महाभारत को प्रायः पाण्डवों और कौरवों के बीच लड़े गए कुरुक्षेत्र युद्ध की कथा कहा जाता है, परन्तु उसके हृदय में एक और विराट उपस्थिति है—श्रीकृष्ण। वे हस्तिनापुर का सिंहासन नहीं चाहते, युद्ध में कोई राज्य अपने लिए नहीं माँगते और शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा करते हैं; फिर भी महाभारत की दिशा उनके बिना समझी ही नहीं जा सकती।
श्रीकृष्ण और महाभारत का सम्बन्ध किसी एक योद्धा और उसके सहयोगी का सम्बन्ध नहीं है। वे पाण्डवों के सम्बन्धी हैं, अर्जुन के सखा हैं, द्रौपदी के विश्वास का आधार हैं, युधिष्ठिर के राजनीतिक मार्गदर्शक हैं, दुर्योधन के सामने शान्ति के प्रतिनिधि हैं और कुरुक्षेत्र में मानवता को भगवद्गीता देने वाले योगेश्वर हैं।
उनके हाथ में युद्ध का अस्त्र नहीं, अर्जुन के रथ की लगाम है। किन्तु महाभारत अन्ततः यह दिखाता है कि शक्ति से अधिक निर्णायक वह चेतना है जो शक्ति को धर्म की दिशा देती है।
महाभारत में श्रीकृष्ण का प्रवेश
महाभारत की विस्तृत कथा में कृष्ण का प्रमुख प्रवेश द्रौपदी-स्वयंवर के समय दिखाई देता है। ब्राह्मण-वेश में उपस्थित अर्जुन जब कठिन धनुर्विद्या-परीक्षा पूरी करते हैं, तब श्रीकृष्ण पाण्डवों को पहचान लेते हैं। लाक्षागृह की घटना के बाद संसार उन्हें मृत मान चुका था, पर कृष्ण उनकी वास्तविक पहचान समझ जाते हैं।
यहीं से पाण्डवों और श्रीकृष्ण का वह सम्बन्ध कथा में अधिक स्पष्ट होता है जो आगे चलकर कुरुक्षेत्र का नैतिक आधार बनेगा।
कृष्ण पाण्डवों के बाहरी वैभव के कारण उनके साथ नहीं खड़े होते। उनके जीवन का बड़ा भाग वनवास, अपमान, अनिश्चितता और संघर्ष में बीतता है। कृष्ण का साथ सत्ता के साथ नहीं, न्यायोचित अधिकार और धर्म के साथ है।
अर्जुन और कृष्ण: सम्बन्धी, सखा और आत्मीय सहयात्री
श्रीकृष्ण और अर्जुन पारिवारिक रूप से भी सम्बन्धित थे। कृष्ण की बहन सुभद्रा का विवाह अर्जुन से हुआ और अभिमन्यु उनका पुत्र था। परन्तु कृष्ण-अर्जुन का सम्बन्ध केवल पारिवारिक नहीं था। महाभारत उन्हें गहरे विश्वास से जुड़े सखा के रूप में प्रस्तुत करता है।
अर्जुन कृष्ण के सामने अपनी दुर्बलता छिपाते नहीं। कुरुक्षेत्र में वे उन्हीं से कहते हैं कि उनका मन भ्रमित है, शरीर शिथिल हो रहा है और गांडीव हाथ से छूट रहा है। दूसरी ओर कृष्ण मित्रता के नाम पर अर्जुन के मोह का समर्थन नहीं करते। वे उनके सामने वह सत्य रखते हैं जिसे सुनना उस क्षण कठिन था।
यह सम्बन्ध बताता है कि सच्चा सखा केवल सांत्वना नहीं देता; जब आवश्यक हो, वह मनुष्य को उसके कर्तव्य के सामने खड़ा भी करता है।
जरासन्ध-वध: शक्ति से पहले नीति
सभापर्व में युधिष्ठिर राजसूय यज्ञ करना चाहते हैं, परन्तु मगधराज जरासन्ध की शक्ति और उसके द्वारा बन्दी बनाए गए राजाओं की स्थिति बड़ी बाधा थी। श्रीकृष्ण ने समझाया कि जरासन्ध के रहते युधिष्ठिर का सार्वभौम राजसूय पूर्ण अर्थ ग्रहण नहीं कर सकता।
