प्रत्येक चन्द्र मास में दो बार—कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि पर—भारत भर के असंख्य घरों में जीवन की सामान्य गति कुछसमय के लिए थम-सी जाती है। अन्न का त्याग होता है, अनेक परिवार प्याज़ और लहसुन से भी परहेज़ करते हैं, और दिन का स्वरूप भोजन से अधिक भजन, जप, प्रार्थना, भगवान विष्णु के पूजन और पुरातन व्रत-कथाओं के श्रवण में बदल जाता है। कहीं कथा दादी-नानी से सुनी जातीहै, कहीं पुरोहित से, कहीं किसी पवित्र ग्रन्थ से और कहीं पीढ़ियों से चली आ रही पारिवारिक परम्परा से। यही है एकादशी—संयम के माध्यमसे स्वयं को ईश्वर की स्मृति में पुनः स्थापित करने का पावन अवसर।
वर्ष 2026 – 24 प्रमुख एकादशी व्रत – प्रत्येक एकादशी का अपना नाम, अपनी पवित्र कथा, अपनी साधना और अपना आध्यात्मिक सन्देश है।
एकादशी विशेष रूप से भगवान विष्णु को समर्पित मानी जाती है। पुराणों और प्राचीन व्रत-परम्पराओं में एकादशी को ऐसी साधना के रूप में वर्णित किया गया है, जिसके माध्यम से भक्त आत्मशुद्धि, ईश्वर-कृपा, आध्यात्मिक स्पष्टता और पूर्व कर्मों के बोझ से मुक्ति की कामना करता है। पद्म पुराण सहित अनेक पुराणों और वैष्णव परम्पराओं में वे एकादशी कथाएँ सुरक्षित हैं जिन्हें आज भी देश भर के घरों और मन्दिरोंमें श्रद्धा से सुना और सुनाया जाता है।
व्रत का स्वरूप सभी के लिए एक-सा नहीं होता। कुछ भक्त निराहार व्रत रखते हैं, कुछ फलाहार या दूध ग्रहण करते हैं, तो कुछ अपने क्षेत्र, परिवार अथवा सम्प्रदाय की परम्परा के अनुसार व्रत करते हैं। किन्तु उसका मूल भाव एक ही है—शरीर का संयम मन को ईश्वर की ओर मोड़े; उपवास के साथ प्रार्थना, दान, जप, आत्मचिन्तन और सदाचार भी जुड़े।
तिथियों को लेकर एक बात ध्यान देने योग्य है। एकादशी किसी निश्चित अंग्रेज़ी तारीख़ पर नहीं, बल्कि चन्द्र तिथि के आधार पर निर्धारित होती है। नीचे दिए गए दिन 2026 की प्रमुख स्मार्त एकादशी तिथियाँ हैं। भौगोलिक स्थान, सूर्योदय, तिथि की अवधि और सम्प्रदाय के अनुसार पारण अथवा वैष्णव एकादशी की तिथि में अन्तर हो सकता है। इसलिए सटीक स्थानीय समय के लिए अपने परिवार, मन्दिर अथवा परम्परा में मान्य पंचांग अवश्य देखें।
वर्ष 2026 की सभी 24 एकादशियाँ
| क्रम | एकादशी | तिथि | दिन | पक्ष | हिन्दू मास |
| 1 | षट्तिला एकादशी | 14 जनवरी | बुधवार | कृष्ण | माघ |
| 2 | जया एकादशी | 29 जनवरी | गुरुवार | शुक्ल | माघ |
| 3 | विजया एकादशी | 13 फ़रवरी | शुक्रवार | कृष्ण | फाल्गुन |
| 4 | आमलकी एकादशी | 27 फ़रवरी | शुक्रवार | शुक्ल | फाल्गुन |
| 5 | पापमोचनी एकादशी | 15 मार्च | रविवार | कृष्ण | चैत्र |
| 6 | कामदा एकादशी | 29 मार्च | रविवार | शुक्ल | चैत्र |
| 7 | वरूथिनी एकादशी | 13 अप्रैल | सोमवार | कृष्ण | वैशाख |
| 8 | मोहिनी एकादशी | 27 अप्रैल | सोमवार | शुक्ल | वैशाख |
| 9 | अपरा एकादशी | 13 मई | बुधवार | कृष्ण | ज्येष्ठ |
| 10 | पद्मिनी एकादशी | 27 मई | बुधवार | शुक्ल | अधिक ज्येष्ठ |
| 11 | परमा एकादशी | 11 जून | गुरुवार | कृष्ण | अधिक ज्येष्ठ |
| 12 | निर्जला एकादशी | 25 जून | गुरुवार | शुक्ल | ज्येष्ठ |
| 13 | योगिनी एकादशी | 10 जुलाई | शुक्रवार | कृष्ण | आषाढ़ |
| 14 | देवशयनी एकादशी | 25 जुलाई | शनिवार | शुक्ल | आषाढ़ |
| 15 | कामिका एकादशी | 9 अगस्त | रविवार | कृष्ण | श्रावण |
| 16 | श्रावण पुत्रदा एकादशी | 23 अगस्त | रविवार | शुक्ल | श्रावण |
| 17 | अजा एकादशी | 7 सितम्बर | सोमवार | कृष्ण | भाद्रपद |
| 18 | पार्श्व एकादशी | 22 सितम्बर | मंगलवार | शुक्ल | भाद्रपद |
| 19 | इन्दिरा एकादशी | 6 अक्टूबर | मंगलवार | कृष्ण | आश्विन |
| 20 | पापांकुशा एकादशी | 22 अक्टूबर | गुरुवार | शुक्ल | आश्विन |
