Elderly woman praying at a decorated stone shrine with hanging lamps in a forest at dusk

प्रदोष व्रत कथा: स्कन्दपुराण में राजा सत्यरथ से धर्मगुप्त के राज्याभिषेक तक शिवकृपा का सम्पूर्ण आख्यान

स्कन्दपुराण, ब्रह्मखंड–ब्रह्मोत्तरखण्ड- सम्पूर्ण कथा-क्रम पर आधारित मौलिक साहित्यिक पुनर्कथन

कैसे एक अनाथ राजकुमार भिक्षा से पलते हुए प्रदोष में शिव-आराधना के मार्ग पर चला और पुनः विदर्भ का राजा बना—स्कन्दपुराण पर आधारित सम्पूर्ण कथा

त्रयोदशी की संध्या उतर रही हो, दिन अपनी प्रभा समेट रहा हो और रात्रि अभी पूर्णतः पृथ्वी पर न उतरी हो—सनातन शिवोपासना में यही मध्यवर्ती काल प्रदोष कहलाता है।

स्कन्दपुराण प्रदोष को केवल घड़ी और तिथि की गणना नहीं मानता। उसके वर्णन में यह भगवान महादेव की विशेष आराधना की  बेला है। सूतजी कहते हैं कि त्रयोदशी की सायंकालीन बेला प्रदोष है; उस समय कैलास के रजत-भवन में महादेव नृत्य करते हैं और देवता उनके गुणों का स्तवन करते हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की अभिलाषा रखने वाले मनुष्य को उस समय शिव की पूजा, होम, कथा और गुणगान करना चाहिए।

पर स्कन्दपुराण केवल विधान बताकर आगे नहीं बढ़ता।

वह प्रश्न करता है—यदि मनुष्य शिवोपासना के इस काल की उपेक्षा करे तो क्या होता है? और यदि विपत्ति, दरिद्रता तथा भाग्य-विपर्यय से घिरा हुआ मनुष्य पुनः प्रदोष में शिव की शरण ले, तो साधना उसके जीवन को कहाँ तक ले जा सकती है?

उत्तर में एक दीर्घ कथा आती है।

एक राजा से आरम्भ होकर एक अनाथ शिशु तक पहुँचती हुई कथा।

एक निर्धन ब्राह्मणी से आरम्भ होकर गन्धर्वराज तक जाती हुई कथा।

भिक्षापात्र से राजसिंहासन तक पहुँचती हुई कथा।

यह है विदर्भराज सत्यरथ और उनके पुत्र धर्मगुप्त की प्रदोष व्रत कथा।

विदर्भ में राजा सत्यरथ का राज्य

विदर्भ देश में सत्यरथ नामक एक राजा थे।

स्कन्दपुराण में उनका परिचय धर्मपरायण, धीर, सुशील और सत्यप्रतिज्ञ नरेश के रूप में दिया गया है। वे धर्मपूर्वक पृथ्वी का पालन करते हुए दीर्घकाल तक सुख से राज्य करते रहे।

किन्तु सुख की यह धारा स्थायी नहीं रही।

शाल्व देश के राजाओं ने विदर्भ पर आक्रमण कर दिया। नगर चारों ओर से घिर गया। सत्यरथ विशाल सेना लेकर युद्धभूमि में उतरे। भीषण संग्राम हुआ। शाल्वों की बड़ी सेना का विनाश हुआ, पर अन्ततः स्वयं सत्यरथ भी युद्ध में मारे गए। उनके साथ मंत्री भी मृत्यु को प्राप्त हुए और शेष सैनिक छिन्न-भिन्न होकर भाग निकले।

एक क्षण में राजसत्ता समाप्त हो गई।

पर उसी समय राजवंश का भविष्य अभी गर्भ में जीवित था।

गर्भवती रानी का वन की ओर प्रस्थान

सत्यरथ की एक पतिव्रता रानी उस समय गर्भवती थीं।

पति युद्ध में मारे जा चुके थे। राजधानी शत्रुओं से घिर चुकी थी। अतः रात्रि में वह राजभवन से निकल गईं और पश्चिम दिशा की ओर बढ़ चलीं।