श्रीकृष्ण, भीम और अर्जुन ब्राह्मण-वेश में मगध पहुँचे। कृष्ण ने जरासन्ध की युद्ध-पद्धति, उसके सामर्थ्य और उसकी दुर्बलता को समझते हुए भीम को मल्लयुद्ध के लिए आगे किया। जरासन्ध-वध के बाद उसके पुत्र सहदेव को राजसिंहासन सौंपा गया और बन्दी राजाओं को मुक्त किया गया।
यह प्रसंग श्रीकृष्ण की राजनीति के तीन पक्ष स्पष्ट करता है:
- अत्याचार का अन्त आवश्यक है।
- विजय का उद्देश्य निजी राज्य-विस्तार नहीं होना चाहिए।
- व्यवस्था को शून्य में छोड़ने के स्थान पर वैध उत्तराधिकार स्थापित करना चाहिए।
कृष्ण स्वयं युद्ध नहीं लड़ते, परन्तु सही योद्धा, सही समय और सही उपाय पहचानते हैं। महाभारत में उनकी रणनीति शक्ति की दिशा निर्धारित करने वाली बुद्धि है।
राजसूय यज्ञ और शिशुपाल-वध
युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में यह प्रश्न उठा कि प्रथम पूजा किसकी हो। भीष्म ने श्रीकृष्ण को अग्रपूजा का अधिकारी बताया। शिशुपाल ने इसका विरोध किया और कृष्ण के विरुद्ध कटु अपमानजनक वचन कहे।
महाभारत-परम्परा के अनुसार श्रीकृष्ण ने शिशुपाल की माता को उसके अनेक अपराध क्षमा करने का वचन दिया था। सीमा पार होने पर उन्होंने सुदर्शन चक्र से उसका वध किया।
इस घटना को केवल किसी आलोचक को दण्ड देने की कथा के रूप में नहीं समझना चाहिए। महाभारत का शिशुपाल सामान्य असहमति रखने वाला व्यक्ति नहीं, बार-बार मर्यादा और धर्म की सीमा भंग करने वाला राजा है। प्रसंग का केन्द्र निजी अपमान नहीं, निरन्तर दुष्कर्मों की सीमा पूरी होना है।
द्यूतसभा
लोकप्रिय प्रस्तुतियों के कारण कभी-कभी यह मान लिया जाता है कि श्रीकृष्ण द्यूतसभा में उपस्थित थे। महाभारत की कथा के अनुसार वे उस समय सभा में उपस्थित नहीं थे। वनपर्व में पाण्डवों से मिलने पर कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि यदि वे वहाँ होते तो द्यूतक्रीड़ा को रोकने का प्रयास करते।
यह तथ्य महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इससे एक सामान्य प्रश्न का उत्तर मिलता है—कृष्ण ने जुए को पहले ही क्यों नहीं रोका? मूल कथा में वे हस्तिनापुर की उस सभा के प्रत्यक्ष सहभागी नहीं थे।
द्रौपदी के चीररक्षण का अत्यन्त पूज्य भक्ति-रूप भारतीय जनमानस में श्रीकृष्ण की अनन्त कृपा से जुड़ा है। द्रौपदी ने अपने संकट में परम धर्म और दिव्य आश्रय का स्मरण किया; उत्तरकालीन भक्ति-परम्परा उस अनन्त वस्त्र-रक्षा को श्रीकृष्ण की प्रत्यक्ष कृपा के रूप में पूजती है।
वनवास में पाण्डवों के विश्वास का आधार
द्यूतसभा के बाद पाण्डवों को वनवास जाना पड़ा। श्रीकृष्ण उनके कष्ट को केवल राजनीतिक पराजय नहीं मानते। द्रौपदी का अपमान और छलपूर्वक राज्यहरण उनके लिए धर्म-व्यवस्था पर आघात था।