| 21 | रमा एकादशी | 5 नवम्बर | गुरुवार | कृष्ण | कार्तिक |
| 22 | देवउठनी एकादशी | 20 नवम्बर | शुक्रवार | शुक्ल | कार्तिक |
| 23 | उत्पन्ना एकादशी | 4 दिसम्बर | शुक्रवार | कृष्ण | मार्गशीर्ष |
| 24 | मोक्षदा / वैकुण्ठ एकादशी | 20 दिसम्बर | रविवार | शुक्ल | मार्गशीर्ष |
एकादशी का पालन स्थानीय सूर्योदय और तिथि की स्थिति पर निर्भर करता है। इसलिए इन तिथियों को वार्षिक मार्गदर्शिका के रूप में देखें, और पारण तथा सम्प्रदाय-विशेष के नियमों के लिए स्थानीय पंचांग का अनुसरण करें।
जनवरी: षट्तिला और जया एकादशी
षट्तिला एकादशी — 14 जनवरी
षट्तिला नाम का सम्बन्ध तिल से है। माघ कृष्ण पक्ष की इस एकादशी में तिल के छह प्रकार के उपयोग का उल्लेख मिलता है—स्नान, उबटन, हवन, दान, भोजन तथा तिल से सम्बन्धित अन्य पवित्र आचरण। इसी कारण इसका नाम षट्तिला पड़ा।
पद्म पुराण में एक ऐसी धर्मपरायण स्त्री की कथा आती है जो तप, व्रत और पूजा तो अत्यन्त श्रद्धा से करती थी, किन्तु अन्नदान और उदारता में पीछे रह गई थी। भगवान विष्णु एक भिक्षुक के रूप में उसके द्वार पर पहुँचे और भिक्षा माँगी। क्रोध अथवा कृपणता में उसने उन्हें अन्न देने के स्थान पर मिट्टी का एक ढेला दे दिया।
बाद में जब उसे दिव्य लोक प्राप्त हुआ तो उसका भवन तो सुन्दर था, किन्तु उसमें अन्न और समृद्धि का अभाव था। तब उसे षट्तिला व्रत और तिल से सम्बन्धित दान तथा पुण्यकर्म का मार्ग बताया गया। श्रद्धा से व्रत करने पर उसकी कमी दूर हुई और उसे समृद्धि तथा ईश्वर-कृपा प्राप्त हुई।
इस कथा का सन्देश अत्यन्त सरल है—पूजा तभी पूर्ण होती है जब वह हृदय को भी उदार बनाए। कर्मकाण्ड के साथ करुणा और दान जुड़े बिना धर्म अधूरा रह जाता है।
जया एकादशी — 29 जनवरी
माघ शुक्ल पक्ष की जया एकादशी को कष्टदायक अवस्थाओं से मुक्ति और ईश्वर-कृपा की पुनः प्राप्ति से जोड़ा जाता है।
इसकी कथा मल्यवान नामक गन्धर्व और उसकी प्रिय पुष्पवती से जुड़ी है। दोनों देवराज इन्द्र के दरबार में संगीत-सेवा करते थे। एक अवसर पर वे एक-दूसरे के प्रेम में इतने निमग्न हो गए कि अपने कर्तव्य का निर्वाह ठीक प्रकार से न कर सके। इन्द्र ने क्रोधित होकर उन्हें पिशाच योनिका शाप दे दिया।
दुःख और भय में भटकते हुए एक दिन ऐसा आया जब वे अन्न ग्रहण न कर सके और पूरी रात जागते रहे। संयोग से वह जया एकादशी थी। अनजाने में हुआ यह उपवास और जागरण उनके लिए पुण्य का कारण बना और प्रातः होते ही उनका शाप समाप्त हो गया।
जया एकादशी की कथा यह विश्वास जगाती है कि ईश्वर की कृपा के द्वार कभी पूर्णतः बन्द नहीं होते। पतन के बाद भी परिवर्तन सम्भव है, और कभी-कभी एक छोटा-सा संयम भी आध्यात्मिक पुनर्जन्म का कारण बन जाता है।
फ़रवरी: विजया और आमलकी एकादशी
विजया एकादशी — 13 फ़रवरी
विजया अर्थात विजय। फाल्गुन कृष्ण पक्ष की यह एकादशी भगवान राम की लंका-यात्रा से जुड़ी पुराण-परम्परा के कारण विशेष महत्व रखती है।
कथा के अनुसार, लंका जाने से पहले विशाल समुद्र ने भगवान राम की सेना का मार्ग रोक दिया। तब भगवान राम ने ऋषि बकदाल्भ्य से मार्गदर्शन माँगा। ऋषि ने उन्हें विजया एकादशी का व्रत श्रद्धा और विधि से करने की सलाह दी। भगवान राम ने व्रत किया और उसके बाद लंका की ओर उनके अभियान का मार्ग प्रशस्त हुआ।
यह प्रसंग वाल्मीकि रामायण का प्रत्यक्ष अध्याय नहीं, बल्कि भगवान राम से जुड़ी पुराण-प्रचलित एकादशी परम्परा का भाग है।
इसका आध्यात्मिक संकेत अत्यन्त सुन्दर है—बड़ी बाहरी बाधा का सामना करने से पहले भीतर की शक्ति को जागृत करना चाहिए। श्रद्धा, प्रार्थना और ईश्वर-समर्पण से प्राप्त धैर्य ही विजय की पहली सीढ़ी है।
आमलकी एकादशी — 27 फ़रवरी
फाल्गुन शुक्ल पक्ष की आमलकी एकादशी आँवले के पवित्र वृक्ष से जुड़ी है। इसे धात्री भी कहा जाता है।
