Silhouette of an ancient temple with a crescent moon and candles in twilight

प्रदोष व्रत 12 जून 2026: शुक्र प्रदोष की तिथि, पंचांग, शुभ समय, पूजा-विधि और स्कन्द पुराण आधारित कथा

प्रदोष व्रत 12 जून 2026 को है। यह शुक्रवार को पड़ने वाला शुक्र प्रदोष व्रत है। नई दिल्ली पंचांग के अनुसार द्वादशी तिथि रात्रि 7:36 तक रहेगी और उसके बाद कृष्ण त्रयोदशी आरम्भ होगी। प्रदोष पूजा मुहूर्त रात्रि 7:36 से 9:20 तक रहेगा। यह ज्येष्ठ अधिक मास कृष्ण पक्ष का प्रदोष है। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा, उपवास, बेलपत्र अर्पण, “ॐ नमः शिवाय” जप और प्रदोष व्रत कथा का पाठ विशेष फलदायक माना गया है। स्कन्द पुराण में प्रदोष-काल की महिमा और धर्मगुप्त-शुचिव्रत की कथा विस्तार से आती है।

12 जून 2026, शुक्रवार को प्रदोष व्रत रखा जाएगा। यह शुक्र प्रदोष व्रत है। पंचांग के अनुसार यह ज्येष्ठ अधिक मास, कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी से सम्बद्ध व्रत है।

नई दिल्ली पंचांग के अनुसार 12 जून 2026 को द्वादशी तिथि रात्रि 7:36 तक रहेगी। उसके बाद कृष्ण त्रयोदशी आरम्भ होगी। इसी कारण प्रदोष-पूजा का मुख्य समय 12 जून की सायं 7:36 से रात्रि 9:20 तक रहेगा।

यह समय विशेष है। छोटा भी। गम्भीर भी। इसी समय भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है।

प्रदोष व्रत का शास्त्रीय आधार

स्कन्द पुराण, ब्रह्मखण्ड, ब्रह्मोत्तरखण्ड में प्रदोष का महत्त्व स्पष्ट रूप से कहा गया है। वहाँ सूतजी बताते हैं कि त्रयोदशी तिथि की सन्ध्या को प्रदोष कहा जाता है। इस समय भगवान शम्भु की पूजा करनी चाहिए।

उसी प्रसंग में कहा गया है कि प्रदोष-काल में देवता भगवान शिव के समीप उपस्थित रहते हैं। कैलास में भगवान शिव का आनन्दमय नृत्य होता है। इसलिए उस समय पूजा, जप, होम, शिवकथा और स्तुति करनी चाहिए।

प्रदोष केवल एक तिथि-व्रत नहीं है। यह सन्ध्या की साधना है। दिन और रात्रि के मध्य का वह समय, जब मन को भीतर लौटाना सरल हो जाता है।

प्रदोष व्रत पंचांग विवरण

पंचांग अंगविवरण
व्रतशुक्र प्रदोष व्रत
दिनांक12 जून 2026
वारशुक्रवार
पक्षकृष्ण पक्ष
मासज्येष्ठ अधिक मास
विक्रम संवत2083, सिद्धार्थी
शक संवत1948, पराभव
सूर्योदयप्रातः 5:23
सूर्यास्तसायं 7:19
चन्द्रोदय13 जून, प्रातः 3:15
चन्द्रास्तअपराह्न 4:18
तिथिद्वादशी रात्रि 7:36 तक, तत्पश्चात् त्रयोदशी
त्रयोदशी आरम्भ12 जून 2026, रात्रि 7:36
त्रयोदशी समाप्ति13 जून 2026, अपराह्न 4:07
नक्षत्रअश्विनी प्रातः 6:28 तक, तत्पश्चात् भरणी
भरणी नक्षत्र समाप्ति13 जून, प्रातः 4:05
योगअतिगण्ड रात्रि 9:26 तक, तत्पश्चात् सुकर्मा
करणकौलव प्रातः 9:10 तक
करणतैतिल रात्रि 7:36 तक
करणगरज रात्रि 7:36 के बाद
चन्द्र राशिमेष
सूर्य राशिवृषभ
ऋतुग्रीष्म
अयनउत्तरायण
दिनमान13 घण्टे 56 मिनट 39 क्षण
रात्रिमान10 घण्टे 03 मिनट 23 क्षण
मध्याह्नदोपहर 12:21
दिवस विशेषपुरुषोत्तम मास दिवस 27, परमा एकादशी पारण, शुक्र प्रदोष व्रत, सर्वार्थ सिद्धि योग