फिर भी कृष्ण तत्काल प्रतिशोध का आवेगपूर्ण आग्रह नहीं करते। पाण्डवों को अपनी प्रतिज्ञा और वनवास की अवधि पूरी करनी थी। धर्म केवल शत्रु को दण्ड देने का नाम नहीं; स्वयं किए गए वचन का पालन भी धर्म है।
यहाँ कृष्ण धैर्य और प्रतिकार के बीच सन्तुलन स्थापित करते हैं। वे अन्याय को भूलने के लिए नहीं कहते, परन्तु न्याय प्राप्त करने के लिए समय, तैयारी और प्रतिज्ञा की मर्यादा का पालन आवश्यक मानते हैं।
नारायणी सेना और निःशस्त्र श्रीकृष्ण में चुनाव
वनवास और अज्ञातवास पूरा होने के बाद युद्ध की सम्भावना बढ़ी। दुर्योधन और अर्जुन दोनों सहायता माँगने द्वारका पहुँचे। श्रीकृष्ण ने दोनों के सामने चुनाव रखा:
- एक ओर उनकी विशाल नारायणी सेना होगी।
- दूसरी ओर वे स्वयं होंगे, किन्तु युद्ध में शस्त्र नहीं उठाएँगे।
दुर्योधन ने सेना चुनी। अर्जुन ने निःशस्त्र श्रीकृष्ण को।
उद्योगपर्व के इस प्रसंग में अर्जुन का चयन महाभारत के गहरे विश्वास को व्यक्त करता है—संख्या और बाहरी सामर्थ्य से अधिक मूल्यवान धर्ममय दिशा है। कृष्ण ने अर्जुन का सारथी बनना स्वीकार किया। उद्योगपर्व में इस चुनाव और कृष्ण की शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा का वर्णन मिलता है।
दुर्योधन प्रसन्न था कि उसे सेना मिल गई; अर्जुन प्रसन्न थे कि उसे कृष्ण मिल गए। दोनों को वही प्राप्त हुआ जिसे वे शक्ति मानते थे।
श्रीकृष्ण पहले शान्तिदूत हैं, युद्ध-प्रेरक नहीं
कुरुक्षेत्र से पहले वे युद्ध रोकने के लिए शान्तिदूत बनकर हस्तिनापुर जाते हैं।
युधिष्ठिर युद्ध से बचना चाहते थे। वे अपने न्यायोचित राज्य की पुनर्प्राप्ति चाहते थे, लेकिन व्यापक विनाश की कीमत पर नहीं। उद्योगपर्व में अनेक स्तरों पर सन्धि-प्रयास होते हैं—दूत भेजे जाते हैं, संजय संवाद लेकर आते हैं और अन्त में कृष्ण स्वयं हस्तिनापुर जाते हैं।
कृष्ण जानते थे कि दुर्योधन का हठ शान्ति को असम्भव बना सकता है, फिर भी उन्होंने संवाद की अंतिम सम्भावना को छोड़ा नहीं। यह महत्त्वपूर्ण धर्म-सिद्धान्त है: संघर्ष की आशंका मात्र से संवाद का परित्याग नहीं किया जाना चाहिए।
पाँच ग्राम का प्रस्ताव: न्यूनतम न्याय भी अस्वीकार
युधिष्ठिर ने व्यापक रक्तपात रोकने के लिए अपनी माँग को अत्यन्त सीमित कर दिया। उद्योगपर्व की परम्परागत पाठ-परम्परा में पाँच ग्रामों की माँग आती है—इतना स्थान जहाँ पाँचों पाण्डव रह सकें।
शान्ति के लिए यह प्रस्ताव अधिकार के बड़े भाग का त्याग था, न्याय के मूल अस्तित्व का नहीं। दुर्योधन ने इसे भी अस्वीकार कर दिया। उसका प्रसिद्ध हठ यही था कि वह पाण्डवों को सुई की नोक के बराबर भूमि भी नहीं देगा।
युद्ध पाण्डवों की पहली इच्छा नहीं था। युद्ध तब आया जब न्याय के न्यूनतम प्रस्ताव के लिए भी कोई स्थान नहीं छोड़ा गया।