पद्म पुराण में आमलकी के जन्म का वर्णन दिव्य रूप में किया गया है। भगवान ब्रह्मा से सम्बन्धित एक तेजस्वी बिन्दु पृथ्वी पर गिरा और उससे आमलकी वृक्ष उत्पन्न हुआ। यह वृक्ष भगवान विष्णु को अत्यन्त प्रिय माना गया और उसके विभिन्न भागों में देवताओं की दिव्य उपस्थिति का वर्णन किया गया।
इसी कारण इस दिन आँवले के वृक्ष के समीप पूजा, दीपदान, परिक्रमा और भगवान विष्णु का स्मरण विशेष पुण्यदायी माना जाता है।
भारत के कुछ क्षेत्रों में यह तिथि होली के आगमन से जुड़ी सांस्कृतिक परम्पराओं के साथ भी मनाई जाती है। कहीं-कहीं मन्दिरों में रंग, उत्सव और सामुदायिक पूजा का वातावरण दिखाई देता है।
आमलकी एकादशी हमें स्मरण कराती है कि प्रकृति भी ईश्वर की उपस्थिति का माध्यम बन सकती है—यदि उसे श्रद्धा और कृतज्ञता से देखाजाए।
मार्च: पापमोचनी और कामदा एकादशी
पापमोचनी एकादशी — 15 मार्च
पापमोचनी का अर्थ है—पाप अथवा दोष से मुक्त करने वाली।
पद्म पुराण में ऋषि मेधावी की कथा आती है। वे कठोर तपस्या और ध्यान में लीन रहते थे। मञ्जुघोषा नामक अप्सरा उनके समीप आई और कामदेव के प्रभाव से धीरे-धीरे ऋषि का मन तपस्या से हटने लगा। समय बीतता गया, किन्तु मोह में डूबे मेधावी को उसका आभास तक नरहा।
जब उनका विवेक लौटा, तब उन्हें अपने तप के विच्छेद का गहरा पश्चात्ताप हुआ। मञ्जुघोषा भी अपने कर्मों के परिणाम से व्याकुल थी। पापमोचनी एकादशी का व्रत उनके लिए शुद्धि और प्रायश्चित्त का मार्ग बना।
इस कथा का उद्देश्य केवल दोष दिखाना नहीं है। यह बताती है कि भूल के बाद भी मनुष्य पुनः उठ सकता है। पश्चात्ताप, आत्मबोध और नये संकल्प से आध्यात्मिक जीवन फिर प्रारम्भ किया जा सकता है।
कामदा एकादशी — 29 मार्च
चैत्र शुक्ल पक्ष की कामदा एकादशी को मनोकामना, शाप-मुक्ति और प्रेमपूर्ण समर्पण से जोड़ा जाता है।
इसकी प्रसिद्ध कथा गन्धर्व ललित और उसकी पत्नी ललिता की है। राजा पुण्डरीक के दरबार में गायन करते समय ललित का मन अपनी पत्नी की ओर चला गया और उसका गायन बिगड़ गया। राजा ने इसे अपमान मानकर उसे भयानक राक्षस होने का शाप दे दिया।
ललिता ने अपने पति को नहीं छोड़ा। वह एक ऋषि के पास गई और उपाय पूछा। ऋषि ने उसे कामदा एकादशी का व्रत करने और उसका पुण्य अपने पति को समर्पित करने का निर्देश दिया।
ललिता ने श्रद्धा से व्रत किया। उसके पुण्यफल से ललित शापमुक्त होकर पुनः अपने गन्धर्व रूप में लौट आया।
कामदा एकादशी की कथा यह दिखाती है कि आध्यात्मिक साधना केवल स्वयं के लिए नहीं होती। प्रेम, करुणा और निष्ठा के साथ अर्जित पुण्य दूसरे के कल्याण के लिए भी समर्पित किया जा सकता है।
अप्रैल: वरूथिनी और मोहिनी एकादशी
वरूथिनी एकादशी — 13 अप्रैल
वैशाख कृष्ण पक्ष की वरूथिनी एकादशी को रक्षा, धैर्य और पुनर्स्थापन से जोड़ा जाता है।
एक लोकप्रिय व्रत-कथा के अनुसार, राजा मान्धाता वन में ध्यानमग्न थे जब एक भालू ने उन पर आक्रमण कर दिया और उनके पैर को बुरी तरह घायल कर दिया। राजा ने भय और क्रोध के आगे अपने आध्यात्मिक संयम को टूटने नहीं दिया और भगवान विष्णु का स्मरण किया।
भगवान की कृपा से उनका जीवन बच गया, किन्तु चोट बनी रही। परम्परा के अनुसार भगवान विष्णु ने उन्हें वरूथिनी एकादशी का व्रत करने की प्रेरणा दी। श्रद्धा और व्रत के प्रभाव से राजा को पुनः स्वास्थ्य और शक्ति प्राप्त हुई।
इस कथा का सन्देश केवल शारीरिक आरोग्य नहीं, बल्कि संकट में भी मन को ईश्वर से जोड़े रखना है।
मोहिनी एकादशी — 27 अप्रैल
वैशाख शुक्ल पक्ष की मोहिनी एकादशी का नाम भगवान विष्णु के मोहिनी स्वरूप की स्मृति जगाता है।
इसकी व्रत-कथा धृष्टबुद्धि नामक युवक से जुड़ी है, जो एक धनवान और धर्मात्मा व्यापारी का पुत्र था। उत्तम परिवार में जन्म लेने के बावजूद वह बुरे कर्मों में पड़ गया और धीरे-धीरे परिवार, प्रतिष्ठा और सुख से वंचित हो गया।
