मथुरा के कारागार में श्रीकृष्ण का जन्म अजन्मा परमात्मा का दिव्य प्राकट्य था। श्रीमद्भागवत, विष्णुपुराण और भगवद्गीता के प्रमाणों पर आधारित विस्तृत कृष्ण जन्म कथा।
मथुरा सोई नहीं थी; वह भय के अधीन मौन थी। नगर के राजसिंहासन पर कंस बैठा था, किन्तु उसका शासन केवल राजप्रासाद तक सीमित नहीं था। उसकी आशंका ने एक बहन की गोद उजाड़ दी थी, एक पिता के हाथों को शृंखलाओं में बाँध दिया था और धर्म की आवाज को कारागार की दीवारों में रोक रखा था।
उसी मथुरा में, उसी कारागार में, उसी मध्यरात्रि में श्रीकृष्ण जन्म का वह क्षण आया जो भागवत-परम्परा में और मानवता के इतिहास में सामान्य शिशु-जन्म नहीं, अजन्मा परमात्मा का स्वेच्छापूर्वक प्राकट्य है।
यह केवल देवकी के आठवें पुत्र का जन्म नहीं था। यह भय के भीतर अभय, अन्याय के मध्य धर्म और अन्धकार के गर्भ में प्रकाश का अवतरण था।
श्रीकृष्ण जन्म की शास्त्रीय कथा
श्रीकृष्ण जन्म का सबसे विस्तृत वर्णन श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कन्ध के प्रथम से चौथे अध्याय में है। इसके अतिरिक्त विष्णुपुराण के पंचम अंश और महाभारत के परिशिष्ट माने जाने वाले हरिवंश के विष्णुपर्व में भी कृष्णावतार की कथा वर्णित है।
ग्रन्थों की कथन-शैली – कथा का मूल क्रम
- पृथ्वी का अधर्म और अत्याचार से पीड़ित होना
- भगवान् विष्णु से उसके भार-हरण की प्रार्थना
- देवकी और वसुदेव का विवाह
- कंस को देवकी के आठवें पुत्र से मृत्यु की आकाशवाणी
- देवकी-वसुदेव का कारागार में बन्द होना
- देवकी की प्रथम छह सन्तानों का कंस द्वारा वध
- सातवें गर्भ का रोहिणी के गर्भ में स्थापित होना
- आठवें गर्भ में भगवान् का प्राकट्य
- वसुदेव द्वारा शिशु को गोकुल पहुँचाना
- योगमाया को मथुरा लाया जाना
विष्णुपुराण – देवकी और वसुदेव के विवाह से कृष्ण-कथा की मानवीय भूमि
देवकस्य सुतां पूर्वं वसुदेवो महामुने।
उपयेमे महाभागां देवकीं देवतोपमाम्॥
अर्थात् महर्षि पराशर मैत्रेय से कहते हैं—महामुने, वसुदेव ने देवक की परम सौभाग्यवती और देवतुल्य पुत्री देवकी से विवाह किया। (विष्णुपुराण)
आकाशवाणी और कंस का भय
देवकी कंस की बहन थीं। विवाह के पश्चात् कंस स्वयं देवकी और वसुदेव का रथ चला रहा था। तभी आकाशवाणी हुई कि देवकी की आठवीं सन्तान कंस की मृत्यु का कारण बनेगी।
सत्ता जब धर्म से विमुख होती है, तब उसे सबसे अधिक भय भविष्य से लगता है। कंस ने भी उस भविष्य को रोकने के लिए वर्तमान को रक्तरंजित कर दिया। उसने देवकी और वसुदेव को बन्दी बनाया और उनकी सन्तानों को जन्म लेते ही मारना आरम्भ कर दिया।
यहाँ श्रीमद्भागवत की कथा केवल एक अत्याचारी राजा का वृत्तान्त नहीं रहती। वह बताती है कि भय से प्रेरित सत्ता विवेक खो देती है। कंस भविष्यवाणी को निष्फल करना चाहता था, परन्तु अपने प्रत्येक अधार्मिक कर्म से उसी परिणाम की ओर बढ़ता गया जिससे वह बचना चाहता था।
सातवाँ गर्भ और संकर्षण
श्रीमद्भागवत के अनुसार देवकी का सातवाँ गर्भ भगवान् की योगमाया द्वारा रोहिणी के गर्भ में स्थापित किया गया। वही बालक आगे चलकर बलराम कहलाए। गर्भ के “संकर्षण”—एक स्थान से दूसरे स्थान पर आकर्षित किए जाने—के कारण उनका एक नाम संकर्षण हुआ।
