जब-जब सनातन चेतना ने भगवान श्रीविष्णु और महालक्ष्मी के युगल-स्वरूप का ध्यान किया है, तब-तब उसने केवल एक दिव्य मूर्ति, एक रमणीय चित्र, या एक अलंकारिक आध्यात्मिक प्रतीक नहीं देखा; उसने स्वयं सृष्टि के संतुलन का रहस्य देखा है। उसने करुणा और मर्यादा का संयोग देखा है। उसने धर्म और सौम्यता का आलिङ्गन देखा है। उसने उस अदृश्य सत्य का दर्शन किया है कि जहाँ नारायण हैं, वहाँ श्री हैं; और जहाँ श्री हैं, वहाँ मंगल है, मर्यादा है, माधुर्य है, जीवन है, और लोक-कल्याण की सुवास है। यही कारण है कि भगवान के समीप विराजती महालक्ष्मी की छवि हिन्दू-हृदय के लिये केवल पूज्य नहीं, प्राणमयी है। वह थके हुए मन को आश्वासन देती है, उद्विग्न जीव को शरण देती है, और यह कहती है कि यह जगत अभी भी दैवी अनुग्रह से परितक्त नहीं हुआ।
विष्णु पुराण इस दिव्य छवि का ऐसा आलोकित अर्थ खोलता है, जो केवल दृश्य का अर्थ नहीं बताता, बल्कि उसके पीछे विद्यमान तत्त्व का उद्घाटन करता है। वहाँ लक्ष्मीजी किसी भी प्रकार से गौण, आश्रित, परवर्ती या अलंकारमात्र नहीं हैं। वहाँ वे नित्या हैं। वहाँ वे जगत्-माता हैं। वहाँ वे भगवान विष्णु की अनपायिनी श्री हैं, जो उनसे कभी पृथक नहीं होतीं। पराशर मुनि का वह प्रसिद्ध वाक्य — “नित्यैवैषा जगन्माता विष्णोः श्रीरनपायिनी”— केवल दार्शनिक सूत्र नहीं, सम्पूर्ण वैष्णव भावधारा का हृदय है। लक्ष्मीजी का अस्तित्व किसी एक घटना से आरम्भ नहीं होता; वे सनातन हैं। उनका प्राकट्य समय-समय पर होता है, किन्तु उनका स्वरूप कालातीत है। वे प्रकट होती हैं, पुनः प्रकट होती हैं, पर उत्पन्न होकर पहली बार अस्तित्व में नहीं आतीं। वे पहले से हैं, सदैव हैं, और इसी कारण श्री का क्षय संसार का क्षय बन जाता है।
पुराण आगे इस सत्य को सूक्ष्म उपमानों की अनुपम माला में बाँध देता है। भगवान विष्णु अर्थ हैं, लक्ष्मी वाणी हैं। भगवान बोध हैं, लक्ष्मी बुद्धि हैं। भगवान धर्म हैं, लक्ष्मी सदाचारिणी क्रिया हैं। भगवान यज्ञ हैं, लक्ष्मी दक्षिणा हैं। भगवान दीप हैं, लक्ष्मी ज्योति हैं। भगवान द्रुम हैं, लक्ष्मी लता हैं। यहाँ कोई दमन नहीं, कोई हीनता नहीं, कोई आधिपत्य नहीं; यहाँ केवल सह-अस्तित्व का अद्वितीय रहस्य है। यहाँ एक दूसरे के बिना दूसरे की पूर्णता नहीं। यहाँ विष्णु की महिमा श्री से आलोकित होती है, और श्री की छाया विष्णु में दिव्यता पाती है। इसीलिये वैष्णव भावभूमि में लक्ष्मी केवल धन की देवी नहीं कही गयीं; वे तो श्री हैं — सौभाग्य की छाया, करुणा की कोमलता, धर्म की सुगन्ध, और जीवन के शुभ स्पन्दन की अधिष्ठात्री।