दुःख भोगते-भोगते वह ऋषि कौण्डिन्य के आश्रम पहुँचा। अब उसके भीतर पश्चात्ताप जाग चुका था। ऋषि ने उसे मोहिनी एकादशी का व्रत करने का उपदेश दिया।
श्रद्धा, पश्चात्ताप और व्रत के माध्यम से धृष्टबुद्धि अपने पुराने कर्मों के बोझ से मुक्त हुआ और उसका जीवन पुनः धर्म की दिशा में मुड़ा।
मोहिनी एकादशी का संदेश आशा से भरा है—जो व्यक्ति ईश्वर की ओर लौटना चाहता है, उसके लिए वापसी का मार्ग कभी बन्द नहीं होता।
मई: अपरा और पद्मिनी एकादशी
अपरा एकादशी — 13 मई
ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की अपरा एकादशी को कुछ परम्पराओं में अचला एकादशी भी कहा जाता है। अपरा शब्द असीम अथवा अपरिमित पुण्य का संकेत देता है।
एक प्रसिद्ध व्रत-कथा राजा महीध्वज से जुड़ी है। उनके छोटे भाई ने ईर्ष्या के कारण उनकी हत्या कर दी। असामयिक और हिंसक मृत्यु के कारण राजा की आत्मा पीड़ा में भटकती रही।
ऋषि धौम्य वहाँ से गुज़रे और अपने आध्यात्मिक ज्ञान से स्थिति को समझ गए। करुणा से प्रेरित होकर उन्होंने अपरा एकादशी का व्रत किया और उसका पुण्य राजा महीध्वज को समर्पित कर दिया।
व्रत के पुण्यफल से राजा उस दुःखद अवस्था से मुक्त हुआ और उच्च दिव्य गति को प्राप्त हुआ।
अपरा एकादशी की कथा बताती है कि आध्यात्मिक पुण्य केवल अपने लिए संचित करने की वस्तु नहीं है; उसे करुणा के साथ दूसरे के कल्याण और मुक्ति के लिए भी अर्पित किया जा सकता है।
पद्मिनी एकादशी — 27 मई
पद्मिनी एकादशी अधिक मास अथवा पुरुषोत्तम मास में पड़ने वाली विशेष एकादशी है। चूँकि अधिक मास हर वर्ष नहीं आता, इसलिए इस एकादशी को अत्यन्त दुर्लभ और विशेष साधना का अवसर माना जाता है।
इसकी कथा राजा कृतवीर्य और रानी पद्मिनी से जुड़ी है। राजवैभव होने के बाद भी दम्पति सन्तान-सुख से वंचित थे। उन्होंने दीर्घकाल तक तप और प्रार्थना की।
अनसूया माता के मार्गदर्शन से रानी पद्मिनी ने पुरुषोत्तम मास की शुक्ल पक्ष एकादशी का व्रत अत्यन्त श्रद्धा से किया। भगवान विष्णु उनकी भक्ति से प्रसन्न हुए और दम्पति को इच्छित वरदान प्राप्त हुआ।
पद्मिनी एकादशी यह सिखाती है कि जब सांसारिक प्रयास पर्याप्त न लगें, तब निराशा नहीं बल्कि गहरी श्रद्धा और समर्पण साधक का मार्ग बन सकते हैं।
जून: परमा और निर्जला एकादशी
परमा एकादशी — 11 जून
परमा एकादशी अधिक अथवा पुरुषोत्तम मास से जुड़ी दूसरी विशेष एकादशी है। परमा का अर्थ है—श्रेष्ठतम अथवा परम।
कथा में सुमेधा नामक निर्धन ब्राह्मण और उनकी धर्मपत्नी पवित्रा का वर्णन आता है। अत्यन्त अभाव के बीच भी दोनों ने धर्म, अतिथि-सत्कार और ईश्वर-भक्ति को नहीं छोड़ा।
एक दिन ऋषि कौण्डिन्य उनके घर आए। घर में बहुत कम होने के बावजूद दम्पति ने श्रद्धा से उनका स्वागत किया। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर ऋषि ने उन्हें परमा एकादशी का व्रत बताया।
दोनों ने श्रद्धापूर्वक व्रत किया और धीरे-धीरे उनके जीवन की कठिनाइयाँ कम हुईं।
इस कथा का सार केवल धन-प्राप्ति नहीं है। इसका वास्तविक संदेश यह है कि कठिन परिस्थितियाँ भी ईश्वर पर विश्वास, विनम्रता और धर्म को त्यागने का कारण न बनें।
निर्जला एकादशी — 25 जून
निर्जला एकादशी वर्ष की सर्वाधिक प्रसिद्ध एकादशियों में से एक है। निर्जला अर्थात जल के बिना।
इसकी कथा पाण्डव भीम से जुड़ी है। अत्यन्त बलवान भीम की भूख भी प्रबल थी और वे नियमित एकादशी उपवास कठिन पाते थे। फिर भी वे एकादशी के पुण्य से वंचित नहीं होना चाहते थे।
उन्होंने महर्षि व्यास से उपाय पूछा। व्यासजी ने उन्हें ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी पर कठोर निर्जला व्रत करने का उपदेश दिया।
भीम ने श्रद्धा से यह व्रत किया। तभी से यह एकादशी भीमसेनी अथवा पाण्डव निर्जला एकादशी के नाम से भी प्रसिद्ध हुई।
