और 15 तिथियाँ केवल 14 तारीखों में कैसे समाएँगी?
सितम्बर की धूप अब कुछ नरम होने लगी है। घर के किसी पुराने संदूक से पिता की घड़ी, दादी की पूजा-पुस्तिका या माँ के हाथ की लिखी कोई रसोई-विधि निकल आती है। वस्तु वही रहती है, पर उसे छूते ही समय खुल जाता है। पितृपक्ष इसी खुले हुए समय का नाम है—जब परिवार अपने से पहले चले गए लोगों को केवल बीता हुआ नहीं मानता, बल्कि अपने वर्तमान में उनका अंश पहचानता है।
2026 में इस पक्ष की पहली उलझन तारीख को लेकर है। कहीं 26 सितम्बर लिखा है, कहीं 27 सितम्बर। दोनों तारीखें एक ही बात नहीं कहतीं।
26 सितम्बर को क्या है?
शनिवार, 26 सितम्बर को भाद्रपद पूर्णिमा श्राद्ध है। जिन दिवंगत परिजन की मृत्यु पूर्णिमा तिथि को हुई हो, उनके लिए इस दिन श्राद्ध किया जाता है। अनेक कैलेंडर सुविधा के लिए इसे पितृपक्ष-सूची में जोड़ देते हैं, इसलिए “पितृपक्ष 26 सितम्बर से” लिखा दिखाई देता है।
किन्तु पूर्णिमा श्राद्ध तकनीकी रूप से कृष्ण-पक्षीय पितृपक्ष का भाग नहीं है। मुख्य पक्ष पूर्णिमा के अगले दिन, आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से आरम्भ होता है।
27 सितम्बर से मुख्य पितृपक्ष
रविवार, 27 सितम्बर को प्रतिपदा श्राद्ध है। यही मुख्य पितृपक्ष का आरम्भ है। यह क्रम 10 अक्टूबर की अमावस्या तक चलेगा। उत्तर भारतीय पूर्णिमान्त गणना में यह आश्विन कृष्ण पक्ष है; दक्षिण भारतीय अमान्त परम्परा में मास-नाम भिन्न दिखाई दे सकता है, पर श्राद्ध-पक्ष का व्यवहारिक क्रम वही रहता है।
पितृपक्ष 2026 की तिथि-सूची
| तारीख | वार | श्राद्ध तिथि/विशेष अवसर |
|---|---|---|
| 26 सितम्बर | शनिवार | पूर्णिमा श्राद्ध—मुख्य पक्ष से एक दिन पहले |
| 27 सितम्बर | रविवार | प्रतिपदा श्राद्ध; मुख्य पितृपक्ष आरम्भ |
| 28 सितम्बर | सोमवार | द्वितीया श्राद्ध |
| 29 सितम्बर | मंगलवार | तृतीया श्राद्ध; महाभरणी श्राद्ध |
| 30 सितम्बर | बुधवार | चतुर्थी और पंचमी श्राद्ध |
| 1 अक्टूबर | गुरुवार | षष्ठी श्राद्ध |
| 2 अक्टूबर | शुक्रवार | सप्तमी श्राद्ध |
| 3 अक्टूबर | शनिवार | अष्टमी श्राद्ध |
| 4 अक्टूबर | रविवार | नवमी श्राद्ध; मातृ नवमी के रूप में भी प्रचलित |
| 5 अक्टूबर | सोमवार | दशमी श्राद्ध |
| 6 अक्टूबर | मंगलवार | एकादशी श्राद्ध |
| 7 अक्टूबर | बुधवार | द्वादशी श्राद्ध; मघा श्राद्ध |
| 8 अक्टूबर | गुरुवार | त्रयोदशी श्राद्ध |
| 9 अक्टूबर | शुक्रवार | चतुर्दशी श्राद्ध |
| 10 अक्टूबर | शनिवार | सर्वपितृ अमावस्या; पितृपक्ष समापन |
15 तिथियाँ, पर 14 कैलेंडर दिन
प्रतिपदा से अमावस्या तक 15 चन्द्र-तिथियाँ होती हैं, लेकिन 27 सितम्बर से 10 अक्टूबर तक केवल 14 अंग्रेजी तारीखें हैं। कारण यह है कि चन्द्र-तिथि हमेशा 24 घंटे की नहीं होती। इस वर्ष चतुर्थी और पंचमी—दोनों के श्राद्ध 30 सितम्बर को पड़ रहे हैं। इसे केवल “एक तिथि गायब हो गई” कहना अधूरा होगा; श्राद्ध-दिन का निर्णय इस बात से होता है कि सम्बद्ध तिथि अपराह्न में किस दिन उपस्थित है।
इसीलिए श्राद्ध के पंचांग में सूर्योदय मात्र पर्याप्त नहीं। सामान्य व्रत जहाँ उदया-तिथि पर निर्भर हो सकता है, वहीं पार्वण श्राद्ध में कुतुप, रौहिण और अपराह्न काल विशेष देखे जाते हैं।
किस दिन किसका श्राद्ध?