प्रभात हुआ।

वह धीरे-धीरे आगे बढ़ती रहीं और बहुत दूर जाने के बाद एक स्वच्छ जलाशय तक पहुँचीं। उसके तट पर एक छायादार वृक्ष था। वहीं उस निर्जन स्थान में रानी ने शुभ मुहूर्त में एक पुत्र को जन्म दिया।

राजा नहीं रहा था।

राज्य नहीं रहा था।

किन्तु वंश का एक दीप धरती पर आ चुका था।

फिर नियति ने एक और कठोर आघात किया।

प्रसव के बाद रानी को तीव्र प्यास लगी। वह जल पीने के लिए सरोवर में उतरीं। तभी एक विशाल ग्राह ने उन्हें अपना ग्रास बना लिया।

शिशु जन्म लेते ही माता और पिता—दोनों से विहीन हो गया।

वह सरोवर के तट पर भूख और प्यास से व्याकुल होकर रोने लगा।

यही वह बिन्दु है जहाँ स्कन्दपुराण की कथा राजवैभव को पूर्णतः पीछे छोड़ देती है।

अब कथा में कोई राजमहल नहीं।

केवल भूमि पर पड़ा एक नवजात बालक है।

और उसके पास पहुँचती है एक निर्धन स्त्री।

निर्धन ब्राह्मणी उमा: जहाँ कुल से पहले करुणा खड़ी हुई

उसी समय वहाँ एक ब्राह्मणी पहुँची।

उसका नाम था—उमा

उसकी गोद में उसका अपना लगभग एक वर्ष का बालक था। वह स्वयं विधवा और अत्यन्त निर्धन थी। घर-घर भिक्षा माँगकर किसी प्रकार जीवन चलाती थी।

उमा ने उस रोते हुए नवजात को देखा।

नाल अभी तक नहीं कटी थी।

माता-पिता का कहीं पता नहीं था।

कोई सम्बन्धी निकट नहीं था।

मातृहृदय ने उसे उठाना चाहा, किन्तु तत्काल उसके भीतर उस समय की सामाजिक मर्यादा का प्रश्न उठा—यह बालक किस कुल में उत्पन्न हुआ है? बिना जाने वह उसे स्पर्श कैसे करे?

वह उसे छोड़ना नहीं चाहती थी, पर संशय में खड़ी थी।

उसी समय वहाँ एक संन्यासी महात्मा आए। वे ऐसे प्रतीत होते थे, मानो साक्षात् शंकर हों।

उन्होंने उमा से कहा कि वह शोक और संशय छोड़कर बालक की रक्षा करे; उससे उसे शीघ्र परम कल्याण प्राप्त होगा। इतना कहकर वह दयालु भिक्षु वहाँ से चले गए।

उमा ने अब संशय नहीं किया।

जिस स्त्री के पास अपने पुत्र के लिए भी सम्पत्ति नहीं थी, उसने एक और शिशु को उठा लिया।

यही प्रदोष-कथा का पहला महत्त्वपूर्ण प्रकाश है—

कृपा कभी-कभी उस हाथ से आरम्भ होती है जो स्वयं रिक्त होता है।

राजकुमार भिक्षा के अन्न पर पलने लगा

उमा उस बालक को अपने घर ले आई और अपने पुत्र की भाँति उसका पालन करने लगी।

उसका घर एकचक्र नामक नगर में था। वह भिक्षा से प्राप्त अन्न के द्वारा अपने पुत्र और राजकुमार दोनों को पालती रही। समय के साथ दोनों के संस्कार हुए, उपनयन सम्पन्न हुआ और दोनों नियमपालन करने लगे। वे अपनी माता के साथ भिक्षा के लिए भी जाते थे।

विचित्र दृश्य था।

जिसके लिए राजसिंहासन नियत था, वह भिक्षा माँग रहा था।

जिसकी माता महारानी थी, उसे अब एक निर्धन विधवा ने अपने पुत्र की भाँति पाला था।

जन्म से क्षत्रिय राजपुत्र जीवन की परिस्थितियों से ब्राह्मण बालक के साथ उसी प्रकार बढ़ रहा था।

और तब कथा में प्रवेश करते हैं महर्षि शाण्डिल्य

शाण्डिल्य मुनि ने पहचान लिया राजवंश का बालक

एक दिन उमा दोनों बालकों के साथ भिक्षा माँगते हुए एक देवमन्दिर पहुँची। वहाँ वृद्ध ऋषि-मुनि निवास करते थे।