इस कथा का एक अत्यन्त मानवीय पक्ष है—भीम अपनी सीमा छिपाते नहीं, बल्कि स्वीकार करते हैं। आध्यात्मिकता दिखावे में नहीं, बल्कि अपनी क्षमता को जानकर ईमानदारी से साधना करने में है।
जुलाई: योगिनी और देवशयनी एकादशी
योगिनी एकादशी — 10 जुलाई
योगिनी एकादशी की प्रसिद्ध कथा पद्म पुराण में मिलती है।
हेममाली कुबेर के सेवक थे और भगवान शिव की पूजा के लिए पुष्प लाने का कार्य करते थे। एक दिन पत्नी के मोह में वे अपने कर्तव्य से चूक गए और समय पर पुष्प नहीं पहुँचा सके।
कुबेर ने क्रोधित होकर उन्हें शाप दे दिया। हेममाली रोग और दुःख से घिर गए तथा अपने पूर्व जीवन से वंचित हो गए।
भटकते हुए उनकी भेंट ऋषि मार्कण्डेय से हुई। ऋषि ने उनकी कथा सुनकर योगिनी एकादशी का व्रत करने की सलाह दी।
व्रत के पुण्य और उनकी सच्ची श्रद्धा से उनका दुःख दूर हुआ और उन्हें पुनः सम्मानजनक जीवन प्राप्त हुआ।
योगिनी एकादशी हमें यह समझाती है कि प्रेम और परिवार दोष नहीं हैं, किन्तु ऐसा आसक्ति भाव जो हमें कर्तव्य और धर्म से दूर कर दे, जीवन में असन्तुलन ला सकता है।
देवशयनी एकादशी — 25 जुलाई
देवशयनी एकादशी को आषाढ़ी एकादशी और हरिशयनी एकादशी भी कहा जाता है। हिन्दू धर्म में इसका अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है।
परम्परा के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग पर योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं। इसी के साथ चातुर्मास आरम्भ होता है।
चातुर्मास संयम, अतिरिक्त पूजा, साधना और आत्मनिग्रह का समय माना जाता है। अनेक परम्पराओं में इस अवधि में विवाह और कुछ बड़े मांगलिक कार्य स्थगित रखे जाते हैं।
एक प्रचलित कथा राजा मान्धाता से भी जुड़ी है, जिनके राज्य में भयंकर अकाल पड़ा। ऋषि अंगिरा के मार्गदर्शन और धर्ममय साधना के फलस्वरूप राज्य में पुनः संतुलन और सुख लौट आया।
देवशयनी एकादशी बाहरी गति से कुछ समय के लिए भीतर लौटने का निमन्त्रण देती है। भगवान की योगनिद्रा के साथ भक्त भी स्वयं के जीवन को सरल और अधिक ईश्वर-केंद्रित बनाने का संकल्प ले सकता है।
अगस्त: कामिका और श्रावण पुत्रदा एकादशी
कामिका एकादशी — 9 अगस्त
इस दिन तुलसी से भगवान विष्णु की पूजा, जप, दान, संयम और भगवान के नाम का स्मरण विशेष महत्व रखते हैं।
एक प्रचलित व्रत-कथा में ऐसे व्यक्ति का वर्णन मिलता है जिसने क्रोध में एक ब्राह्मण की हत्या कर दी। अपने कर्म पर गहरे पश्चात्ताप से भरकर उसने शुद्धि का उपाय खोजा और उसे कामिका एकादशी का व्रत तथा भगवान विष्णु की आराधना करने का निर्देश मिला।
यह कथा अपराध की गंभीरता को कम नहीं करती, बल्कि पश्चात्ताप की आवश्यकता पर बल देती है।
कामिका एकादशी हमें याद दिलाती है कि क्रोध कुछ क्षणों में वह नष्ट कर सकता है जिसे बनाने में वर्षों लगते हैं। इसलिए सच्चा व्रत केवल भोजन छोड़ना नहीं, बल्कि मन के अशुद्ध आवेगों पर भी संयम रखना है।
श्रावण पुत्रदा एकादशी — 23 अगस्त
पुत्रदा का अर्थ है—सन्तान प्रदान करने वाली। श्रावण पुत्रदा एकादशी परम्परागत रूप से सन्तान-सुख और परिवार की मंगलकामना से जुड़ी है।
इसकी कथा महिष्मती के राजा महीजित से जुड़ी है। वे योग्य और धर्मपरायण राजा थे, किन्तु उनकी कोई सन्तान नहीं थी। राजा की चिन्ता देखकर प्रजा और विद्वान जन समाधान की खोज में ऋषियों के पास गए।
उन्हें श्रावण शुक्ल पक्ष की एकादशी के व्रत का विधान बताया गया। व्रत का पुण्य राजा को समर्पित किया गया और समय आने पर उन्हें सन्तान का आशीर्वाद प्राप्त हुआ।
आज अनेक परिवार इस दिन केवल सन्तान-प्राप्ति ही नहीं, बल्कि बच्चों के स्वास्थ्य, सद्बुद्धि, चरित्र, शिक्षा और आध्यात्मिक उन्नति के लिए भी प्रार्थना करते हैं।
