथानन्दकरं मनस्तः॥

श्रीमद्भागवत महापुराण

इसका भाव है कि देवकी ने जगत् के लिए मंगलमय, सर्वात्मा भगवान् को अपने भीतर उसी प्रकार धारण किया जैसे पूर्व दिशा उदित होते चन्द्रमा की आनन्ददायिनी प्रभा धारण करती है।

परमात्मा का दिव्य प्राकट्य रूप प्रकट होता है।

देवकी की कान्ति और कंस का भय

भगवान् के प्राकट्य से देवकी का स्वरूप अत्यन्त तेजस्वी हो गया। कारागार ने उन्हें संसार की दृष्टि से छिपा रखा था, जैसे किसी पात्र में रखी अग्नि बाहर से पूरी तरह दिखाई नहीं देती।

कंस ने देवकी की असाधारण कान्ति देखी और समझ गया कि जिस विष्णु से वह भयभीत है, वे उनके भीतर प्रकट हो चुके हैं। प्रकाश ने भक्त के लिए आशा और अत्याचारी के लिए भय का रूप ग्रहण किया।

एक ही प्रभा की अनुभूति व्यक्ति की आन्तरिक अवस्था के अनुसार बदलती है:

  • देवकी के लिए वह भगवान् की उपस्थिति है।
  • वसुदेव के लिए दिव्य आश्वासन।
  • देवताओं के लिए अवतरण का मंगल संकेत।
  • कंस के लिए अपने अधर्म के अन्त की सूचना।

सूर्य एक ही है—कमल को खिलाता है, रात्रिचर जीव को छिपने पर विवश करता है। उसी प्रकार भगवान् का तेज भक्त के लिए आनन्द और अधर्म से चिपके मन के लिए असह्य होता है।

जन्म के समय दिव्य स्वरूप की कान्ति

श्रीमद्भागवत के अनुसार श्रीकृष्ण जन्म लेते ही पहले सामान्य मानवीय शिशु के रूप में नहीं, चतुर्भुज विष्णु-स्वरूप में प्रकट हुए। उनका स्वरूप आभूषणों के कारण ही प्रकाशित नहीं था; आभूषण भी उनकी दिव्य देह से अर्थ और शोभा प्राप्त कर रहे थे।

अगले श्लोक में वसुदेव द्वारा देखे गए स्वरूप का विस्तार आता है:

महार्हवैदूर्यकिरीटकुण्डल-
त्विषा परिष्वक्तसहस्रकुन्तलम्।
उद्दामकाञ्च्यङ्गदकङ्कणादिभिर्
विरोचमानं वसुदेव ऐक्षत॥

श्रीमद्भागवत महापुराण

बहुमूल्य वैदूर्यमणि से जड़े किरीट और कुण्डलों की द्युति उनके केशों पर फैल रही थी। करधनी, बाजूबन्द, कंगन और अन्य आभूषणों के मध्य उनका स्वरूप विराजमान था।

यह वर्णन एक दिव्य उपस्थिति का है। नेत्र, वर्ण, पीताम्बर, कौस्तुभ, श्रीवत्स, केश और आभूषण—सब मिलकर उस कान्ति को व्यक्त करते हैं जिसे सामान्य सौन्दर्य की भाषा में पूरी तरह बाँधा नहीं जा सकता।

वृन्दावन में ऐश्वर्य छिपाने वाली माधुर्य-कान्ति

मथुरा के कारागार में वसुदेव ने श्रीकृष्ण को चतुर्भुज दिव्य स्वरूप में देखा। वृन्दावन में वही भगवान् अपनी विराट महिमा को बाल्य और माधुर्य के भीतर छिपा लेते हैं।

वहाँ उनका तेज – मोरपंख, वनमाला, पीतवस्त्र, बाँसुरी, घुँघराले केश, मन्द हास और कमल जैसे नेत्रों की आकर्षक कान्ति बन जाता है।

यज्ञ करने वाले ब्राह्मणों की पत्नियों ने वन में श्रीकृष्ण को देखा तो भागवत उनका स्वरूप इस प्रकार चित्रित करता है:

श्यामं हिरण्यपरिधिं वनमाल्यबर्ह-
धातुप्रवालनटवेषमनुव्रतांसे।
विन्यस्तहस्तमितरेण धुनानमब्जं
कर्णोत्पलालककपोलमुखाब्जहासम्॥

