श्रीकृष्ण को किसी एक सम्बन्ध, एक स्थान अथवा एक भूमिका में बाँधना सम्भव नहीं। वृन्दावन में वे गोपाल हैं; माता यशोदा के आँगन में नटखट बालक; गोपों के बीच सखा; गोपियों के लिए प्रेम के परम आधार; मथुरा में अत्याचार के विनाशक; द्वारका में प्रजापालक; हस्तिनापुर में शान्तिदूत; कुरुक्षेत्र में सारथी और भगवद्गीता में सम्पूर्ण मानवता के जगद्गुरु।
सनातन धर्म में श्रीकृष्ण की भूमिका की विलक्षणता इसी में है कि वे जीवन से दूर बैठकर उपदेश नहीं देते। वे जीवन के बीच उतरते हैं—गोधन चराते हैं, मित्रता निभाते हैं, अन्याय का सामना करते हैं, राजनीति की जटिलताओं में धर्म का मार्ग खोजते हैं और युद्धभूमि के मध्य मोहग्रस्त मनुष्य को आत्मा, कर्म, ज्ञान, भक्ति और मोक्ष का बोध कराते हैं।
श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व बताता है कि धर्म केवल वन में किया जाने वाला तप नहीं; वह परिवार, समाज, शासन, मैत्री, संघर्ष, निर्णय और कर्तव्य—सभी में जीवित रहने वाली चेतना है।
श्रीकृष्ण कौन हैं: अवतार या स्वयं भगवान्?
सनातन धर्म की विभिन्न दार्शनिक और वैष्णव परम्पराएँ श्रीकृष्ण के स्वरूप को अपनी-अपनी तात्त्विक दृष्टि से समझाती हैं। व्यापक वैष्णव मान्यता में श्रीकृष्ण भगवान् विष्णु के पूर्णावतार माने जाते हैं। श्रीमद्भागवत की कृष्ण-केन्द्रित व्याख्या उन्हें स्वयं भगवान् कहती है:
एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्।
इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृडयन्ति युगे युगे॥
—श्रीमद्भागवत महापुराण
भावार्थतः, पूर्व में वर्णित अवतार परम पुरुष के अंश अथवा कलाएँ हैं, किन्तु कृष्ण स्वयं भगवान् हैं; वे युग-युग में पीड़ित संसार की रक्षा करते हैं। (श्रीमद्भागवत)
धर्म की स्थापना के लिए अवतार
श्रीकृष्ण अपनी भूमिका का सबसे प्रसिद्ध उद्घोष भगवद्गीता में स्वयं करते हैं:
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥
—भगवद्गीता
जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब भगवान् साधुजनों की रक्षा, दुष्कर्मियों के विनाश और धर्म की पुनः स्थापना के लिए प्रकट होते हैं।
यहाँ “धर्मसंस्थापन” का अर्थ केवल किसी अत्याचारी का वध करना नहीं है। अधर्मी व्यक्ति का अन्त एक घटना है; धर्म को पुनः प्रतिष्ठित करना कहीं व्यापक कार्य है। इसके लिए मनुष्य की बुद्धि, समाज की मर्यादा, शासन की दिशा और कर्म के उद्देश्य को पुनः व्यवस्थित करना पड़ता है।
कृष्ण ने कंस का वध किया, किन्तु स्वयं मथुरा का सिंहासन नहीं लिया। उन्होंने अत्याचारी द्वारा अपदस्थ किए गए उग्रसेन को पुनः प्रतिष्ठित किया। इस प्रसंग में उनका उद्देश्य व्यक्तिगत राज्य-प्राप्ति नहीं, न्यायपूर्ण व्यवस्था की पुनर्स्थापना था।
बालगोपाल: ईश्वर का जनसामान्य से आत्मीय सम्बन्ध