दुर्योधन का प्रयास और कृष्ण का दिव्य स्वरूप
हस्तिनापुर में दुर्योधन ने श्रीकृष्ण को अपने प्रभाव अथवा बन्दीकरण के द्वारा निष्क्रिय करने का विचार किया। परन्तु कृष्ण साधारण राजदूत नहीं थे जिन्हें राजनीतिक बल से बाँधा जा सके।
सभा में उन्होंने अपने दिव्य स्वरूप का प्रकाश किया। महाभारत का यह प्रसंग बताता है कि कौरव-सभा के सामने खड़ा शान्तिदूत केवल यादवों का प्रतिनिधि नहीं, वह परम सत्ता है जिसे कोई सांसारिक शक्ति बन्दी नहीं बना सकती।
कृष्ण विनाश से बचने का अवसर दे रहे थे।
शान्ति तभी धर्मपूर्ण है जब वह भय से नहीं, विवेक और करुणा से चुनी जाए।
कुरुक्षेत्र में अर्जुन का विषाद
दोनों सेनाएँ आमने-सामने थीं। अर्जुन ने श्रीकृष्ण से रथ दोनों सेनाओं के मध्य ले जाने को कहा। जब उन्होंने भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, भ्राताओं, पुत्रों, पौत्रों और सम्बन्धियों को सामने देखा, तो उनका संकल्प टूट गया।
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्।
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति॥
—भगवद्गीता
अर्जुन का संकट कायरता मात्र नहीं था। वह धर्म के अनेक दायित्वों का टकराव था—क्षत्रिय-कर्तव्य, गुरु-सम्मान, कुल-रक्षा, न्याय, करुणा और हिंसा के परिणाम। वे यह नहीं समझ पा रहे थे कि इनमें से किसे सर्वोपरि रखें।
तभी अर्जुन मित्र की भाषा से शिष्य की स्थिति में आते हैं:
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्॥
—भगवद्गीता
अअर्थात् धर्म के विषय में मोहित चेतना वाले अर्जुन श्रीकृष्ण से कहते हैं—मैं आपका शिष्य हूँ; जो मेरे लिए निश्चित रूप से कल्याणकारी हो, वह बताइए।
यहीं सारथी जगद्गुरु हो जाते हैं – जगत के सृष्टिकर्ता।
भगवद्गीता: युद्धभूमि में जीवन का शास्त्र
श्रीकृष्ण अर्जुन को तत्त्व ज्ञान की ओर प्रेरित करते हैं। वे आत्मा की नित्यता, शरीर की अनित्यता, निष्काम कर्म, समत्व, स्वधर्म, ज्ञान, ध्यान, भक्ति और परमात्मा का विवेचन करते हैं।
न जायते म्रियते वा कदाचिन्
नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
—भगवद्गीता
आत्मा न जन्म लेती है और न मरती है; शरीर नष्ट होने पर भी उसका नाश नहीं होता।
कृष्ण अर्जुन से विवेकहीन हिंसा नहीं, आसक्ति और निजी द्वेष से मुक्त होकर धर्मसम्मत कर्तव्य निभाने की बात कहते हैं। उनका उपदेश युद्ध को सामान्य जीवन का आदर्श नहीं बनाता। वह एक ऐसे विशिष्ट धर्मसंकट का उत्तर है जिसमें न्याय के सभी शान्तिपूर्ण मार्ग विफल हो चुके थे।
अन्त में कृष्ण निर्णय अर्जुन पर छोड़ते हैं:
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु॥
—भगवद्गीता
पूर्ण विचार के बाद जैसी इच्छा हो, वैसा करो। भगवान् ज्ञान देते हैं, परन्तु मनुष्य की उत्तरदायी चेतना का स्थान स्वयं नहीं लेते।