2026 में इसकी मुख्य स्मार्त तिथि 23 अगस्त है। वैष्णव परम्पराओं में तिथि-नियम के अनुसार दिन भिन्न हो सकता है।
सितम्बर: अजा और पार्श्व एकादशी
अजा एकादशी — 7 सितम्बर
अजा एकादशी सत्य और धर्म की परीक्षा से जुड़ी अत्यन्त प्रेरक कथा लेकर आती है।
राजा हरिश्चन्द्र सत्य के प्रति अपनी अटूट निष्ठा के लिए प्रसिद्ध हैं। उन्होंने राज्य, धन, परिवार—सब कुछ खो दिया, किन्तु सत्य से समझौता नहीं किया। अन्ततः उन्हें श्मशान में सेवा तक करनी पड़ी।
पद्म पुराण के अनुसार, इसी कठिन समय में ऋषि गौतम ने उन्हें अजा एकादशी का व्रत करने का उपदेश दिया।
राजा ने श्रद्धा से व्रत किया। उसके पुण्य से उनकी विपत्तियाँ समाप्त हुईं, परिवार पुनः मिला और राज्य भी लौट आया।
अजा एकादशी का संदेश स्पष्ट है—धर्म का मार्ग तत्काल सरल न दिखे, फिर भी सत्य और ईश्वर पर विश्वास व्यर्थ नहीं जाता।
पार्श्व एकादशी — 22 सितम्बर
पार्श्व एकादशी को परिवर्तिनी और वामन एकादशी भी कहा जाता है। यह भाद्रपद शुक्ल पक्ष में चातुर्मास के दौरान आती है।
परम्परा के अनुसार इस दिन योगनिद्रा में स्थित भगवान विष्णु करवट बदलते हैं। इसी कारण इसका नाम पार्श्व अथवा परिवर्तिनी एकादशी पड़ा।
यह दिन भगवान वामन और राजा बलि की कथा से भी जुड़ा है। भगवान वामन ने राजा बलि से तीन पग भूमि माँगी। विराट रूप धारण कर उन्होंने दो पग में समस्त लोक नाप लिए, और तीसरे पग के लिए राजा बलि ने अपना सिर अर्पित कर दिया।
इस कथा का सार पूर्ण समर्पण है। सच्चा दान केवल वस्तु देने में नहीं, स्वयं को ईश्वर के हाथों सौंप देने में है।
चातुर्मास के मध्य आने वाली यह एकादशी साधक को अपने पुराने संकल्पों को फिर से मजबूत करने का अवसर देती है।
अक्टूबर: इन्दिरा और पापांकुशा एकादशी
इन्दिरा एकादशी — 6 अक्टूबर
इन्दिरा एकादशी पूर्वजों के स्मरण से जुड़ी पवित्र एकादशी है और प्रायः पितृपक्ष के आसपास पड़ती है।
पद्म पुराण में महिष्मती के राजा इन्द्रसेन की कथा मिलती है। एक दिन नारद मुनि उनके दरबार में आए और उन्होंने बताया कि राजा के दिवंगत पिता यमलोक में रुके हुए हैं। उनके जीवन में किसी व्रत से जुड़ी त्रुटि के कारण वे अपनी इच्छित दिव्य गति को प्राप्त नहीं कर पाए थे।
नारदजी ने राजा को इन्दिरा एकादशी का व्रत करने और उसका पुण्य अपने पिता को समर्पित करने का निर्देश दिया।
राजा ने श्रद्धा से ऐसा किया। व्रत के पुण्य से उनके पिता उस अवस्था से मुक्त होकर भगवान विष्णु के दिव्य लोक की ओर अग्रसर हुए।
इन्दिरा एकादशी हमें यह भाव देती है कि प्रार्थना केवल अपने लिए नहीं होती। हम उन पूर्वजों के लिए भी श्रद्धा, स्मरण और पुण्य अर्पित कर सकते हैं जिनसे हमें जीवन और संस्कार मिले।
पापांकुशा एकादशी — 22 अक्टूबर
आश्विन शुक्ल पक्ष की पापांकुशा एकादशी का नाम अत्यन्त प्रतीकात्मक है। पाप अर्थात अधर्म अथवा दोष और अंकुश अर्थात नियंत्रित करने वाला उपकरण।
पद्म पुराण में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं युधिष्ठिर को इस एकादशी की महिमा बताते हैं।
इस एकादशी का वर्णन किसी एक पात्र की कथा से अधिक व्रत, भगवान विष्णु की पूजा, दान, संयम और स्मरण के पुण्य के रूप में किया गया है।
इसका आध्यात्मिक अर्थ है कि मन को भी दिशा चाहिए। शक्ति यदि अनियन्त्रित हो जाए तो विनाशकारी हो सकती है; उसी प्रकार कामना, क्रोध और अहंकार को भी धर्म का अंकुश चाहिए।
पापांकुशा एकादशी मन को बार-बार भगवान की ओर लौटाने का दिन है।
नवम्बर: रमा और देवउठनी एकादशी
रमा एकादशी — 5 नवम्बर
कार्तिक कृष्ण पक्ष की रमा एकादशी का नाम माता लक्ष्मी के रमा स्वरूप से जुड़ा है।
इसकी कथा राजा मुचुकुन्द की पुत्री चन्द्रभागा और उसके पति शोभन से सम्बन्धित है। चन्द्रभागा ऐसे परिवार में पली थी जहाँ एकादशी का व्रत अत्यन्त श्रद्धा से किया जाता था। शोभन का शरीर दुर्बल था और कठोर उपवास उसके लिए कठिन था।