श्रीकृष्ण का बालगोपाल स्वरूप भारतीय भक्ति-परम्परा की सबसे आत्मीय उपलब्धियों में से एक है। परमेश्वर यहाँ केवल पूजा स्वीकार करने वाले सर्वशक्तिमान अधिपति नहीं हैं। वे माता के हाथ से भोजन करते हैं, माखन के लिए हठ करते हैं, गोपबालकों के साथ खेलते हैं और यशोदा के प्रेम की डोरी से बँध जाते हैं।
भागवत का दामोदर-प्रसंग एक गहरा आध्यात्मिक सत्य प्रकट करता है—जिन भगवान् को योगी दीर्घ साधना के बाद भी पूर्णतः ग्रहण नहीं कर पाते, वे माता यशोदा के निष्कपट वात्सल्य के सामने स्वयं को बँधने देते हैं।
यह बन्धन भगवान् की असमर्थता नहीं, भक्त-प्रेम की विजय है।
बालकृष्ण की भूमिका धर्म को भय से मुक्त करती है। मनुष्य परमात्मा से केवल भयभीत न हो; वह उनसे प्रेम कर सकता है, उन्हें अपना पुत्र मान सकता है, मित्र मान सकता है और अपने घर का सदस्य बना सकता है। इसी भाव का घरेलू उपासना-रूप आगे चलकर लड्डू गोपाल की सेवा में दिखाई देता है।
गोपाल और गोविन्द: प्रकृति एवं जीव-जगत् के संरक्षक
“गोपाल” का सामान्य अर्थ है—गायों का पालन करने वाला। “गोविन्द” नाम भी श्रीकृष्ण के अनेक दिव्य सम्बन्धों को व्यक्त करता है। कृष्ण का गोधन चराना केवल ग्रामीण जीवन का मनोरम दृश्य नहीं; इसमें संरक्षण, पोषण और प्रकृति के प्रति आत्मीयता का धर्म निहित है।
गोवर्धन-लीला में कृष्ण ब्रजवासियों को उस पर्वत, भूमि, वनस्पति, गोधन और श्रम के प्रति कृतज्ञ होने की शिक्षा देते हैं जिनसे उनका प्रत्यक्ष जीवन चलता है। जब इन्द्र के क्रोध से प्रलयंकारी वर्षा होती है, तब वे गोवर्धन पर्वत उठाकर मनुष्य, पशु और सम्पूर्ण ब्रज-समुदाय की एक साथ रक्षा करते हैं।
इस लीला में श्रीकृष्ण की भूमिका केवल चमत्कार करने वाले देवता की नहीं है। वे बताते हैं कि धर्म का अर्थ जीवन को पोषित करने वाली व्यवस्था का आदर करना भी है। गोवर्धन की छाया में मनुष्य, पशु, प्रकृति और भगवान्—चारों का सम्बन्ध एक आध्यात्मिक परिवार में परिवर्तित हो जाता है।
भक्तवत्सल: जो भक्त का भाव स्वीकार करते हैं
श्रीकृष्ण की कथाओं में सामाजिक प्रतिष्ठा से अधिक भाव की महत्ता दिखाई देती है। वे विदुर के घर जाते हैं, सुदामा के तन्दुल स्वीकार करते हैं और द्रौपदी की पुकार पर उसकी रक्षा करते हैं। वे राजमहलों में सम्मानित होते हैं, किन्तु उनका हृदय भक्त के निष्कपट समर्पण से बँधता है।
भगवद्गीता में वे कहते हैं:
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥
—भगवद्गीता
अर्थात् जो भक्त प्रेमपूर्वक पत्र, पुष्प, फल अथवा जल अर्पित करता है, उसके शुद्ध भाव से दिए गए उस अर्पण को मैं स्वीकार करता हूँ।
इस श्लोक का केन्द्र वस्तु नहीं, भक्त्या—भक्ति है। भगवान् को अर्पित पदार्थ की भव्यता प्रभावित नहीं करती; वे उसके भीतर स्थित प्रेम को स्वीकार करते हैं। यही सिद्धान्त कृष्ण-भक्ति को राजप्रासाद से लेकर सामान्य गृहस्थ के छोटे-से पूजा-स्थान तक सबके लिए सुलभ बनाता है।