विश्वरूप: सारथी के भीतर विराट सत्ता
अर्जुन श्रीकृष्ण का विश्वरूप देखना चाहते हैं। कृष्ण उन्हें दिव्य दृष्टि प्रदान करते हैं। तब अर्जुन एक ही दिव्य स्वरूप में असंख्य मुख, नेत्र, अद्भुत रूप, आयुध, देवता और सम्पूर्ण जगत् देखते हैं।
पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः।
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च॥
—भगवद्गीता
सखा के रूप में पास बैठे कृष्ण ही विराट विश्व के आधार हैं। यह दर्शन अर्जुन को बताता है कि कुरुक्षेत्र केवल उनके निजी निर्णय से संचालित संसार नहीं है। समय, कर्म और व्यापक दैवी व्यवस्था उनसे कहीं बड़ी है।
फिर भी विश्वरूप-दर्शन के बाद कृष्ण अपने सौम्य स्वरूप में लौटते हैं। विराटता अर्जुन को विस्मित करती है, परन्तु आत्मीय कृष्ण ही उसे स्थिर करते हैं।
युद्धनीति और कठिन नैतिक प्रश्न
महाभारत का युद्ध सरल अच्छाई और बुराई के बीच सीधी लड़ाई नहीं है। भीष्म, द्रोण और कर्ण जैसे महान योद्धा कौरव-पक्ष में थे। वे व्यक्तिगत गुणों से सम्पन्न हो सकते थे, परन्तु उनकी शक्ति ऐसी सत्ता की रक्षा कर रही थी जिसने द्रौपदी के अपमान, छलपूर्वक राज्यहरण और शान्ति-प्रस्ताव के अस्वीकार को जन्म दिया।
कृष्ण समझते थे कि केवल पारम्परिक युद्ध-कौशल से इन योद्धाओं को पराजित करना कठिन था। इसलिए उन्होंने पाण्डवों को उनकी प्रतिज्ञाओं, मनोवृत्तियों और युद्धगत दुर्बलताओं के अनुसार रणनीति बताई।
महाभारत दिखाता है कि दीर्घकाल तक संरक्षित अधर्म ऐसी परिस्थिति उत्पन्न कर सकता है जिसमें प्रत्येक उपलब्ध विकल्प किसी न किसी दोष से स्पर्शित हो। कृष्ण उस त्रासद परिस्थिति में उस पक्ष को विजय दिलाते हैं जिसमें न्यायपूर्ण व्यवस्था पुनः स्थापित करने की सम्भावना शेष थी।
श्रीकृष्ण और अभिमन्यु का वियोग
अभिमन्यु अर्जुन और सुभद्रा के पुत्र तथा श्रीकृष्ण के भानजे थे। चक्रव्यूह में अनेक महारथियों द्वारा उन्हें घेरकर मार दिया गया। इस वध ने अर्जुन और पाण्डवों को भीतर तक तोड़ दिया।
कृष्ण ने अर्जुन के दुःख को अस्वीकार नहीं किया, परन्तु उसे अनियन्त्रित विनाश में बदलने भी नहीं दिया। जयद्रथ-वध की प्रतिज्ञा के बाद वे अर्जुन के सारथी और रणनीतिक मार्गदर्शक बने रहे।
यहाँ कृष्ण का अपना पारिवारिक दुःख भी कथा में मौन रूप से उपस्थित है। धर्म के पक्ष में खड़े होने का अर्थ यह नहीं कि पीड़ा भक्तों तक नहीं पहुँचेगी।
युद्ध के बाद भी श्रीकृष्ण की भूमिका समाप्त नहीं हुई
कुरुक्षेत्र में विजय के बाद युधिष्ठिर प्रसन्न नहीं थे। अपने सम्बन्धियों और असंख्य योद्धाओं के विनाश से वे गहरे शोक में डूब गए और राज्य त्यागना चाहते थे।
कृष्ण ने उन्हें पलायन करने के स्थान पर राजधर्म निभाने के लिए प्रेरित किया। वे युधिष्ठिर को शरशय्या पर स्थित भीष्म के पास ले गए, जहाँ भीष्म ने राजधर्म, आपद्धर्म, मोक्षधर्म और शासन के विविध पक्षों का उपदेश दिया।