फिर भी उसने रमा एकादशी का व्रत करने का निश्चय किया। उसका शरीर कठोरता सह नहीं पाया और व्रत के दौरान उसकी मृत्यु हो गई।
एकादशी के पुण्य से उसे दिव्य लोक में अत्यन्त सुन्दर राज्य प्राप्त हुआ, किन्तु वह राज्य स्थायी नहीं था। चन्द्रभागा को जब यह ज्ञात हुआ तो वर्षों से किए अपने व्रतों और साधना का पुण्य उसने अपने पति से जोड़ा।
उसकी दृढ़ भक्ति से शोभन का दिव्य राज्य स्थिर हो गया और दोनों का पुनर्मिलन हुआ।
रमा एकादशी की कथा यह सिखाती है कि वर्षों की साधना केवल साधक को ही नहीं, उसके प्रियजनों को भी शक्ति दे सकती है।
देवउठनी एकादशी — 20 नवम्बर
देवउठनी एकादशी देवशयनी एकादशी का आनन्दमय उत्तरार्द्ध है। इसे प्रबोधिनी और देवोत्थान एकादशी भी कहा जाता है।
परम्परा के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु चार माह की योगनिद्रा से जागते हैं और चातुर्मास समाप्त होता है।
भारत के अनेक भागों में इसके बाद विवाह और अन्य मांगलिक कार्य पुनः आरम्भ होते हैं।
इसी समय तुलसी विवाह की परम्परा भी विशेष रूप से निभाई जाती है, जिसमें तुलसी माता का विवाह भगवान विष्णु के शालिग्राम स्वरूप से सम्पन्न किया जाता है। क्षेत्रीय पंचांग के अनुसार तुलसी विवाह देवउठनी एकादशी अथवा उसके आसपास की तिथि पर मनाया जा सकता है।
केरल में गुरुवायूर एकादशी का विशेष महत्व है और गुरुवायूर श्रीकृष्ण मन्दिर में यह महान उत्सव के रूप में मनाई जाती है। 2026 में वैष्णव अथवा क्षेत्रीय गणना के कारण इसकी तिथि मुख्य स्मार्त एकादशी से अलग हो सकती है।
देवउठनी एकादशी जागरण का प्रतीक है—केवल भगवान के जागने का नहीं, बल्कि भक्त के भीतर नई आध्यात्मिक चेतना के जागने का भी।
दिसम्बर: उत्पन्ना और मोक्षदा एकादशी
उत्पन्ना एकादशी — 4 दिसम्बर
उत्पन्ना एकादशी को एकादशी देवी के दिव्य प्राकट्य से जोड़ा जाता है।
पद्म पुराण में मुर नामक शक्तिशाली असुर की कथा आती है। वह देवताओं और धर्म के लिए बड़ा संकट बन गया था। भगवान विष्णु ने उससे दीर्घ युद्ध किया और फिर विश्राम के लिए एक स्थान पर चले गए।
जब मुर ने विश्रामरत भगवान पर आक्रमण करना चाहा, तभी भगवान विष्णु की दिव्य शक्ति से एक तेजस्वी देवी प्रकट हुईं और उन्होंने मुर का वध कर दिया।
भगवान विष्णु देवी के पराक्रम से प्रसन्न हुए और उस तिथि के कारण उन्हें एकादशी नाम प्रदान किया।
उन्होंने वर दिया कि जो भक्त श्रद्धा, उपवास और भक्ति से एकादशी का पालन करेंगे, वे आध्यात्मिक शुद्धि और ईश्वर-कृपा प्राप्त करेंगे।
उत्पन्ना का अर्थ है—प्रकट हुई अथवा जन्मी। इसलिए इस एकादशी को एकादशी परम्परा के पवित्र प्राकट्य दिवस के रूप में भी देखा जाता है।
मोक्षदा / वैकुण्ठ एकादशी — 20 दिसम्बर
मोक्षदा का अर्थ है—मोक्ष प्रदान करने वाली। मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की यह एकादशी गीता जयन्ती से भी जुड़ी है, क्योंकि परम्परा में इसी पावन दिन भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कुरुक्षेत्र में अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश दिया जाना स्मरण किया जाता है।
मोक्षदा एकादशी की पुराण-प्रचलित कथा राजा वैखानस से जुड़ी है। राजा ने स्वप्न में अपने दिवंगत पिता को दुःख भोगते देखा। पिता की मुक्ति की इच्छा से वे ऋषियों और विद्वानों के पास गए।
उन्हें मोक्षदा एकादशी का व्रत कर उसका पुण्य पिता को समर्पित करने का निर्देश मिला।
राजा ने श्रद्धा से व्रत किया। व्रत के पुण्यफल से उनके पिता दुःख से मुक्त होकर उच्च दिव्य गति को प्राप्त हुए।
मोक्षदा एकादशी वैकुण्ठ एकादशी के पावन अवसर से भी जुड़ती है, जिसका विशेष महत्व दक्षिण भारत की अनेक वैष्णव परम्पराओं में है।
तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक और केरल के अनेक भगवान विष्णु मन्दिरों में वैकुण्ठ एकादशी विशेष श्रद्धा से मनाई जाती है। कई मन्दिरों में प्रतीकात्मक वैकुण्ठ द्वार खोला जाता है, जिसके माध्यम से भक्त भगवान के दिव्य धाम में प्रवेश की भावना के साथ दर्शन करते हैं।
वर्ष की अन्तिम एकादशी इस सम्पूर्ण चक्र को उसकी सर्वोच्च आध्यात्मिक आकांक्षा पर समाप्त करती है—केवल सुख, स्वास्थ्य या सांसारिक सफलता नहीं, बल्कि मोक्ष और ईश्वर के निकट पहुँचने की कामना।
एकादशी व्रत कैसे करें: कुछ सामान्य बातें
भारत भर में एकादशी का पालन एक ही प्रकार से नहीं किया जाता। परिवार, क्षेत्र, स्वास्थ्य, आयु और सम्प्रदाय के अनुसार नियमों में अन्तर हो सकता है। फिर भी कुछ सामान्य सिद्धान्त व्यापक रूप से प्रचलित हैं:
- एकादशी से एक दिन पहले: अनेक भक्त हल्का सात्त्विक भोजन लेते हैं और भारी भोजन कम कर देते हैं। कुछ परम्पराएँ पिछली संध्या से ही अन्न का त्याग कर देती हैं।
- एकादशी के दिन: सामान्यतः अन्न और अनेक प्रकार की दालों से परहेज़ किया जाता है। परम्परा के अनुसार फल, दूध, दही, मेवे, साबूदाना, सिंघाड़े का आटा, कुट्टू, राजगीरा, सेंधा नमक और कुछ कन्द-मूल लिए जा सकते हैं।
- व्रत का वास्तविक केन्द्र: एकादशी केवल भोजन बदलने का नाम नहीं है। जप, भजन, भगवान विष्णु का स्मरण, विष्णु सहस्रनाम, पवित्र ग्रन्थों का पाठ, दान, मन्दिर दर्शन और आत्मचिन्तन इस साधना का हृदय हैं।
- उपवास के विभिन्न स्तर: कोई केवल जल ग्रहण करता है, कोई फलाहार, कोई एक समय व्रत का भोजन और कोई निर्जला उपवास करता है।
- पारण: एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि में निर्धारित समय पर किया जाता है। सही समय सूर्योदय, द्वादशी तिथि और हरिवासर की स्थिति पर निर्भर करता है। इसलिए स्थानीय पंचांग देखना उचित है।
- निर्जला व्रत: निर्जला एकादशी विशेष रूप से जलरहित उपवास से जुड़ी है। यह शरीर के लिए अत्यन्त कठोर हो सकता है। वृद्धजन, गर्भवती महिलाएँ, बच्चे, औषधि लेने वाले लोग और किसी स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहे व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार सरल व्रत करें। शरीर को हानि पहुँचाना श्रद्धा का प्रमाण नहीं है।
इन पावन तिथियों में कथाएँ बदलती रहती हैं, किन्तु उनका आध्यात्मिक सूत्र एक ही है।
कहीं राजा दुःख में धैर्य सीखता है। कहीं पत्नी अपने व्रत का पुण्य पति के लिए समर्पित करती है। कहीं पथभ्रष्ट व्यक्ति को लौटने का अवसर मिलता है। कहीं अपनी शारीरिक सीमा से जूझता भक्त ऐसा साधना-पथ पाता है जिसे वह पूरे मन से निभा सके। कहीं पुत्र पिता के लिएप्रार्थना करता है। कहीं परिवार आशीर्वाद माँगता है। और कहीं सत्य के लिए सब कुछ त्याग देने वाला राजा अन्ततः धर्म की विजय देखता है।
कथाएँ अलग हैं, पर उनका मूल भाव एक है—ईश्वर के सामने सच्चा प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता।
एकादशी साधारण जीवन की गति को एक दिन के लिए रोककर भीतर झाँकने का अवसर देती है। भूख स्मरण बन सकती है। संयम प्रार्थना बन सकता है। दान पूजा बन सकता है। मौन मन को स्पष्ट सुनने का माध्यम बन सकता है। शरीर थोड़ा कम ग्रहण करता है, ताकि हृदय थोड़ा अधिक स्मरण कर सके।
कोई मन्दिर में दिन बिताएगा, कोई घर पर पूजा करेगा। कोई कथा सुनेगा, कोई भगवान विष्णु के नाम का जप करेगा, और कोई संकल्प लेगा कि उस दिन अधिक सत्य, करुणा और ईश्वर-स्मरण के साथ जीवन जिए।
एकादशी अन्ततः श्रद्धा, अनुशासन, विनम्रता और स्मरण माँगती है।
हर पखवाड़े जीवन की सामान्य गति के बीच आने वाला यह पवित्र विराम बदलते चन्द्र के नीचे भक्त का भगवान विष्णु पर विश्वास है—और यह स्मरण कराता है कि ईश्वर की ओर लौटने की प्रत्येक यात्रा एक सच्चे कदम से ही आरम्भ होती है।

