नित्य प्रार्थना
प्राचीन काल में विदर्भ देश में सत्यरथ नामक धर्मपरायण, धीर और सत्यप्रतिज्ञ राजा राज्य करते थे। एक समय शाल्व देश के राजाओं ने विदर्भ पर आक्रमण कर दिया। भयंकर युद्ध हुआ और राजा सत्यरथ युद्धभूमि में मारे गए। उनकी गर्भवती रानी रात्रि में राजमहल से निकलकर वन की ओर चली गईं। दूर एक सरोवर के किनारे उन्होंने पुत्र को जन्म दिया, किन्तु जल पीने के लिए सरोवर में उतरते ही एक ग्राह ने उन्हें अपना ग्रास बना लिया। नवजात राजकुमार माता-पिता से विहीन होकर तट पर रोता रह गया।
उसी समय उमा नाम की एक निर्धन विधवा ब्राह्मणी वहाँ पहुँची। वह अपने छोटे पुत्र को भिक्षा के अन्न से पालती थी। उसने अनाथ शिशु को देखा, पर उसके कुल का ज्ञान न होने से संकोच में पड़ गई। तभी एक संन्यासी महात्मा वहाँ आए, जो मानो साक्षात् शंकर के समान प्रतीत होते थे। उन्होंने उमा से कहा कि वह संशय छोड़कर बालक का पालन करे; इससे उसका कल्याण होगा। उमा राजकुमार को घर ले आई और अपने पुत्र के समान उसका पालन करने लगी।
समय बीता। एक दिन उमा दोनों बालकों को लेकर एक देवमन्दिर पहुँची, जहाँ शाण्डिल्य मुनि ने राजकुमार को पहचान लिया। उन्होंने बताया कि यह विदर्भराज सत्यरथ का पुत्र है। उमा ने पूछा—धर्मात्मा राजा का ऐसा अन्त क्यों हुआ और राजपुत्र दरिद्र क्यों है?
शाण्डिल्य ने कहा कि पूर्वजन्म में सत्यरथ पाण्ड्यदेश के राजा थे। एक प्रदोषकाल में वे शिवपूजन कर रहे थे, पर नगर में कोलाहल सुनकर पूजा बीच में छोड़ दी। क्रोध में एक शत्रु का वध कराया और पूजा पूर्ण किए बिना भोजन कर लिया। उनके पुत्र ने भी प्रदोष में शिवपूजन किए बिना भोजन किया। इसी कर्मफल से अगले जन्म में राजा शत्रुओं के हाथ मारे गए और पुत्र दरिद्र हुआ।
तब शाण्डिल्य ने दोनों बालकों को प्रत्येक प्रदोष में भगवान शिव की आराधना करने का उपदेश दिया। उमा ने बताया कि उसके पुत्र का नाम शुचित्रत और राजकुमार का नाम धर्मगुप्त है। मुनि के निर्देश पर दोनों नियमित प्रदोष-पूजा करने लगे।
चार महीने बाद शुचित्रत को नदी के तट पर धन से भरा एक कलश मिला। उमा ने उसे दोनों भाइयों में बाँटने को कहा, किन्तु धर्मगुप्त ने कहा—यह शुचित्रत के पुण्य से मिला है; भगवान शंकर मुझ पर भी अपनी कृपा करेंगे।
एक वर्ष की आराधना के बाद धर्मगुप्त वन में अंशुमती नाम की गन्धर्वकन्या से मिला।
एक दिन धर्मगुप्त ब्राह्मणकुमार शुचित्रत के साथ वन में भ्रमण के लिए निकला। कुछ दूर जाने पर दोनों ने अनेक गन्धर्वकन्याओं को वन में क्रीड़ा करते देखा। शुचित्रत ने वहीं ठहरना उचित समझा, किन्तु धर्मगुप्त अकेला आगे बढ़ गया। उन गन्धर्वकन्याओं में एक अत्यन्त सुन्दरी कन्या ने राजकुमार को आते देखा। उसने अपनी सखियों को निकट के वन से पुष्प चुन लाने के लिए भेज दिया और स्वयं वहीं रुक गई।
तब राजकुमार ने उस कन्या का परिचय पूछा। उसने बताया कि गन्धर्वों में अग्रणी द्रविक उसके पिता हैं और उसका नाम अंशुमती है। अंशुमती के हृदय में धर्मगुप्त के प्रति अनुराग उत्पन्न हो चुका था। उसने अपने गले से मोतियों का हार उतारकर राजकुमार को अर्पित किया और अपने मन का भाव भी प्रकट किया। किन्तु धर्मगुप्त ने यहाँ भी मर्यादा का त्याग नहीं किया। उसने स्वयं को राज्यहीन और निर्धन बताते हुए अंशुमती से कहा कि वह अपने पिता की आज्ञा के अधीन है; अतः पिता की अनुमति के बिना ऐसा निर्णय करना उचित नहीं होगा। अंशुमती ने उसकी बात स्वीकार की और उसे परसों प्रातःकाल पुनः उसी स्थान पर आने के लिए कहा।
निर्धारित समय आने पर धर्मगुप्त पुनः शुचित्रत को साथ लेकर वन में पहुँचा। किन्तु इस बार दृश्य भिन्न था। वहाँ केवल अंशुमती नहीं थी; उसके पिता गन्धर्वराज द्रविक भी उपस्थित थे। उन्होंने दोनों कुमारों का आदरपूर्वक स्वागत किया, उन्हें सुन्दर आसन पर बैठाया और फिर धर्मगुप्त से ऐसी बात कही जिसने उसके जीवन की दिशा ही बदल दी।
गन्धर्वराज द्रविक ने बताया कि वे कैलास गए थे, जहाँ भगवान शिव ने स्वयं उन्हें धर्मगुप्त की सहायता करने की आज्ञा दी थी, क्योंकि वह गुरु की आज्ञा से निरन्तर शिव की आराधना कर रहा था।
द्रविक ने अंशुमती का विवाह धर्मगुप्त से किया और उसे सेना, धन, रथ, हाथी, घोड़े तथा अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए। धर्मगुप्त ने शत्रुओं को परास्त कर विदर्भ पुनः प्राप्त किया। ब्राह्मणों और मन्त्रियों ने उसका राज्याभिषेक किया। जिसने उसे पाला था, वही उमा उसकी माता बनी रही; शुचित्रत उसका भाई और अंशुमती महारानी बनी।
इस प्रकार स्कन्दपुराण की प्रदोष कथा भक्ति, गुरु-वचन, धैर्य और धर्मनिष्ठा का संदेश देती है। ग्रन्थ के अनुसार प्रदोष के दिन शिवपूजन के पश्चात् इस माहात्म्य को श्रद्धापूर्वक सुनना और पढ़ना पुण्यदायक माना गया है।
ॐ नमः शिवाय। हर हर महादेव।
(पाठ-सन्दर्भ और प्रामाणिकता – स्कन्द पुराण, ब्रह्मखंड – ब्रह्मोत्तरखण्ड)