मूल नियम सरल है: जिस चन्द्र-तिथि को व्यक्ति का देहावसान हुआ, पितृपक्ष में उसी तिथि का श्राद्ध किया जाता है—अंग्रेजी तारीख का नहीं। यदि निधन 12 मार्च को हुआ था, लेकिन उस दिन कृष्ण सप्तमी थी, तो श्राद्ध सप्तमी को होगा।
यदि मृत्यु-तिथि ज्ञात न हो, पारिवारिक कारणों से अलग-अलग तिथियों पर कर्म सम्भव न हो, या सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों का संयुक्त स्मरण करना हो, तो सर्वपितृ अमावस्या व्यापक रूप से स्वीकार की जाती है। कुछ विशेष मृत्यु-परिस्थितियों और आश्रम-परम्पराओं के लिए चतुर्दशी या द्वादशी जैसे दिन प्रचलित हैं; परिवार अपने कुलाचार और योग्य आचार्य से निर्णय करे।
“श्राद्ध” का अर्थ भय नहीं, श्रद्धा है
श्राद्ध शब्द का केन्द्र श्रद्धा है। यह पक्ष अशुभता का काला पर्दा नहीं, कृतज्ञता का शान्त समय है। विवाह, गृहप्रवेश या बड़े उत्सव स्थगित रखने की अनेक पारिवारिक परम्पराएँ इसलिए बनीं कि ध्यान उपभोग से हटकर स्मरण, संयम, दान और पारिवारिक उत्तरदायित्व पर रहे। इसका अर्थ यह नहीं कि जीवन की आवश्यक गतिविधियाँ रुक जाएँ या घर भय से भर जाए।
महाभारत के अनुशासन पर्व में भीष्म युधिष्ठिर को श्राद्ध-विधान बताते हुए एकाग्रता, जल-अर्पण और पूर्वजों के प्रति कर्तव्य पर बल देते हैं। वहाँ पिता, पितामह और प्रपितामह की क्रमिक स्मृति आती है; साथ ही जल से तृप्ति का भाव भी। ग्रन्थ का सार किसी प्रदर्शन में नहीं, स्मरण की अनुशासित निरन्तरता में है।
इस वर्ष रविवार से आरम्भ होने का क्या अर्थ है?
27 सितम्बर का रविवार होना कैलेंडर-सुविधा की दृष्टि से परिवारों को साथ बैठने का अवसर देता है। इसका सबसे सुन्दर प्रभाव व्यवहारिक है—बच्चे घर पर होंगे, बुजुर्गों से वंश-कथाएँ सुनी जा सकती हैं, पुराने चित्र पहचाने जा सकते हैं और दिवंगतों के नाम पहली बार अगली पीढ़ी को बताए जा सकते हैं।
पितृपक्ष का आरम्भ तिल और जल से पहले नाम लेने से होता है। जिसे परिवार भूलने लगता है, वह दूसरी बार विदा होता है। 27 सितम्बर को यदि एक बच्चा अपने परदादा का पूरा नाम जान ले, तो श्राद्ध की पहली लौ जल चुकी होगी।