युद्ध जीतना धर्म की स्थापना का अन्त नहीं था। नष्ट व्यवस्था के बाद न्यायपूर्ण शासन स्थापित करना भी उतना ही आवश्यक था। कृष्ण पाण्डवों को विजय दिलाकर चले नहीं जाते; वे उन्हें विजय का उत्तरदायित्व निभाने के लिए तैयार करते हैं।
भीष्म के अन्तिम क्षणों में श्रीकृष्ण
शरशय्या पर स्थित भीष्म ने उत्तरायण की प्रतीक्षा की। उनके अन्तिम समय में श्रीकृष्ण सामने उपस्थित थे। महाभारत और श्रीमद्भागवत की परम्परा में भीष्म अपनी चेतना भगवान् के उसी सारथी-स्वरूप में स्थिर करते हैं जिसे उन्होंने युद्धभूमि में देखा था—धूल और श्रम से युक्त, अर्जुन के रथ को चलाते हुए।
यह भक्ति का अद्भुत दृश्य है। भीष्म उस भगवान् का ध्यान केवल अलौकिक ऐश्वर्य में नहीं करते; वे उस रूप को स्मरण करते हैं जिसमें परमेश्वर ने अपने भक्त की सेवा स्वीकार की।
महाभारत के युद्ध में वे कृष्ण के विरोधी पक्ष में खड़े थे, लेकिन हृदय से उनकी दिव्यता जानते थे। कृष्ण भी उनके अन्तिम क्षणों में उपस्थित होकर बताते हैं कि बाहरी युद्ध-स्थिति और भीतरी भक्ति का सम्बन्ध हमेशा सरल नहीं होता।
गांधारी का शाप
अपने पुत्रों के विनाश से दुःखी गांधारी ने श्रीकृष्ण को उत्तरदायी मानते हुए शाप दिया कि जिस प्रकार कुरुवंश का विनाश हुआ, उसी प्रकार यादववंश भी परस्पर संघर्ष में नष्ट होगा।
कृष्ण ने इसे स्वीकार किया। महाभारत के मौसलपर्व में यादवों का पारस्परिक विनाश, बलराम का प्रस्थान और अन्ततः कृष्ण का लौकिक अवसान वर्णित है। मौसलपर्व महाभारत का सोलहवाँ पर्व है।
वन में योगस्थित श्रीकृष्ण के चरण को मृग समझकर जरा नामक व्याध ने बाण चला दिया। सत्य जानने पर वह भयभीत हुआ, किन्तु कृष्ण ने उसे आश्वस्त किया। यह घटना कृष्ण की असहाय मृत्यु नहीं, उनके स्वीकृत लौकिक प्रस्थान के रूप में वर्णित होती है।
श्रीकृष्ण के प्रस्थान के बाद अर्जुन का गांडीव
कृष्ण के प्रस्थान के बाद अर्जुन द्वारका से स्त्रियों, बच्चों और बचे हुए जनों को सुरक्षित ले जाने का प्रयत्न करते हैं। मार्ग में लुटेरों का आक्रमण होता है। वही अर्जुन जिसने कुरुक्षेत्र के महान योद्धाओं को पराजित किया था, अपनी पूर्व शक्ति और दिव्यास्त्रों का प्रभाव पहले जैसा नहीं पाते।
यह प्रसंग महाभारत का अत्यन्त मार्मिक सत्य खोलता है। अर्जुन का वैभव केवल उनके व्यक्तिगत अहंकार की उपलब्धि नहीं था। समय, दैवी अनुग्रह और श्रीकृष्ण की उपस्थिति ने उनके पुरुषार्थ को फलित किया था।
कृष्ण के प्रस्थान के साथ द्वापर का एक युग समाप्त होता है। पाण्डव भी समझ जाते हैं कि उनके जीवन का प्रयोजन पूर्ण हो चुका है। वे राज्य परीक्षित को सौंपकर महाप्रस्थान की ओर बढ़ते हैं।
महाभारत में कृष्ण क्या स्थापित करते हैं?