सखा: समानता तक उतर आने वाला परमात्मा
अर्जुन श्रीकृष्ण के भक्त हैं, परन्तु उनके सखा भी हैं। सुदामा उनके बालसखा हैं। ब्रज के गोपबालक उनके साथ भोजन करते, खेलते और उन्हें अपने समान मित्र समझते हैं।
भक्ति का यह सख्यभाव अद्वितीय है।
महाभारत में श्रीकृष्ण अर्जुन के सारथी बनते हैं। वे चाहें तो स्वयं शस्त्र उठा सकते थे, परन्तु उन्होंने अर्जुन का रथ चलाना स्वीकार किया। भगवान् का सारथी बनना सेवा की गरिमा स्थापित करता है। संसार जिसे छोटा कार्य समझ सकता है, भगवान् उसे धर्म-साधना बना देते हैं। श्रीकृष्ण ने, महाभारत युद्ध की शुरुआत से पहले, प्रतिज्ञा की थी कि वे कुरुक्षेत्र के युद्ध में स्वयं कोई शस्त्र नहीं उठाएंगे।
‘पार्थसारथी’ बनकर श्रीकृष्ण अर्जुन के मार्गदर्शक बने।
श्रीकृष्ण और अर्जुन की मित्रता – कुरुक्षेत्र में अर्जुन जब मोहग्रस्त होते हैं, तब कृष्ण केवल उनकी भावना से सहमत नहीं होते। सच्चा मित्र वह है जो भ्रम के समय सत्य कहे और दुर्बलता के क्षण में कर्तव्य का बोध कराए।
शान्तिदूत और धर्मसम्मत राजनीति के मार्गदर्शक
महाभारत में श्रीकृष्ण की भूमिका – उसे टालने का अन्तिम प्रयास करने वाले शान्तिदूत की भी है। वे पाण्डवों की ओर से हस्तिनापुर जाते हैं। दुर्योधन के सामने युद्ध रोकने का प्रस्ताव रखते हैं और पाण्डवों के न्यायोचित अधिकार की बात करते हैं।
जब व्यापक न्याय की माँग अस्वीकार होती दिखाई देती है, तब पाँच ग्राम तक का प्रस्ताव रखा जाता है। दुर्योधन उसे भी स्वीकार नहीं करता। इस क्रम के बाद ही युद्ध अपरिहार्य होता है।
उन्होंने पहले संवाद, समझौता और शान्ति का मार्ग अपनाया। लेकिन जब प्रत्येक शान्तिपूर्ण मार्ग को अहंकार ने बन्द कर दिया, तब उन्होंने अन्याय के समक्ष निष्क्रियता को शान्ति का नाम नहीं दिया।
उनकी भूमिका धर्मसम्मत सत्ता को उसका उत्तरदायित्व स्मरण कराने की है।
सारथी: मनुष्य के रथ को दिशा देने वाले भगवान्
कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण का अर्जुन का सारथी बनना भारतीय आध्यात्मिक चेतना का महान दृश्य है। रथ के बीच बैठे अर्जुन के हाथ में धनुष है, किन्तु उनके भीतर निर्णय की शक्ति टूट चुकी है। दूसरी ओर कृष्ण के हाथ में शस्त्र नहीं, रथ की लगाम है—और उन्हीं के पास दिशा है।
यह दृश्य मानव-जीवन का गम्भीर बोध कराता है। सामर्थ्य, कौशल और साधन पर्याप्त नहीं, यदि बुद्धि भ्रमित हो। मनुष्य के पास गांडीव हो सकता है, किन्तु उसे यह जानना होगा कि उसे उठाना कब धर्म है और रख देना कब पलायन।
श्रीकृष्ण अर्जुन के स्थान पर युद्ध नहीं करते। वे उन्हें ज्ञान देते हैं, मोह दूर करते हैं और फिर निर्णय अर्जुन पर छोड़ते हैं:
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु॥
—भगवद्गीता