इसी दिव्य आधारभूमि पर समुद्र-मंथन का महाप्रसंग उदित होता है। सामान्य दृष्टि से यह देवों और दैत्यों के बीच अमृत-प्राप्ति का प्रयत्न प्रतीत होता है; किन्तु विष्णु पुराण की अन्तर्ध्वनि इससे कहीं अधिक गंभीर है। यह श्री-संबंध की कथा है। यह उस त्रासद क्षण की कथा है जब लोकों से श्री विदा हो जाती है, और फिर उसी श्री के पुनरागमन से समस्त सृष्टि में पुनः प्राण-संचार होता है। दुर्वासा मुनि, तप की ज्वाला से दीप्त, दिव्य मालिका इन्द्र को प्रदान करते हैं। इन्द्र, असावधान होकर, उस मालिका का यथोचित मान न रख पाते। ऐरावत उसे भूमि पर गिरा देता है। दुर्वासा इसे केवल बाह्य अविनय नहीं, श्रद्धा-भंग मानते हैं। शाप उच्चरित होता है। और उसी के साथ त्रिलोकी से श्री का प्रस्थान आरम्भ हो जाता है। यह प्रसंग बाहरी घटना कम और दैवी तत्त्व का भीषण उद्घाटन अधिक है: जहाँ श्रद्धा का अपमान होता है, वहाँ से श्री की छाया हटने लगती है।
तदनन्तर पुराण जो चित्र उपस्थित करता है, वह आज भी अन्तःकरण को द्रवित कर देता है। लोक निःश्रीक हो जाते हैं — अर्थात् श्रीविहीन, कान्तिहीन, ऐश्वर्यहीन, सौभाग्यहीन, मंगलहीन। औषधियाँ निर्बल पड़ जाती हैं। यज्ञों की पवित्र उष्मा मंद हो जाती है। तप की ज्वाला शिथिल पड़ती है। दान और धर्म लोक-व्यवहार से दूर होने लगते हैं। लोभ बढ़ता है। मर्यादा क्षीण होती है। संतुलन विखण्डित हो जाता है। तभी विष्णु पुराण एक ऐसे वाक्य में समस्त आध्यात्मिक समाजदर्शन का सार रख देता है — “यतः सत्त्वं ततो लक्ष्मीः।” जहाँ सत्त्व है, वहाँ लक्ष्मी है। जहाँ लक्ष्मी का निवास है, वहीं शुभता की धारा है। और जहाँ श्री नहीं, वहाँ केवल दारिद्र्य नहीं आता; वहाँ धर्म भी शिथिल पड़ता है, विवेक भी म्लान होता है, और लोकजीवन की सुगन्ध भी सूखने लगती है। यहाँ लक्ष्मी धन की परिसीमित अधिष्ठात्री नहीं रहीं; वे सत्त्व, समृद्धि, व्यवस्था, धर्म, जीवन-ऊर्जा और मंगलमयता की एकात्म दैवी सत्ता बन उठती हैं।
यहीं से समुद्र-मंथन की कथा एक विशाल आध्यात्मिक रूपक बन जाती है। देव दुर्बल हैं, क्योंकि वे ऐसे जगत में खड़े हैं जहाँ श्री का अभाव है। वे ब्रह्मा की शरण लेते हैं। ब्रह्मा उन्हें क्षीर-सागर तट पर भगवान विष्णु के पास ले जाते हैं। भगवान उपाय बताते हैं: मन्दराचल मंथन-दण्ड बनेगा, वासुकी रज्जु बनेगा, औषधियाँ एकत्र होंगी, और महा-मंथन आरम्भ होगा। किन्तु भगवान केवल उपदेश देकर विलग नहीं हो जाते। वे स्वयं आधार बनते हैं। वे स्वयं धारण करते हैं। वे स्वयं इस महाप्रयत्न में अदृश्य करुणा के रूप में संलग्न रहते हैं। यही सनातन धर्म का चिरसत्य है: ईश्वर केवल मार्गदर्शक नहीं, वह भार-वाहक भी है; केवल आदेशदाता नहीं, वह सहचर भी है; केवल पूज्य नहीं, वह अनुग्रही भी है। जब जीवन निःश्रीक हो उठे, तब दैवी सहायता दूर खड़ी नहीं रहती; वह भीतर उतरती है और मंथन को फलित करती है।