श्रीमद्भागवत महापुराण

वे श्यामवर्ण थे, स्वर्णिम पीतवस्त्र धारण किए हुए थे, वनमाला और मोरपंख से सुशोभित थे। उनका वेश नटवर था; एक हाथ सखा के कन्धे पर था और दूसरे में कमल था। कानों में कमल, कपोलों पर घुँघराली अलकें और मुखकमल पर हास था।

यह ऐसा माधुर्य है जो दृष्टि को हटने नहीं देता। भागवत का वृन्दावन बताता है कि दिव्यता इतनी आत्मीय हो जाती है कि गोपबालक उनके साथ भोजन बाँटते हैं और माता उन्हें अपने आँचल में छिपा लेती है।

कृष्ण का तेज और उनकी मुस्कान

शास्त्रीय कृष्ण-वर्णन में मुख, नेत्र और मुस्कान का विशेष महत्त्व है।वह भक्त के भय को हरने वाली कृपा की अभिव्यक्ति है।

कृष्ण के मुख की कान्ति:

  • यशोदा के वात्सल्य को जाग्रत करती है।
  • गोपबालकों के सख्य को गहरा करती है।
  • गोपियों के हृदय में परम प्रेम जगाती है।
  • अक्रूर को दर्शन की उत्कण्ठा देती है।
  • सुदामा की दरिद्रता के भीतर सम्मान का प्रकाश भरती है।
  • अर्जुन के संशय के बीच विश्वास बनाए रखती है।

इस आभा को – यह सम्बन्ध में – अनुभव होने वाली दिव्यता है। भगवान् का मुख वही रहता है, किन्तु प्रत्येक भक्त उसमें अपने भाव के अनुसार अनन्त रस देखता है।

महाभारत में श्रीकृष्ण की प्रभावमयी उपस्थिति

महाभारत श्रीकृष्ण के चारों ओर का विश्व है।

राजसूय यज्ञ में भीष्म उन्हें अग्रपूजा का अधिकारी मानते हैं। हस्तिनापुर में शान्तिदूत बनकर पहुँचने पर उनका प्रभाव पूरी सभा पर छा जाता है। दुर्योधन उन्हें बन्दी करना चाहता है, तब कृष्ण अपना दिव्य स्वरूप प्रकट करते हैं। कुरुक्षेत्र में वे अर्जुन के सारथी हैं, किन्तु भीष्म जैसे ज्ञानी उनके भीतर परमेश्वर को पहचानते हैं।

यह प्रभाव – सत्य, निर्भयता, करुणा, बुद्धि और दैवी सामर्थ्य का संयुक्त प्रकाश “तेज” कहलाता है – हमारे प्रभु का तेज।

गीता में दैवी सम्पदा के अन्तर्गत “तेज” का उल्लेख आता है। मनुष्य में तेज सत्य और धर्म से उत्पन्न आत्मिक सामर्थ्य हो सकता है; भगवान् में वही तेज असीम और मूल स्वरूप है।

विश्वरूप की हजार सूर्यों जैसी दीप्ति

श्रीकृष्ण के दिव्य तेज का सर्वाधिक विराट वर्णन भगवद्गीता के विश्वरूप-दर्शनयोग में मिलता है। कृष्ण अर्जुन को दिव्य दृष्टि देते हैं। संजय उस दृश्य की दीप्ति व्यक्त करने के लिए ऐसी उपमा चुनते हैं जो सामान्य मानवीय अनुभव की सीमा तोड़ देती है:

दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः॥

भगवद्गीता

यदि आकाश में एक साथ हजार सूर्य उदित हो जाएँ, तो भी उनकी प्रभा उस महात्मा विश्वरूप के प्रकाश के समान हो नहीं सकती।

अर्जुन आगे कहते हैं:

किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च
तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम्।
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्
दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम्॥

भगवद्गीता

मैं आपको किरीट, गदा और चक्र से युक्त, सब ओर प्रकाशित तेजोराशि के रूप में देख रहा हूँ। आपकी अग्नि और सूर्य जैसी अप्रमेय द्युति के कारण आपको देखना कठिन है। 

यहाँ “तेजोराशि”—तेज का पुंज—कृष्ण के विश्वरूप में प्रकाश उनके शरीर को घेरे हुए कोई बाहरी वस्तु नहीं; पूरा रूप ही प्रकाश, शक्ति, काल और अस्तित्व का विराट केन्द्र है।