उनमें परम बुद्धिमान शाण्डिल्य भी थे।

राजपुत्र पर दृष्टि पड़ते ही उन्होंने कर्म की गति पर आश्चर्य प्रकट किया। उन्होंने कहा कि दैव की गति अत्यन्त विचित्र है और कर्म का उल्लंघन किसी जीव के लिए सरल नहीं। उन्होंने उस बालक की ओर संकेत किया, जो दूसरी माता की शरण में भिक्षा से जीवन निर्वाह कर रहा था।

उमा विस्मित हुई।

उसने शाण्डिल्य से पूछा—यह बालक कौन है? किस कुल का है? इसके माता-पिता कौन हैं?

तब ऋषि ने बताया—

यह विदर्भ के राजा का पुत्र है।

उसके पिता युद्ध में मारे गए और उसकी माता सरोवर में ग्राह का ग्रास बन गई।

अब उमा के सामने केवल पहचान का प्रश्न नहीं था।

उसने पूछा—यदि राजा धर्मात्मा था, तो युद्ध में ऐसी मृत्यु क्यों हुई? उसका पुत्र राजकुल में जन्म लेकर दरिद्र क्यों हुआ? वह पुनः अपना राज्य कैसे प्राप्त करेगा? और मेरे अपने पुत्र की दरिद्रता किस प्रकार दूर होगी?

यहीं से प्रदोष-व्रत कथा का कर्म-सिद्धान्त खुलता है।

सत्यरथ के पूर्वजन्म और अधूरी प्रदोष-पूजा का रहस्य

शाण्डिल्य ने बताया कि वर्तमान जन्म में विदर्भराज बने सत्यरथ पूर्वजन्म में पाण्ड्य देश के राजा थे।

वे धर्म के ज्ञाता और धर्मपूर्वक राज्य करने वाले नरेश थे।

एक दिन प्रदोषकाल में वह भगवान शंकर की पूजा कर रहे थे। तभी नगर में तीव्र कोलाहल उठा। राजा को किसी उपद्रव की आशंका हुई और उन्होंने शिवपूजा बीच में ही छोड़ दी।

उसी समय उनका मंत्री एक शत्रु सामन्त को बन्दी बनाकर लाया। राजा ने क्रोध में उसका मस्तक कटवा दिया।

इसके पश्चात् राजा न तो अपनी अधूरी पूजा पूरी करने लौटे, न पूजा-नियम का विधिवत् समापन किया; उन्होंने रात्रि में भोजन कर लिया।

उनका पुत्र भी प्रदोषकालीन शिवपूजा किए बिना भोजन करके सो गया।

वही पाण्ड्यराज अगले जन्म में विदर्भराज बना और शिवपूजा में पड़े विघ्न के कर्मफल के कारण सुखभोग के बीच शत्रुओं के हाथ मारा गया। पूर्वजन्म का उसका पुत्र भी इस जन्म में उसी का पुत्र हुआ और प्रदोष-पूजन की उपेक्षा के कारण दरिद्रता में पड़ा।

राजकुमार की माता के विषय में शाण्डिल्य ने कहा कि पूर्वजन्म में उसने छल से अपनी सपत्नी की हत्या की थी और उसी कर्म के कारण वर्तमान जन्म में ग्राह द्वारा उसका अन्त हुआ। यह कारण स्वयं इसी कथा-पाठ में दिया गया है।

यहाँ कथा का आशय केवल कर्मफल का भय नहीं है।

शाण्डिल्य तत्काल समाधान की ओर मुड़ते हैं—

ईश्वर के चरणों की सेवा।

प्रदोषकाल में एकाग्र होकर परमेश्वर की आराधना।

उमा के पुत्र की दरिद्रता का कारण

ब्राह्मणी ने अपने पुत्र के विषय में भी पूछा था।

शाण्डिल्य ने कहा कि उसका पुत्र पूर्वजन्म में उत्तम ब्राह्मण था, किन्तु उसने अपना जीवन मुख्यतः दान ग्रहण करने में बिताया और यज्ञ आदि सत्कर्मों का अनुष्ठान नहीं किया। इसी कारण वह वर्तमान जन्म में दरिद्र हुआ।