श्रीकृष्ण जन्म की वह दिव्य रात्रि
भागवत का वर्णन उस रात्रि को परम मंगलमय बनाता है। रोहिणी नक्षत्र था। दिशाएँ प्रसन्न थीं, आकाश निर्मल था, नदियों का जल स्वच्छ था, सरोवरों में कमल खिले थे और सुगन्धित, सुखद वायु प्रवाहित हो रही थी।
अथ सर्वगुणोपेतः कालः परमशोभनः।
यर्ह्येवाजनजन्मर्क्षं शान्तर्क्षग्रहतारकम्॥
दिशः प्रसेदुर्गगनं निर्मलोडुगणोदयम्।
मही मङ्गलभूयिष्ठपुरग्रामव्रजाकरा॥
—श्रीमद्भागवत महापुराण
भावार्थतः, अजन्मा प्रभु के प्राकट्य का समय आया तो काल परम मंगलमय हो उठा। नक्षत्र, ग्रह और तारागण शान्त थे; दिशाएँ प्रसन्न और आकाश निर्मल था। श्रीमद्भागवत के इस पूरे वर्णन में प्रकृति स्वयं भगवान् के स्वागत में जागती हुई दिखाई देती है। नदियों, कमलों, वनस्पतियों और सुगन्धित वायु का भी विस्तार एक दिव्य आभा बिखेरता सा प्रतीत होता है।
जन्म नहीं, दिव्य प्राकट्य
श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध का आठवाँ श्लोक इस घटना को अत्यन्त स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करता है:
निशीथे तम उद्भूते जायमाने जनार्दने।
देवक्यां देवरूपिण्यां विष्णुः सर्वगुहाशयः॥
आविरासीद्यथा प्राच्यां दिशीन्दुरिव पुष्कलः॥
—श्रीमद्भागवत महापुराण
अर्थात् घोर अन्धकार से व्याप्त मध्यरात्रि में, देवस्वरूपिणी देवकी के गर्भ से सबके हृदय में निवास करने वाले भगवान् विष्णु उसी प्रकार प्रकट हुए जैसे पूर्व दिशा में पूर्ण चन्द्रमा उदित होता है।
यहाँ “आविरासीत्” शब्द विशेष महत्त्व रखता है—वे प्रकट हुए। वैष्णव सिद्धान्त में श्रीकृष्ण का जन्म कर्म से बँधे जीव की भाँति नहीं माना जाता। भगवद्गीता में स्वयं श्रीकृष्ण अपने जन्म और कर्म को दिव्य कहते हैं:
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥
—भगवद्गीता
अर्थात् जो मेरे जन्म और कर्म की दिव्यता को तत्त्वतः जानता है, वह शरीर त्यागने के बाद पुनर्जन्म प्राप्त नहीं करता, बल्कि मुझे प्राप्त होता है।
इसी कारण जन्माष्टमी में भक्त केवल एक प्राचीन जन्मोत्सव नहीं मनाते; वे उस दिव्य प्राकट्य का स्मरण करते हैं जिसमें सनातन परमात्मा भक्त के लिए सुलभ बालरूप धारण करते हैं।
चतुर्भुज स्वरूप में भगवान् का दर्शन
श्रीकृष्ण जन्म लेते ही सामान्य शिशु के रूप में दिखाई देते हैं। श्रीमद्भागवत का मूल वर्णन अधिक विशिष्ट है। वसुदेव ने पहले भगवान् को चतुर्भुज दिव्य स्वरूप में देखा—कमल जैसे नेत्र, हाथों में शंख, चक्र, गदा आदि आयुध, वक्षस्थल पर श्रीवत्स का चिह्न, कण्ठ में कौस्तुभ मणि और पीताम्बर।
तमद्भुतं बालकमम्बुजेक्षणं
चतुर्भुजं शङ्खगदाद्युदायुधम्।
श्रीवत्सलक्ष्मं गलशोभिकौस्तुभं
पीताम्बरं सान्द्रपयोदसौभगम्॥
—श्रीमद्भागवत महापुराण
घने मेघ जैसी श्याम कान्ति से सुशोभित वह स्वरूप बालक का भी था और परमेश्वर का भी। यही कृष्ण-भक्ति का विलक्षण रहस्य है—अनन्त सत्ता स्वयं को इतना छोटा कर देती है कि माता उसे अपनी गोद में उठा सके।
वसुदेव और देवकी ने उनकी स्तुति की। देवकी ने कंस के भय से भगवान् से अपना चतुर्भुज स्वरूप छिपा लेने की प्रार्थना की। तब भगवान् ने साधारण मानवीय शिशु जैसा रूप धारण किया।
कारागार के द्वार कैसे खुले?
भगवान् के निर्देश पर वसुदेव नवजात शिशु को गोकुल में नन्द और यशोदा के घर ले जाने के लिए उठे। भागवत के अनुसार योगमाया के प्रभाव से पहरेदार सो गए, बन्धन खुल गए और बन्द द्वार स्वतः खुलते चले गए।
बाहर वर्षा हो रही थी। शेषनाग ने अपने फनों से शिशु की रक्षा की। यमुना ने वसुदेव को मार्ग दिया। वसुदेव गोकुल पहुँचे, वहाँ जन्मी कन्या को लेकर लौटे और कृष्ण को यशोदा के पास छोड़ दिया।
यमुना का श्रीकृष्ण के चरण छूने के लिए ऊपर उठना हमारी अत्यन्त लोकप्रिय भक्ति-परम्परा अनुसार है और सनातन धर्म का मूल है।
भागवत-वर्णन – यमुना का प्रवाह गम्भीर और वेगवान होने पर भी उसने वसुदेव को मार्ग दिया।
योगमाया की उद्घोषणा
वसुदेव जब कन्या को लेकर कारागार लौट आए, तब द्वार और बन्धन पूर्ववत् हो गए। कन्या के रोने की ध्वनि सुनकर पहरेदारों ने कंस को सूचना दी। कंस ने उसे भी मारना चाहा, किन्तु वह उसके हाथ से छूटकर आकाश में देवी के रूप में प्रकट हुईं।
उन्होंने कंस को बताया कि उसका वध करने वाला कहीं और जन्म ले चुका है। इस प्रकार जिस क्षण कंस ने समझा कि उसने संकट को पकड़ लिया है, उसी क्षण उसके हाथों में केवल उसकी विफलता रह गई।
देवकीनन्दन और यशोदानन्दन—दो मातृत्वों का संगम
श्रीकृष्ण देवकी के गर्भ से प्रकट हुए, किन्तु उनका बाल्यकाल यशोदा की गोद में बीता। इसलिए वे देवकीनन्दन भी हैं और यशोदानन्दन भी।
देवकी का वात्सल्य वियोग, त्याग और प्रतीक्षा का वात्सल्य है। यशोदा का वात्सल्य सान्निध्य, दुलार और सहज मातृत्व का वात्सल्य है। एक माता ने उन्हें जन्म दिया, दूसरी ने उनके मुख में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड देखकर भी उन्हें अपना बालक समझा।
कृष्ण-कथा इन दोनों मातृत्वों में कोई प्रतिस्पर्धा नहीं रखती। वह बताती है कि परमात्मा जन्म से सम्बन्धित भी हैं और प्रेम से बँधने वाले भी।
श्रीकृष्ण जन्म का आध्यात्मिक अर्थ
भगवान् का इस वास्तविक दिव्य प्राकट्य का आध्यात्मिक अर्थ
- कारागार मनुष्य की असहाय परिस्थिति का बिम्ब बन सकता है।
- कंस भय से उत्पन्न अत्याचार का स्वरूप है।
- मध्यरात्रि उस अन्धकार की अवस्था है जिसमें आशा दिखाई नहीं देती।
- खुलते बन्धन बताते हैं कि भगवान् का अनुग्रह असम्भव प्रतीत होने वाले मार्ग भी खोल सकता है।
- यमुना-पार की यात्रा धर्म, साहस और पूर्ण विश्वास की यात्रा है।
- गोकुल में पहुँचा बालक इस सत्य का उद्घोष है कि परम सत्ता ऐश्वर्यपूर्ण राजप्रासाद ही नहीं, गोपालकों के सरल घर को भी अपना निवास बनाती है।
ये आध्यात्मिक व्याख्याएँ कथा से ग्रहण किए गए भाव हैं।
श्रीकृष्ण की ऐतिहासिक जन्मतिथि
श्रीमद्भागवत जन्म का धार्मिक काल-संकेत देता है—मध्यरात्रि, अष्टमी और रोहिणी से सम्बद्ध परम्परा।
अलग-अलग आधुनिक गणनाएँ श्रीकृष्ण जन्म के लिए भिन्न वर्ष प्रस्तुत करती हैं।
श्रद्धा का आधार किसी अनुमानित आधुनिक तारीख पर नहीं, शास्त्रों में वर्णित भगवान् के दिव्य प्राकट्य पर है।
जन्माष्टमी का चिरन्तन सन्देश
श्रीकृष्ण का जन्म राजसिंहासन पर नहीं, कारागार में हुआ; किन्तु उनके आते ही कारागार के बन्धन खुल गए। उनके पास उस क्षण कोई सेना नहीं थी, फिर भी कंस का अन्त निश्चित हो चुका था। वे बोल नहीं रहे थे, पर उनका मौन ही अधर्म के लिए उद्घोषणा था।
मध्यरात्रि में जब भक्त घण्टे, शंख और मंगलध्वनि के साथ कहते हैं—“नन्द के आनन्द भयो, जय कन्हैया लाल की”—तब वे केवल देवकी-वसुदेव के पुत्र का अभिनन्दन नहीं करते। वे उस विश्वास को पुनः जगाते हैं कि अन्धकार कितना भी सघन हो, प्रकाश को जन्म लेने से नहीं रोक सकता।
और श्रीकृष्ण का प्रकाश बाहर से नहीं आता। वह सर्वगुहाशय—प्रत्येक हृदय की गुहा में पहले से स्थित—स्वयं को प्रकट करता है।


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