विश्वरूप कृष्ण

विश्वरूप श्रीकृष्ण का दिव्य प्रकाश है, किन्तु कृष्ण-भक्ति केवल उसी विराट रूप पर समाप्त नहीं होती। विश्वरूप देखकर अर्जुन विस्मय और भय से भर जाते हैं। वे कृष्ण से पुनः अपना सौम्य रूप दिखाने की प्रार्थना करते हैं।

भगवान् पहले चतुर्भुज और फिर अपने आत्मीय मानवीय स्वरूप में लौटते हैं। अर्जुन शान्त होते हैं।

इस क्रम का आध्यात्मिक अर्थ गहरा है:

  • विश्वरूप बताता है कि कृष्ण समस्त जगत् और काल से परे परम सत्ता हैं।
  • चतुर्भुज रूप उनके विष्णु-ऐश्वर्य को प्रकट करता है।
  • द्विभुज श्यामसुन्दर स्वरूप भक्त को आत्मीय सम्बन्ध देता है।

विराट तेज भगवान् की शक्ति बताता है; श्यामसुन्दर की मुस्कान उनकी कृपा। भक्ति को दोनों की आवश्यकता है—महिमा का बोध और प्रेम की निकटता।

ब्रह्मज्योति और श्रीकृष्ण

वैदिक तथा वेदान्त परम्परा में ब्रह्म को परम ज्योति के रूप में भी समझा जाता है। आचार्य इस निर्गुण अथवा निराकार ब्रह्म-प्रकाश को भगवान् के परम स्वरूप से सम्बन्धित करते हैं।

भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं:

ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च।
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च॥

भगवद्गीता

अर्थात् मैं अविनाशी ब्रह्म, अमृत, सनातन धर्म और परम आनन्द का आधार हूँ।

भक्त के हृदय में कृष्ण का ज्ञान-प्रकाश

कृष्ण का प्रकाश केवल उनके दृश्य स्वरूप तक सीमित नहीं। भगवद्गीता में वे बताते हैं कि भक्त पर अनुकम्पा करके उसके भीतर अज्ञान से उत्पन्न अन्धकार को ज्ञान के प्रकाश से नष्ट करते हैं:

तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥

भगवद्गीता

अर्थात् भक्तों पर कृपा करने के लिए मैं उनके अन्तःकरण में स्थित होकर अज्ञानजनित अन्धकार को प्रकाशमान ज्ञानदीप से नष्ट करता हूँ।

यह श्लोक श्रीकृष्ण के दिव्य तेज का अत्यन्त आत्मीय स्वरूप प्रस्तुत करता है।

कृष्ण का ज्ञानदीप मनुष्य को स्वयं अपनी आसक्ति, भय, अहंकार और कर्तव्य की वास्तविकता देखने देता है। अर्जुन के भीतर यही हुआ—कुरुक्षेत्र का सूर्य पहले भी था, लेकिन कृष्ण के उपदेश ने उनकी बुद्धि का अन्धकार हटाया।

कृष्ण मन्त्र-जप

“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” अथवा कृष्ण-नाम का जप साधक को भगवान् के स्मरण, शरणागति और मन की एकाग्रता की ओर ले जा सकता है। नियमित भक्ति से व्यक्ति के व्यवहार में शान्ति, करुणा, संयम और विनम्रता बढ़े तो उसके आसपास के लोग उसकी उपस्थिति को अधिक प्रकाशमय अनुभव करते हैं।

भक्ति का लक्ष्य कृष्ण को स्मरण करना है।

  • क्या क्रोध पर संयम बढ़ रहा है?
  • क्या अहंकार कुछ नरम हुआ है?
  • क्या दूसरे जीवों के प्रति करुणा बढ़ी है?
  • क्या सत्य और धर्म के प्रति निष्ठा गहरी हुई है?
  • क्या संकट में भगवान् का स्मरण सहज होता जा रहा है?