ऋषि ने उसके लिए भी एक ही आश्रय बताया—

भगवान शंकर की शरण।

अब कथा के भीतर ही प्रदोष-व्रत की विधि आरम्भ होती है।

शाण्डिल्य द्वारा प्रदोष-व्रत और शिवपूजन की विधि

शाण्डिल्य बताते हैं कि दोनों पक्षों की त्रयोदशी को उपवास किया जाए। सूर्यास्त से तीन घड़ी पूर्व स्नान कर श्वेत वस्त्र धारण किए जाएँ। संध्या और जप आदि नित्यकर्म पूर्ण कर मौन तथा संयम के साथ शिवपूजा आरम्भ हो।

पूजास्थल को शुद्ध किया जाए, मण्डल बनाया जाए, फल-पुष्प और नवीन अंकुरों से उसे अलंकृत किया जाए। आत्मशुद्धि, भूतशुद्धि, प्राणायाम और न्यास के पश्चात् हृदय-कमल में भगवान शिव का ध्यान किया जाए। भगवान के वामभाग में गिरिराजनन्दिनी उमा का चिन्तन हो।

फिर संकल्प और आवाहन किया जाए।

इस पूजा में एक अत्यन्त मानवीय प्रार्थना आती है—ऋण, पाप, दुर्भाग्य, दरिद्रता, दुःख, रोग और संसारभय से मुक्ति की।

अभिषेक में शंख-जल और पंचामृत का विधान है। उसके बाद वस्त्र, यज्ञोपवीत, आभूषण, चन्दन, बिल्व और उपलब्ध पुष्प, धूप, दीप तथा नैवेद्य अर्पित करने का निर्देश है।

किन्तु इस विस्तृत विधान के मध्य स्कन्दपुराण एक अत्यन्त सरल और उदार बात कहता है—

यदि साधक के पास इतना धन अथवा सामर्थ्य न हो, तो वह अपनी सामर्थ्य के अनुसार पूजा करे। गौरीपति भगवान शंकर भक्तिपूर्वक अर्पित एक पुष्प से भी सन्तुष्ट होते हैं।

यहीं कर्मकाण्ड का बाह्य वैभव भक्ति के आन्तरिक सत्य के सामने विनम्र हो जाता है।

प्रदोष में शिव से प्रार्थना

पूजा के पश्चात् स्तवन का विधान है। ब्रह्मोत्तरखण्ड के अन्तर्गत शिवस्तुति के अंश दिए गए हैं।

जय देव जगन्नाथ जय शंकर शाश्वत।
जय सर्वसुराध्यक्ष जय सर्वसुरार्चित॥

जय सर्वगुणातीत जय सर्ववरप्रद।
जय नित्य निराधार जय विश्वम्भराव्यय॥

अर्थ स्पष्ट है—जगत् के स्वामी, सनातन शंकर, देवों के अधीश्वर, समस्त गुणों से परे और वर प्रदान करने वाले महादेव की जय हो।

इसी प्रार्थना में साधक अपनी दीनता छिपाता नहीं। वह शिव के सामने अपने ऋण, रोग, दुःख, कर्मबन्धन और ग्रहपीड़ा तक रख देता है—

प्रसीद मे महादेव संसारार्तस्य खिद्यतः…
ग्रहैः प्रपीड्यमानस्य प्रसीद मम शंकर॥

भाव यह है—हे महादेव! संसार के दुःख से क्लान्त मुझ पर प्रसन्न हों; कर्मों और ग्रहपीड़ा से व्याकुल मुझ पर कृपा करें।

धनवान अथवा राजा के लिए भी प्रार्थना केवल व्यक्तिगत ऐश्वर्य तक सीमित नहीं रखी गई। उसके राज्य में लुटेरे न हों, प्रजा निर्भय रहे, अकाल और महामारी शान्त हों, खेती धन-धान्य से सम्पन्न हो और सभी दिशाओं में सुख रहे—ऐसी लोकमंगल की कामना भी कही गई है।

शाण्डिल्य ने कहा—एक वर्ष प्रदोष में शिव की आराधना करो

पूजा-विधान बताकर शाण्डिल्य ने उमा से कहा कि यदि दोनों बालक प्रत्येक प्रदोष में इसी प्रकार भगवान शंकर की आराधना करें तो वर्षभर के भीतर उत्तम सिद्धि प्राप्त करेंगे।