अर्थात् मैंने तुम्हें यह अत्यन्त गूढ़ ज्ञान कह दिया। अब इस पर पूर्णतः विचार करके जैसी तुम्हारी इच्छा हो, वैसा करो।
यहाँ कृष्ण गुरु होकर भी शिष्य की स्वतन्त्र चेतना का सम्मान करते हैं। वे विवेक देते हैं, विवशता नहीं।
योगेश्वर: कर्म और अध्यात्म के बीच सेतु
श्रीकृष्ण को भगवद्गीता में योगेश्वर कहा गया है। गीता का योग जीवन छोड़ देने की शिक्षा नहीं देता; वह जीवन के मध्य आन्तरिक समत्व, आसक्ति-रहित कर्म और परमात्मा से सम्बन्ध का मार्ग खोलता है।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
—भगवद्गीता
मनुष्य का अधिकार कर्म पर है, फल पर नहीं। इसका अर्थ फल की योजना न बनाना या परिणामों के प्रति उत्तरदायी न होना नहीं है। इसका तात्पर्य है कि मनुष्य फल की चिन्ता, अहंकार और आसक्ति से इतना ग्रस्त न हो जाए कि उसका कर्म ही अशुद्ध हो जाए।
कृष्ण कर्म से भागने को अध्यात्म नहीं कहते। वे अर्जुन को युद्धभूमि से पलायन करने के स्थान पर अपने स्वधर्म को पहचानने की शिक्षा देते हैं। इसीलिए कृष्ण का योग संन्यासी के लिए भी है और गृहस्थ, श्रमिक, योद्धा, शासक तथा सामान्य नागरिक के लिए भी।
जगद्गुरु: ज्ञान, कर्म और भक्ति का समन्वय
श्रीकृष्ण की जगद्गुरु की भूमिका भगवद्गीता में अपने पूर्ण प्रकाश में आती है। वे आत्मा की अमरता समझाते हैं, निष्काम कर्म का मार्ग बताते हैं, ध्यानयोग का विवेचन करते हैं, प्रकृति और पुरुष का भेद खोलते हैं, विश्वरूप का दर्शन कराते हैं और अन्ततः भक्ति एवं शरणागति की ओर ले जाते हैं।
उनका उपदेश किसी एक मनोस्थिति के व्यक्ति के लिए नहीं है। कर्मशील मनुष्य कर्मयोग पा सकता है; विचारशील साधक ज्ञानयोग; ध्यानशील साधक ध्यानयोग और प्रेमप्रधान भक्त भक्तियोग।
श्रीकृष्ण कहते हैं:
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः॥
—भगवद्गीता
अर्थात् मैं ही सबका मूल हूँ और मुझसे ही सब प्रवृत्त होता है। इसे समझने वाले ज्ञानी भावपूर्वक मेरा भजन करते हैं।
गीता के अन्त में यह शिक्षा शरणागति के चरम तक पहुँचती है:
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
—भगवद्गीता
यहाँ “सर्वधर्मान् परित्यज्य” का अर्थ अनैतिकता अथवा उत्तरदायित्व का त्याग नहीं है। गीता के सम्पूर्ण सन्दर्भ में यह सीमित अहंकार, फलासक्ति और मनुष्य-निर्मित आश्रयों से ऊपर उठकर परमेश्वर की शरण ग्रहण करने का आह्वान है।
प्रेम के परम केन्द्र
श्रीकृष्ण की भूमिका केवल धर्म के नियम स्थापित करने तक सीमित नहीं। वे प्रेम को साधना की पराकाष्ठा तक पहुँचाते हैं। वृन्दावन में भक्त और भगवान् का सम्बन्ध औपचारिक दूरी से मुक्त हो जाता है।
यशोदा उन्हें पुत्र मानती हैं। सखा उन्हें अपना मित्र समझते हैं। गोपियाँ अपने सम्पूर्ण अस्तित्व का केन्द्र मानती हैं। राधा-कृष्ण की भक्ति-परम्परा इस दिव्य प्रेम को आत्मा की परमात्मा के प्रति सर्वोच्च तन्मयता के रूप में देखती है।
