यह ग्रन्थ श्रीराधा और श्रीकृष्ण के युगल तत्त्व को केवल भक्ति-भाव से नहीं, बल्कि वैदिक-उपनिषद् परम्परा और निम्बार्क सम्प्रदाय के स्वाभाविक द्वैताद्वैत सिद्धान्त के आलोक में समझाता है। इसमें श्रीराधा को केवल भक्तिरस की अधिष्ठात्री देवी के रूप में नहीं, बल्कि विश्वधात्री, देवधात्री, वनधात्री और शक्तिधात्री जैसे गम्भीर तत्त्वनामों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। व्याख्या में इन शब्दों की व्युत्पत्ति और तात्त्विक अर्थ भी समझाए गए हैं।
ग्रन्थ का सबसे उज्ज्वल भाव यह है कि श्रीराधा और श्रीकृष्ण दो होकर भी एक हैं, और एक होकर भी लीला के लिए दो रूपों में प्रकट हैं। एक मन्त्र में कहा गया है कि राधा और कृष्ण रससागर हैं; व्याख्या इसे शरीर और छाया, समुद्र और तरंग जैसे दृष्टान्तों से समझाती है।
इस ग्रन्थ में श्रीकृष्ण को सर्वेश्वर, सर्वान्तर्यामी, सर्वाधार और जगत् के कारण के रूप में देखा गया है, वहीं श्रीराधा को वह प्रेमशक्ति माना गया है जिसके चरण-रज को स्वयं विश्वभर्ता श्रीकृष्ण प्रेमपूर्वक धारण करते हैं।
मुख्य शिक्षाएँ
उपनिषद् का मूल स्वर: उपासना, निकटता और आत्मिक जागरण
ग्रन्थ की भूमिका कहती है कि उपनिषद् उपासना विद्या है। इसका अर्थ केवल दर्शन पढ़ना नहीं, बल्कि साधक का अपने आराध्य के समीप बैठना, मन को विनीत करना और तत्त्व को हृदय में उतारना है। यहाँ उपासना ज्ञान से अलग नहीं है; ज्ञान, प्रेम और समर्पण एक साथ चलते हैं।
श्रीराधा कोई अर्वाचीन कल्पना नहीं, वैदिक उपासना का जीवित तत्त्व
ग्रन्थ स्पष्ट भाव से कहता है कि जो लोग राधा उपासना को अर्वाचीन मानते हैं, उन्हें श्रीराधाकृष्णोपनिषद् पर गम्भीर मनन करना चाहिए। इसका धार्मिक संदेश अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है: श्रीराधा भक्ति की परिधि नहीं, भक्ति का केन्द्र हैं।
श्रीराधा विश्वधात्री, देवधात्री, वनधात्री और शक्तिधात्री हैं
व्याख्या में श्रीराधा को जगत् की धारिणी-पोषिणी शक्ति, देवों की अधिष्ठात्री, वृन्दावन की ईश्वरी और समस्त शक्तियों की जननी के रूप में समझाया गया है। यह केवल नाम-स्तुति नहीं, बल्कि शक्ति-तत्त्व का वैदिक-वैष्णव प्रतिपादन है।
राधा-कृष्ण का सम्बन्ध भेद और अभेद दोनों है
ग्रन्थ के अनुसार श्रीराधा और श्रीकृष्ण में स्वाभाविक भिन्नता भी है और स्वाभाविक अभिन्नता भी। लीला के लिए दो रूप, तत्त्व में एक रस। यही निम्बार्क परम्परा का अत्यन्त सुन्दर द्वैताद्वैत भाव है।
प्रेम में परमेश्वर भी अपने भक्तवत्सल रूप में अधीन हो जाते हैं
एक स्थान पर श्रीकृष्ण को विश्वभर्ता कहा गया है, जो श्रीराधा के चरणों की रज अपने शिर पर धारण करते हैं। इसका भाव यह है कि दिव्य प्रेम कोई साधारण भावना नहीं; वह ऐसी पराशक्ति है जिसमें स्वयं सर्वेश्वर भी माधुर्यरूप से आकृष्ट होते हैं।
निम्बार्क सम्प्रदाय में युगल उपासना का केन्द्र
ग्रन्थ निम्बार्क परम्परा के युगल-उपासना भाव को पुष्ट करता है। इसमें श्रीराधा-कृष्ण की माधुर्यमयी उपासना, स्वाभाविक द्वैताद्वैत और सरल भक्ति मार्ग को एक साथ रखा गया है।