मंथन आरम्भ होता है। रत्न उदित होते हैं। चमत्कार क्रमशः प्रकट होते हैं। और फिर वह क्षण आता है जिसके लिये मानो समस्त कथा साधना कर रही थी — महालक्ष्मी का प्राकट्य। वे कमल-सम्भवा शोभा में प्रकट होती हैं। वे ज्योतिष्मती हैं। वे सर्वमङ्गला हैं। महर्षिगण स्तुतिपाठ करते हैं। गन्धर्वगण गान करते हैं। अप्सराएँ नृत्य करती हैं। पुण्यसलिल नदियाँ अभिषेक के लिये उपस्थित होती हैं। दिग्गज पवित्र जल से स्नान कराते हैं। क्षीर-सागर अविनाशी मालिका अर्पित करता है। विश्वकर्मा अलंकारों से विभूषित करते हैं। वह दृश्य केवल सौन्दर्य नहीं; वह सृष्टि का सामूहिक प्रणाम है। मानो सम्पूर्ण विश्व यह स्वीकार कर रहा हो कि श्री पुनः अवतीर्ण हुई है, कि मंगल ने फिर से देह धारण की है, कि करुणा की आभा पुनः लोकों के उपरि फैल गयी है।
और फिर आता है वह महावाक्य, जिसकी छाया में इस पूरे विषय को समझना चाहिये — “पश्यतां सर्वदेवानां ययौ वक्षःस्थलं हरेः।” समस्त देवताओं के समक्ष श्री लक्ष्मी भगवान हरि के वक्षःस्थल पर प्रतिष्ठित हुईं। यही वह स्थल है जहाँ शास्त्र और भाव एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं। वक्षःस्थल — अर्थात् भगवान का दिव्य हृदय-प्रदेश। वे हरि-हृदय-विलासिनी हैं। वे नारायण-हृदय-निवासिनी श्री हैं। वे भगवान के दिव्य हृदय-सिंहासन पर अधिष्ठित महालक्ष्मी हैं। यहाँ अधीनता नहीं है। यहाँ दूरी नहीं, अभिन्नता है। यहाँ स्थान का प्रश्न नहीं, प्रेम का परम रहस्य है। विष्णु पुराण लक्ष्मी को भगवान के हृदय में प्रतिष्ठित कर यह कहता है कि हरि और श्री का सम्बन्ध बाह्य समीपता का नहीं, अनादि साथ साथ होने का है।
श्री की इस पुनःप्रतिष्ठा के साथ ही विश्व का रंग बदलने लगता है। देवता हर्षित होते हैं। तेज लौटता है। ऐश्वर्य लौटता है। व्यवस्था लौटती है। धर्म पुनः स्थिर होता है। इन्द्र, जिन्होंने दुर्वासा के शाप से सब कुछ खो दिया था, अब लक्ष्मी की स्तुति ऐसे करते हैं जैसे लोकमाता की जा सकती है। वे जानते हैं कि जहाँ श्री की कृपा नहीं, वहाँ राज्य निस्तेज हो जाते हैं, गृह आनन्दरहित हो जाते हैं, और जीवन की ऊष्मा मन्द पड़ जाती है। जहाँ उनकी अनुकम्पा बरसती है, वहाँ आरोग्य, स्थैर्य, मर्यादा, शोभा और सौभाग्य पुनः पल्लवित होते हैं। इसीलिये विष्णु पुराण की लक्ष्मी आधुनिक व्यवहार की सीमित ‘धन-देवी’ नहीं हैं; वे ईश्वरीय अनुग्रह की स्पन्दमान ऊष्मा हैं। वे वह दैवी अन्तर हैं जो अस्तित्व को मंगलमय जीवन में परिणत करता है।