धर्म जड़ नियम नहीं है
महाभारत में परिस्थितियाँ इतनी जटिल हैं कि केवल बाहरी नियम पकड़कर धर्म का निर्णय सम्भव नहीं। कृष्ण कर्म के उद्देश्य, परिस्थिति, परिणाम और व्यापक न्याय—सभी को देखते हैं।
शान्ति का प्रयास दुर्बलता नहीं
कृष्ण युद्ध की तैयारी जानते हुए भी शान्ति का अन्तिम प्रयास करते हैं। उनके लिए संवाद और शक्ति परस्पर विरोधी नहीं; न्यायपूर्ण शान्ति के लिए दोनों का विवेकपूर्ण उपयोग आवश्यक हो सकता है।
निष्क्रियता हमेशा अहिंसा नहीं
जब निर्दोषों का अपमान, अधिकारों का हरण और प्रत्येक शान्ति-प्रस्ताव अस्वीकार हो, तब निष्क्रिय बने रहना भी अधर्म को संरक्षण दे सकता है।
विजय अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व है
कृष्ण पाण्डवों को राज्य दिलाते हैं, लेकिन युद्ध के बाद युधिष्ठिर को राजधर्म सीखने भेजते हैं। धर्मपूर्ण विजय का अर्थ प्रजा की सेवा और न्यायपूर्ण शासन है।
भगवान् मार्ग दिखाते हैं, कर्म मनुष्य को करना होता है
कृष्ण स्वयं अर्जुन के स्थान पर धनुष नहीं उठाते। वे मोह दूर करते हैं, दृष्टि देते हैं और रथ चलाते हैं; युद्ध अर्जुन को करना पड़ता है।
“यतो धर्मस्ततो कृष्णः”
महाभारत में कृष्ण और धर्म का सम्बन्ध अनेक स्थलों पर व्यक्त होता है। परम्परा में प्रचलित सूत्र है:
यतः कृष्णस्ततो धर्मो यतो धर्मस्ततो जयः।
जहाँ कृष्ण हैं, वहाँ धर्म है; और जहाँ धर्म है, वहाँ विजय है। महाभारत का समग्र निष्कर्ष यही है।
भगवद्गीता के अन्त में संजय इसे और स्पष्ट करते हैं:
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥
—भगवद्गीता
जहाँ योगेश्वर कृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धर अर्जुन हैं, वहाँ श्री, विजय, समृद्धि और अटल नीति है।
महाभारत के हृदय में खड़े श्रीकृष्ण
महाभारत में श्रीकृष्ण राजा नहीं बनते, फिर भी राजाओं की दिशा निर्धारित करते हैं। वे योद्धा के रूप में शस्त्र नहीं चलाते, फिर भी युद्ध का परिणाम उनकी नीति से जुड़ा है। वे शान्तिदूत बनते हैं, लेकिन अन्याय के सामने समर्पण को शान्ति नहीं कहते। वे अर्जुन के मित्र हैं, किन्तु आवश्यकता पड़ने पर गुरु बनकर उसके मोह को काटते हैं।
उनकी सबसे बड़ी भूमिका—वे मनुष्य को कठिन निर्णय से बचाते नहीं, उसे निर्णय के योग्य बनाते हैं।
कुरुक्षेत्र के कोलाहल में रथ के अग्रभाग पर बैठे कृष्ण आज भी मनुष्य से कहते हैं: अपने भय को देखो, अपने मोह को पहचानो, धर्म पर विचार करो, अहंकार को समर्पित करो—और फिर कर्तव्य से पीछे मत हटो।
महाभारत का युद्ध समाप्त हो गया, पर मनुष्य के भीतर का कुरुक्षेत्र शेष है। इसीलिए अर्जुन के सारथी आज भी प्रत्येक जिज्ञासु हृदय के लिए मार्गदर्शक हैं।