उमा ने दोनों बच्चों के साथ ऋषि को प्रणाम किया।

और यहीं पहली बार दोनों बालकों के नाम स्पष्ट होते हैं।

उसने कहा—

मेरा पुत्र शुचित्रत है।

और इस राजकुमार का नाम मैंने धर्मगुप्त रखा है।

शाण्डिल्य ने दोनों को भगवान शंकर की आराधना से सम्बन्धित मन्त्रविद्या का उपदेश दिया।

और दोनों कुमार प्रत्येक प्रदोष में पार्वतीवल्लभ शिव की पूजा करने लगे।

चार महीने बाद—शुचित्रत को मिला निधि-कलश

चार महीने बीत गए।

एक दिन शुचित्रत अकेला नदी के तट पर स्नान करने गया। वहाँ जल के आघात से भूमि कट गई थी और उसके भीतर गड़ा हुआ एक विशाल खजाने का कलश दिखाई दिया।

उसने उसे देवकृपा मानकर घर लाकर माता के सामने रखा।

उमा ने धर्मगुप्त को भी बुलाया और कहा—दोनों इसे समान रूप से बाँट लो।

यहाँ धर्मगुप्त के चरित्र की एक अत्यन्त सुन्दर रेखा सामने आती है।

उसने धन लेने से इनकार कर दिया।

उसका भाव था—यह तुम्हारे पुत्र के पुण्य से उसे मिला है। मैं उसका भाग क्यों ग्रहण करूँ? वह स्वयं इसका उपभोग करे। भगवान शंकर मुझ पर भी कृपा करेंगे।

धर्मगुप्त अभी भी निर्धन था।

राज्य अभी भी शत्रुओं के हाथ था।

किन्तु उसने दूसरे के भाग पर अधिकार नहीं किया।

उसकी आस्था प्रतीक्षा करना जानती थी।

एक वर्ष पूरा हुआ 

दोनों कुमारों की शिवपूजा करते हुए एक वर्ष पूर्ण हो गया।

एक दिन वसन्त ऋतु में धर्मगुप्त और शुचित्रत वन में भ्रमण के लिए निकले। कुछ दूर जाकर उन्होंने अनेक गन्धर्वकन्याओं को क्रीड़ा करते देखा।

शुचित्रत ने आगे जाने को उचित नहीं माना और दूर ही रुक गया।

धर्मगुप्त अकेला आगे गया।

उन कन्याओं में एक युवती ने धर्मगुप्त को देखा और अपनी सखियों को पुष्प लेने के लिए कुछ दूर भेज दिया।

धर्मगुप्त उसके पास पहुँचा।

उसने पल्लवों का आसन दिया और राजकुमार से उसका परिचय पूछा।

धर्मगुप्त ने अपने जीवन की वास्तविकता छिपाई नहीं—

वह विदर्भराज का पुत्र है; माता-पिता नहीं रहे; शत्रुओं ने राज्य ले लिया है और वह दूसरे के राज्य में जीवन व्यतीत कर रहा है।

फिर उसने उस कन्या से उसका नाम पूछा।

उसने उत्तर दिया—

उसके पिता समस्त गन्धर्वकुल में अग्रणी द्रविक नामक गन्धर्व हैं और उसका अपना नाम अंशुमती है।

अंशुमती और धर्मगुप्त

अंशुमती के मन में धर्मगुप्त के प्रति अनुराग उत्पन्न हुआ था। उसने अपने गले से मोतियों का हार उतारकर उसे दिया।

पर धर्मगुप्त ने फिर वही धर्मबुद्धि दिखाई।

उसने कहा—मैं राज्यहीन और निर्धन हूँ; तुम अपने पिता के संरक्षण में हो। पिता की आज्ञा का उल्लंघन कर अपनी इच्छा से ऐसा निर्णय कैसे कर सकती हो?

अंशुमती ने उसका कथन स्वीकार किया। उसने कहा कि वह पिता की आज्ञा के विपरीत नहीं चलेगी और धर्मगुप्त को दो दिन बाद पुनः उसी स्थान पर आने के लिए कहा।

धर्मगुप्त लौट आया।

निर्धारित समय पर वह पुनः शुचित्रत के साथ वन पहुँचा।

इस बार वहाँ अंशुमती अकेली नहीं थी।

उसके पिता द्रविक भी उपस्थित थे।

कैलास से आया धर्मगुप्त के लिए आदेश

गन्धर्वराज ने दोनों कुमारों का अभिनन्दन किया और धर्मगुप्त को अपने समीप बैठाया।

फिर उन्होंने जो कहा, वही सम्पूर्ण प्रदोष-कथा का चरम बिन्दु है।

द्रविक ने बताया कि वे कैलास गए थे। वहाँ उन्होंने पार्वती सहित महादेव के दर्शन किए।

भगवान शिव ने उन्हें बुलाकर धर्मगुप्त के विषय में कहा—

पृथ्वी पर धर्मगुप्त नाम का एक राजकुमार है। वह इस समय अकिंचन और राज्यविहीन है। शत्रुओं ने उसका देश छीन लिया है, पर वह अपने गुरु की आज्ञा के अनुसार निरन्तर मेरी आराधना में लगा हुआ है।

भगवान ने गन्धर्वराज को उसकी सहायता करने का आदेश दिया और कहा कि धर्मगुप्त शत्रुओं का विनाश करके पुनः अपने राज्य-सिंहासन पर बैठेगा। पाठ में यह भी कहा गया है कि उसकी आराधना के प्रभाव से उसके पितर शिवस्वरूप को प्राप्त हुए।

धर्मगुप्त गुरु की आज्ञा से पूजा करता रहा।

और कथा के अनुसार सहायता का आदेश कैलास से उसके लिए आया।

यही प्रदोष-आख्यान की सबसे प्रभावशाली आध्यात्मिक छवि है।

अंशुमती का विवाह और गन्धर्वराज की सहायता

द्रविक ने धर्मगुप्त से कहा कि यह सब परमदयालु भगवान शिव की प्रेरणा से हो रहा है।

उन्होंने अपनी पुत्री अंशुमती को धर्मगुप्त की पत्नी के रूप में देने और उसके शत्रुओं को परास्त कर उसे पुनः राज्य दिलाने का निश्चय किया। उन्होंने यह भी आशीर्वचन दिया कि धर्मगुप्त अंशुमती के साथ दीर्घकाल सुख भोगकर अन्ततः शिवलोक को प्राप्त होगा।

उसी वन में विवाह सम्पन्न हुआ।

गन्धर्वराज ने धर्मगुप्त को रत्न, आभूषण, वस्त्र, स्वर्णसामग्री, हाथी, घोड़े, रथ, धनुष, अस्त्र-शस्त्र, कवच और अन्य युद्धोपयोगी सामग्री प्रदान की। कन्या की सेवा के लिए दासियाँ और राजकुमार की सहायता के लिए गन्धर्वों की चतुरंगिणी सेना भी दी गई।

कल तक जिस धर्मगुप्त के पास अपना राज्य तक नहीं था, आज उसके साथ एक सेना थी।

किन्तु कथा इसका श्रेय उसके राजवंश को नहीं देती।

सूत्र बार-बार उसी ओर लौटता है—

गुरुवचन से की गई भगवान शंकर की आराधना।

धर्मगुप्त की विदर्भ वापसी

विवाह के पश्चात् धर्मगुप्त गन्धर्व सेना के साथ अपने नगर की ओर चला।

उसने शत्रुसेना का संहार किया और राजधानी में प्रवेश किया।

ब्राह्मणों और मन्त्रियों ने मिलकर उसका अभिषेक किया।

वह रत्नमय सिंहासन पर आरूढ़ हुआ और निष्कण्टक राज्य करने लगा।

इस कथा का अन्त केवल राज्य मिलने में नहीं है।

उसका वास्तविक सौन्दर्य अगली कुछ पंक्तियों में है।

जिस ब्राह्मणी ने उसे अपने पुत्र की भाँति पाला था—

वही उसकी माता हुई।

जिस द्विजकुमार के साथ उसने भिक्षा माँगी थी—

वही उसका भाई हुआ।

और गन्धर्वराज की पुत्री अंशुमती—

महारानी के पद पर प्रतिष्ठित हुई।

ग्रन्थ कहता है कि भगवान शंकर की आराधना करके धर्मगुप्त विदर्भ का राजा बना।

भिक्षापात्र से राजसिंहासन तक—पर कथा का अर्थ केवल राज्य नहीं

यदि प्रदोष-व्रत कथा को केवल इतना कहकर समाप्त कर दिया जाए कि “व्रत किया और राज्य मिल गया”, तो स्कन्दपुराण के इस विस्तृत आख्यान की आत्मा बहुत छोटी कर दी जाएगी।