किन्तु इसी के साथ हिन्दू-हृदय में लक्ष्मीजी का भगवान के चरणकमलों के समीप स्वरूप भी उतना ही पावन और प्रिय बना रहता है। यही इस प्रतीक की सम्पूर्णता है। भगवान का दिव्य हृदय नित्य साथ होने का बोध देता है। भगवान के चरणकमल शरण, भक्ति, समर्पण और सेवा का दिग्दर्शन करते हैं। चरणों के समीप होना पतन नहीं, परम कृपा के निकटतम होना है। धर्म की भाषा में सेवा अपमान नहीं; सेवा गौरव है। सेवा आत्मीयता है। सेवा प्रेम की दृश्य ज्योति है। सेवा वह भूमि है जहाँ विनय और महिमा परस्पर विरोधी नहीं रह जाते, बल्कि एक दूसरे को सुशोभित करते हैं। इसीलिये जब लक्ष्मीजी को चरणकमलों के समीप देखा जाता है, तो उसका अर्थ सामाजिक हीनता नहीं, बल्कि दैवी सेवा का परम सौन्दर्य है। वे भगवान के हृदय की अधिष्ठात्री भी हैं और भगवान के चरणों की पावन सेवा में आनन्दित परमेश्वरी भी। यही वैष्णव प्रतीक की पूर्णता है। यही उसका माधुर्य है। यही उसका अमृत है।
इसी कारण वे दृष्टियाँ जो इस छवि को केवल भेदभाव की भाषा में बाँध देना चाहती हैं, हिन्दू अन्तःकरण को प्रायः अस्वाभाविक लगती हैं। ऐसी व्याख्याएँ बाह्य समाजशास्त्रीय आशंकाओं से जन्म लेती हैं और अन्ततः पवित्र प्रतीकों को संकुचित कर देती हैं। विष्णु पुराण इसका प्रतिलोम करता है। वह इस प्रतीक को इतना व्यापक बना देता है कि पूरा ब्रह्माण्ड उसमें समा जाता है। लक्ष्मी नित्या हैं। लक्ष्मी जगत्-माता हैं। लक्ष्मी विष्णु की अनपायिनी श्री हैं। उनके अभाव से लोक निःश्रीक हो जाते हैं। उनके पुनरागमन से सत्त्व, समृद्धि, व्यवस्था, धर्म, जीवन-ऊर्जा और मंगलमयता पुनः आलोकित हो उठती है। भगवान के हृदय में उनका आसन नित्य सहचर्य का महामन्त्र है। चरणकमलों के समीप उनका भाव सेवा-भक्ति का परम अलंकार है। यह प्रतीक किसी आधुनिक विवाद से छोटा नहीं; वह उससे अनन्तगुणा अधिक विशाल, अधिक कोमल, अधिक दैवी है।
अन्त में, इस प्रसंग का अमृत-तत्त्व साधक के लिये यही है। संसार कभी कठोर हो उठता है। कभी कोलाहल से भर जाता है। कभी अहंकार से बोझिल हो जाता है। कभी आध्यात्मिक जड़ता से आच्छन्न हो जाता है। पर विष्णु पुराण कहता है: जब श्री लौटती हैं, तब जीवन पुनः सुव्यवस्थित हो उठता है। गृहों में ऊष्मा लौटती है। आचरण में मर्यादा लौटती है। उपासना में निष्कपटता लौटती है। समाज में संतुलन लौटता है। हृदय में श्रद्धा लौटती है। इस अर्थ में समुद्र-मंथन केवल अतीत की घटना नहीं; वह प्रत्येक जीवन का सनातन रूपक है। जब-जब जीवन निःश्रीक हो, उत्तर निराशा नहीं। उत्तर है — विष्णु की शरण। लक्ष्मी का आवाहन। सत्त्व का जागरण। धर्म में पुनः प्रतिष्ठा। यही कारण है कि यह पावन छवि आज भी युगों के पार बोलती है। यह भक्त को छोटा नहीं करती; यह उसे धैर्य देती है। यह उसे स्थिर करती है। यह प्रत्येक हिन्दू आत्मा से कहती है कि जहाँ विष्णु और लक्ष्मी साथ विराजमान हैं, वहाँ कृपा ने अभी जगत का परित्याग नहीं किया।