यदि प्रकाश का अनुभव हो, पर व्यवहार में असत्य और कठोरता बनी रहे, तो साधना अभी जीवन में नहीं उतरी।

श्रीकृष्ण का आभामण्डल, जैसा हम ध्यान करते हैं

  • शरीर की श्याम अथवा नील-मेघ जैसी कान्ति
  • पीताम्बर की स्वर्णिम शोभा
  • कौस्तुभ मणि की द्युति
  • श्रीवत्स का चिह्न
  • मोरपंख के बहुवर्ण
  • वनमाला की प्राकृतिक छटा
  • मुख और नेत्रों की प्रसन्न प्रभा
  • विश्वरूप का अग्नि और सूर्य जैसा तेज

श्यामसुन्दर: जो प्रकाश को भी सौन्दर्य बना देते हैं

श्रीकृष्ण का तेज आनन्ददायक है। विश्वरूप में वह दुर्निरीक्ष्य—देखने में कठिन—हैं; वृन्दावन में वही तेज मन्द हास बनकर भक्त को अपने पास बुलाता है।

यही कृष्ण के दिव्य स्वरूप का रहस्य है:

  • कंस उनके तेज से भयभीत है।
  • देवकी उसी तेज से धन्य होती हैं।
  • वसुदेव उनमें चतुर्भुज भगवान् देखते हैं।
  • यशोदा उस दिव्यता को भूलकर अपने पुत्र को बाँधती हैं।
  • गोपबालक उसी परम प्रकाश के साथ वन में भोजन करते हैं।
  • गोपियाँ उनकी बाँसुरी की ध्वनि में प्रकाश का अनुभव करती हैं।
  • अर्जुन उनमें हजार सूर्यों से बढ़कर दीप्ति देखते हैं।
  • भक्त अपने हृदय में उन्हें ज्ञानदीप के रूप में पाते हैं।

एक ही कृष्ण—पर सम्बन्ध के अनुसार प्रकाश की अनुभूति अलग।

श्रीकृष्ण की आभा जीवन में कैसे उतरे?

वह अपने जीवन को इतना स्वच्छ बनाने का प्रयास करता है कि कृष्ण-स्मरण उसके आचरण में प्रतिबिम्बित हो सके।

श्रीकृष्ण की आभा को जीवन में उतारने का अर्थ:

  • सत्य बोलना, क्योंकि असत्य अन्तःकरण को धूमिल करता है।
  • करुणा रखना, क्योंकि वासुदेव प्रत्येक हृदय में स्थित हैं।
  • कर्तव्य करना, क्योंकि गीता निष्क्रियता नहीं सिखाती।
  • अहंकार न करना, क्योंकि उपलब्धियाँ भी भगवान् की शक्ति पर आश्रित हैं।
  • नाम-जप करना, ताकि मन बार-बार परम केन्द्र की ओर लौटे।
  • शास्त्र पढ़ना, ताकि भाव अज्ञान और अतिशयोक्ति में न बदल जाए।
  • सेवा करना, क्योंकि भक्ति केवल निजी अनुभव नहीं है।
  • प्रसन्नता बाँटना, क्योंकि कृष्ण की मुस्कान स्वयं भक्तवत्सलता का प्रकाश है।

शरीर के चारों ओर प्रकाश दिखाई दे अथवा न दे, कृष्ण-भक्ति की सच्ची कान्ति व्यवहार में दिखाई देनी चाहिए।

कारागार से हृदय तक फैलता प्रकाश

श्रीकृष्ण का जन्म अन्धकारमय मध्यरात्रि में हुआ। उनका पहला लौकिक निवास कंस का कारागार था। फिर भी भागवत उस रात्रि को अन्धकार की विजय नहीं, प्रकाश के प्राकट्य की रात्रि बनाता है।

कारागार की दीवारें – बन्द द्वार खुल गए। शृंखलाएँ ढीली हो गईं। यमुना ने मार्ग दिया। श्यामसुन्दर गोकुल पहुँचे और साधारण गोपाल-गृह उनके आनन्द का धाम बन गया।

यही श्रीकृष्ण के दिव्य तेज का सबसे जन-स्पर्शी अर्थ है। वह मनुष्य की सबसे बन्द, भयभीत और अन्धकारपूर्ण अवस्था के भीतर जन्म लेने वाली आशा भी है।

जिस हृदय में कृष्ण का स्मरण जागता है – और वही जीवन का परम और एकमात्र अनुभव हो जाता है – वहाँ समस्याएँ, अन्धकार – ना होकर – भीतर ज्ञान का दीप, प्रेम की ऊष्मा और परम आश्रय की ज्योति जल उठती है।

श्रीकृष्ण श्याम हैं क्योंकि उनकी गहराई का कोई अन्त नहीं। वे प्रकाश हैं क्योंकि उनके बिना कुछ भी अपने वास्तविक स्वरूप में दिखाई नहीं देता।

Discover more from TatvaDhi

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading