वाल्मीकि रामायण के आदित्य हृदय स्तोत्र में सूर्यदेव को “हरिदश्वः” कहा गया है। सामान्य अनुवाद में इसका अर्थ “हरे घोड़ों वाले” किया जाता है, पर “हरित्” को केवल आधुनिक green colour तक सीमित करके समझना पर्याप्त नहीं है। संस्कृत में हरि/हरित का अर्थ हरापन लिये, पीताभ, सुनहला, तेजस्वी और जीवनदायी रंग-भाव से भी जुड़ता है। इसलिए “हरिदश्व” का तात्पर्य केवल रंग-वर्णन नहीं, बल्कि सूर्यदेव की प्रकाशमान और जीवन-पोषक किरण-शक्ति से भी है।
भावार्थ की दृष्टि से हरित उस शक्ति का संकेत माना जा सकता है जो अन्धकार का हरण करती है, सीलन और जड़ता को दूर करती है, जल-चक्र को गति देती है और पृथ्वी पर जीवन को जाग्रत करती है। सूर्यदेव स्वयं हरे दिखाई नहीं देते, पर उन्हीं की किरणों से वनस्पतियाँ हरी-भरी होती हैं, अन्न और औषधियाँ पनपती हैं और प्राण-चक्र चलता है। आधुनिक विज्ञान की भाषा में photosynthesis इसी जीवनदायी सूर्य-प्रभाव का एक स्पष्ट उदाहरण है।
इसीलिए चित्रों में सफेद घोड़े दिखना भी गलत नहीं है। सफेद घोड़े सूर्य-प्रकाश की शुद्धता, तेज और समग्रता का प्रतीक हैं। वहीं “हरित” अश्व सूर्य-किरणों की जीवनदायी, हरियाली उत्पन्न करने वाली और ऊर्जा भरने वाली शक्ति का संकेत हैं। इस तरह सफेद और हरित—दोनों परम्पराएँ विरोधी नहीं, बल्कि सूर्यदेव के दो प्रतीकात्मक आयाम हैं: प्रकाश की शुद्धता और जीवन की हरियाली।
आदित्य हृदय स्तोत्र में पद आता है:
हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान्
यहाँ हरिदश्वः = हरित्/हरिद् वर्ण के अश्वों वाला माना जाता है। संस्कृत कोशों में हरिदश्व का अर्थ सूर्य भी दिया गया है, और इसका व्युत्पत्तिगत अर्थ “हरित् + अश्व” अर्थात् हरित अश्वों वाला बताया गया है।
संस्कृत में हरि/हरित का रंग-क्षेत्र व्यापक है,
पीताभ, हरित, सुनहरा, हरापन लिये, उज्ज्वल, कभी-कभी reddish/bay आदि अर्थ-छायाएँ भी मिलती हैं।
Monier-Williams पर आधारित Sanskrit dictionaries में hari के लिए pale yellow, reddish, bay, emerald आदि अर्थ मिलते हैं; haritaमें yellowish/हरित भाव भी आता है।
संस्कृत में हरि / हरित / हरिद् शब्द का अर्थ हमेशा आज के “हरा रंग” जैसा पक्का green नहीं होता।
इसका अर्थ सन्दर्भ के अनुसार हो सकता है:
हरित, पीताभ, सुनहरा, हरापन लिए हुए
तेजस्वी, चमकीला, प्रकाशमान
हरा-पीला या सुनहला-हरा वर्ण
जीवनदायी, वनस्पति-जैसी ऊर्जा से जुड़ा रंग
इसलिए “हरे घोड़े” का भाव प्रकाशमान, जीवनदायी, सुनहरे-हरित तेज से युक्त अश्व है।
इसलिए सूर्यदेव के घोड़ों को “हरित” कहना केवल यह नहीं बताता कि वे चित्रों में पत्ते जैसे हरे रंग के ही हों। इसका अर्थ अधिक व्यापक है—तेजस्वी, पीत-हरित, जीवनदायी, प्रकाश से भरे हुए अश्व।
“हरति इति हरित्” – भावार्थ की दृष्टि से “हरित्” को उस सूर्य-शक्ति से भी जोड़ा जाता है जो अन्धकार, जड़ता, सीलन और रोगकारक वातावरण का हरण करती है।
सूर्यदेव अपने प्रकाश और उष्मा से तम को दूर करते हैं, जल-चक्र को गति देते हैं और जीवन में ऊर्जा भरते हैं। इसलिए “हरिदश्व” को सूर्य-किरणों की जीवन-जाग्रत करने वाली शक्ति का संकेत माना जा सकता है।
सूर्य की किरणें वनस्पतियों के जीवन का आधार हैं – और पृथ्वी पर जीवन की सृष्टि का आधार हैं। इसलिए हरित अश्व को सूर्य की उन किरणों का प्रतीक माना जाना चाहिए जो पृथ्वी पर हरियाली, अन्न, औषधि और प्राण-चक्र को सम्भव बनाती हैं।
यहाँ शास्त्रीय प्रतीक और आधुनिक वैज्ञानिक समझ में सुंदर संवाद दिखाई देता है।
सफेद और हरित का समन्वय – इसे हम विज्ञान के एक साधारण प्रयोग से समझ सकते हैं: जब सूर्य का श्वेत प्रकाश (White Light) किसी प्रिज़्म (Prism) से होकर गुज़रता है, तो वह सात रंगों में बंट जाता है। उन सात रंगों में जो ‘हरा रंग’ (Green) होता है, वह स्पेक्ट्रम के बिल्कुल बीच में स्थित होता है। वह संतुलन का केंद्र है। वैदिक दृष्टिकोण से, सूर्य के घोड़े ‘श्वेत’ हैं अपनी मूल अवस्था में, लेकिन जब वे कार्य करते हैं, तो वे ‘हरित्’ (जीवनदायी और ऊर्जावान) हो जाते हैं।
सफेद घोड़े दिखाने की परम्परा भी असंगत नहीं है। सूर्यदेव का रथ अक्सर प्रकाश, शुद्धता, सात किरणों, सात छन्दों या सात रंगों का प्रतीक माना जाता है। सफेद रंग में एक प्रतीकात्मक सुविधा है—वह प्रकाश, तेज, शुद्धता और सूर्य-किरणों के समग्र प्रभाव को दिखाता है।
वैज्ञानिक भाषा में कहें तो सूर्य का प्रकाश हमें श्वेत या स्वर्णिम लगता है, और उसमें रंगों का पूर्ण विस्तार छिपा रहता है। इसलिए सफेद घोड़ों को सूर्य-प्रकाश की निर्मलता का दृश्य प्रतीक बनाया जाता है। यह शास्त्रीय शब्द “हरिदश्व” का विरोध नहीं, बल्कि उसका एक कलात्मक रूपान्तरण है।
“हरिदश्व” का गहरा तात्पर्य
आदित्य हृदय स्तोत्र युद्धभूमि में भगवान राम को ऋषि अगस्त्य द्वारा दिया गया स्तोत्र है। इसमें सूर्यदेव को केवल एक ग्रह या आकाशीय पिण्ड नहीं, बल्कि जीवन, प्रकाश, विजय, धर्म और चेतना के दिव्य स्रोत के रूप में वंदित किया गया है। “हरिदश्व” इसी भाव में समझना चाहिए।
तात्पर्य है:
सूर्यदेव के अश्व वे शक्तियाँ हैं जो प्रकाश को संसार में ले जाती हैं। उनका “हरित” स्वरूप जीवन-शक्ति, वृद्धि, वनस्पति, ऊर्जा और जागरण का संकेत है। सूर्य की किरणें पृथ्वी को केवल रोशन नहीं करतीं; वे अन्न, औषधि, वनस्पति, ऋतु, जीवन-चक्र और प्राण-शक्ति को भी पोषित करती हैं। इसलिए “हरे” अश्व सूर्य की life-giving energy के प्रतीक हैं।
सात घोड़े और रंगों का सम्बन्ध
सूर्यदेव के सात घोड़े कई अर्थों में समझे जाते हैं:
| प्रतीक | अर्थ |
| सात घोड़े | सूर्य की सात किरणें / सात रंग / सात छन्द / सात लोकों का संकेत |
| हरित अश्व | जीवनदायी, तेजस्वी, प्रकृति-पोषक सूर्य-ऊर्जा |
| सफेद अश्व | प्रकाश की समग्रता, शुद्धता और सूर्य-तेज |
| रथ | कालचक्र, दिन-रात, ऋतु और कर्म-गति |
| अरुण सारथी | उषा, प्रभात, सूर्य के आगमन की लालिमा |
इसलिए हरे और सफेद—दोनों प्रतीकात्मक हैं।
“हरित” शास्त्रीय संकेत है। “सफेद” लोक-चित्रण और प्रकाश-प्रतीक का दृश्य रूप है।
आदित्य हृदय स्तोत्र में “हरे घोड़े” का अर्थ केवल रंग-वर्णन नहीं, बल्कि सूर्यदेव की जीवनदायी, तेजस्वी, प्रकृति-पोषक और चेतना-जाग्रत करने वाली शक्तियों का संकेत है।
सफेद घोड़े का प्रयोग
सूर्य का प्रकाश शुद्ध, उज्ज्वल और समग्र तेज के रूप में दिखाया जाता है।
पर शास्त्रीय शब्द “हरिदश्व” हमें याद दिलाता है कि सूर्य केवल रोशनी नहीं देते—वे जीवन को हरा-भरा भी करते हैं।