यह प्रेम सांसारिक अधिकार की माँग नहीं करता। इसका स्वरूप स्वयं को भगवान् के सुख और स्मरण में अर्पित करना है। रासलीला का शास्त्रीय अर्थ समझे बिना उसे लौकिक स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की दृष्टि से देखना भागवत के आध्यात्मिक आशय को विकृत कर देता है। इस विषय पर आगे एक अलग, विस्तृत लेख प्रस्तुत किया जाएगा।
विराट भी, आत्मीय भी
अर्जुन को विश्वरूप दिखाने वाले कृष्ण वही हैं जो यशोदा से भयभीत होकर भागते दिखाई देते हैं। जिनके मुख में माता सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड देखती हैं, वही बालक माखन के लिए रूठते हैं। जो कुरुक्षेत्र में काल के विराट स्वरूप हैं, वही सुदामा के चरण धोते हैं।
इन स्वरूपों में विरोध नहीं है। यही श्रीकृष्ण की पूर्णता है—उनकी विराटता आत्मीयता को नष्ट नहीं करती और उनकी सरलता दिव्यता को कम नहीं करती।
केवल विराट परमात्मा मनुष्य को विस्मित कर सकता है; बालगोपाल उसके हृदय में स्थान बनाते हैं; भक्तवत्सल कृष्ण उसे प्रेम करना सिखाते हैं।
श्रीकृष्ण और हमारा, आपका जीवन
- बालगोपाल बताते हैं कि पवित्रता सहज आनन्द में भी मिल सकती है।
- गोपाल जीवों और प्रकृति के संरक्षण का भाव जगाते हैं।
- सखा कृष्ण सम्बन्धों में निष्ठा और सत्य का महत्त्व बताते हैं।
- शान्तिदूत कृष्ण संवाद का प्रत्येक सम्भव मार्ग अपनाने की प्रेरणा देते हैं।
- धर्मरक्षक कृष्ण अन्याय के सामने निष्क्रियता को धर्म नहीं मानते।
- सारथी कृष्ण सामर्थ्य को सही दिशा देने की आवश्यकता समझाते हैं।
- योगेश्वर कृष्ण कर्म के बीच आन्तरिक शान्ति का मार्ग दिखाते हैं।
- जगद्गुरु कृष्ण ज्ञान को जीवन के निर्णयों से जोड़ते हैं।
- भक्तवत्सल कृष्ण बताते हैं कि भगवान् तक पहुँचने के लिए वैभव नहीं, भाव चाहिए।
कृष्ण – मनुष्य को संसार में – संसार के बीच – उसकी चेतना को परमात्मा से जोड़ते हैं।
जहाँ योगेश्वर हैं, वहाँ धर्ममय विजय है
महाभारत और भगवद्गीता के अन्त में संजय का निष्कर्ष श्रीकृष्ण की भूमिका को एक सूत्र में बाँध देता है:
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥
—भगवद्गीता
जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ कर्तव्य के लिए तत्पर धनुर्धर अर्जुन हैं, वहाँ श्री, विजय, ऐश्वर्य और अटल नीति है।
यह श्लोक केवल युद्ध-विजय का आश्वासन नहीं है। कृष्ण दिशा हैं और अर्जुन पुरुषार्थ। केवल दिशा हो, पर कर्म न हो, तो परिवर्तन नहीं आता; केवल शक्ति हो, पर धर्ममय दिशा न हो, तो वह विनाश का कारण बन सकती है।
सनातन धर्म में श्रीकृष्ण की भूमिका इसी समन्वय की है—वे प्रेम को मर्यादा, शक्ति को विवेक, कर्म को समर्पण और जीवन को परम उद्देश्य प्रदान करते हैं। वे मनुष्य को उसके उत्तरदायित्व का बोध कराते हैं; उसके हाथ में कर्म का गांडीव रखते हुए स्वयं उसके हृदय के सारथी बन जाते हैं।