राजा सत्यरथ की कथा अनुष्ठान में निष्ठा सिखाती है।

उमा की कथा करुणा सिखाती है।

शाण्डिल्य की कथा गुरु और ज्ञान का स्थान बताती है।

शुचित्रत की निधि और धर्मगुप्त का उसे अस्वीकार करना दूसरे के भाग पर अधिकार न करने की धर्मबुद्धि दिखाता है।

अंशुमती के सामने धर्मगुप्त का स्वयं को राज्यहीन और निर्धन कहना सत्य को प्रतिष्ठित करता है।

और एक वर्ष तक प्रदोष में पूजा करते रहना धैर्य की साधना है।

सबसे गहरा संकेत शायद यही है कि धर्मगुप्त के जीवन में फल एक ही दिन नहीं आया।

चार महीने में पहले शुचित्रत को सम्पत्ति मिली।

धर्मगुप्त को नहीं।

वह विचलित नहीं हुआ।

उसने मित्र की सम्पत्ति में हिस्सा नहीं माँगा।

वह शिव की पूजा करता रहा।

फिर वर्ष पूर्ण हुआ।

तब उसका मार्ग अंशुमती तक गया, अंशुमती से द्रविक तक, द्रविक से कैलास के आदेश तक, और अन्ततः वहाँ से विदर्भ के सिंहासन तक।

इस अर्थ में प्रदोष की यह कथा केवल चमत्कार की कथा नहीं—

प्रतीक्षा में भी श्रद्धा बनाए रखने की कथा है।

प्रदोष: दिन और रात्रि के बीच, पराजय और पुनरुत्थान के बीच

प्रदोष स्वयं संधि है।

दिन समाप्त हो चुका है, किन्तु रात्रि अभी पूर्ण नहीं हुई।

सत्यरथ का राज्य समाप्त हुआ, पर वंश समाप्त नहीं हुआ।

रानी का जीवन समाप्त हुआ, पर उसी तट पर उमा का मातृत्व आरम्भ हुआ।

धर्मगुप्त का राजवैभव मिट गया, पर उसी निर्धनता में उसकी साधना आरम्भ हुई।

एक अवस्था बार-बार समाप्त होती है।

और उसी समाप्ति के भीतर अगली अवस्था का बीज उपस्थित रहता है।

सम्भवतः इसीलिए धर्मगुप्त का आख्यान प्रदोष की संध्या के साथ इतना स्वाभाविक प्रतीत होता है।

जब मनुष्य को अपने जीवन में केवल अस्त होता हुआ प्रकाश दिखाई देता है, तब भी कथा कहती है—

अभी रात्रि पूर्ण नहीं हुई है।

अभी शिव की आराधना शेष है।

प्रदोष व्रत कथा का फल

कथा के उपसंहार में सूतजी कहते हैं कि जो प्रदोष-व्रत के दिन गिरिजापति की आराधना करते हैं, वे मनोवांछित कामनाएँ प्राप्त करते हैं और देहावसान के बाद परम गति को प्राप्त होते हैं।

इसी माहात्म्य को प्रदोष-व्रत के दिन शिवपूजन के पश्चात् एकाग्रचित्त होकर सुनने अथवा पढ़ने का भी फल कहा गया है। दरिद्रता-निवारण और अन्ततः भगवान शंकर के परमधाम की प्राप्ति का फल होती ह।

यह ग्रन्थ का श्रद्धामूलक फल-वचन है—और इसी रूप में इसे समझना उचित है।

पाठ-सन्दर्भ और प्रामाणिकता सम्बन्धी टिप्पणी

यह लेख स्कन्दपुराण में ब्रह्मखण्ड–ब्रह्मोत्तरखण्ड पर दिए गए प्रदोष-व्रत प्रसंग पर आधारित है। 

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