प्रदोष पूजा का मुख्य मुहूर्त

पूजा-विवरणसमय
प्रदोष पूजा मुहूर्तरात्रि 7:36 से 9:20
अवधि1 घण्टा 44 मिनट
प्रदोष-काल का आधारसूर्यास्त के बाद त्रयोदशी का संयोग
गो-धूलि मुहूर्तसायं 7:18 से 7:38
सायं सन्ध्यासायं 7:19 से रात्रि 8:20

प्रदोष पूजा में 7:36 से 9:20 तक का समय ग्रहण करें। 7:36 से पहले त्रयोदशी नहीं रहेगी, इसलिए मुख्य शिव-पूजन त्रयोदशी आरम्भ होने के बाद करना श्रेष्ठ रहेगा।

दिन के शुभ समय-खंड

शुभ समयसमय
ब्रह्म मुहूर्तप्रातः 4:02 से 4:42
प्रातः सन्ध्याप्रातः 4:22 से 5:23
सर्वार्थ सिद्धि योगप्रातः 5:23 से 6:28
अभिजित मुहूर्तपूर्वाह्न 11:53 से अपराह्न 12:49
विजय मुहूर्तअपराह्न 2:40 से 3:36
गो-धूलि मुहूर्तसायं 7:18 से 7:38
सायं सन्ध्यासायं 7:19 से रात्रि 8:20
प्रदोष पूजा मुहूर्तरात्रि 7:36 से 9:20
अमृत कालरात्रि 11:46 से 13 जून रात्रि 1:12
निशीथ मुहूर्त13 जून रात्रि 12:01 से 12:41

पंचक रहित शुभ मुहूर्त

समय-खंडअवधि
शुभ मुहूर्तप्रातः 5:23 से 5:39
शुभ मुहूर्तप्रातः 7:54 से 10:14
शुभ मुहूर्तअपराह्न 12:32 से 2:48
शुभ मुहूर्तसायं 5:07 से 7:26
शुभ मुहूर्तरात्रि 7:36 से 9:30
शुभ मुहूर्त13 जून रात्रि 12:40 से 2:05

प्रदोष पूजा के लिए सबसे उपयोगी समय रात्रि 7:36 से 9:20 है। यह प्रदोष-काल भी है और पंचक रहित शुभ मुहूर्त में भी आता है।

जिन समयों में नए लौकिक कार्य टालें

समयअवधि
गुलिक कालप्रातः 7:07 से 8:52
दुर्मुहूर्तप्रातः 8:10 से 9:06
राहु कालपूर्वाह्न 10:36 से अपराह्न 12:21
दुर्मुहूर्तअपराह्न 12:49 से 1:45
वर्ज्यअपराह्न 3:07 से 4:33
यमगण्डअपराह्न 3:50 से 5:35
गण्डमूलप्रातः 5:23 से 6:28
विडाल योग13 जून प्रातः 4:05 से 5:23
रोग बाणप्रातः 9:40 तक
रोग पंचकसायं 7:26 से 7:36

व्रत, जप और शिव-पूजन के लिए दिन पवित्र है। फिर भी नये व्यापार, गृह-संबंधी आरम्भ, बड़ा धन-व्यवहार या अन्य लौकिक आरम्भ इन समयों में टालना उचित माना जाता है।

शुक्र प्रदोष व्रत का महत्त्व

जब प्रदोष व्रत शुक्रवार को आता है, तब उसे शुक्र प्रदोष कहा जाता है। शुक्रवार का सम्बन्ध गृहस्थ-सौख्य, सौन्दर्य, दाम्पत्य-संतुलन और संपन्नता से जोड़ा जाता है। परन्तु प्रदोष का मूल देवता भगवान शिव ही हैं।

इस दिन शिवलिंग पर जल, दूध, दधि, मधु, घृत, बेलपत्र, धतूरा, आक, चन्दन और पुष्प अर्पित किए जाते हैं। माता पार्वती, श्रीगणेश, कार्तिकेय और नन्दी का भी स्मरण किया जाता है।

स्कन्द पुराण के अनुसार प्रदोष-काल में शिव-पूजन से दुःख, दरिद्रता, ऋण-भार और भय से मुक्ति का मार्ग खुलता है। मन संयत हो, वाणी मृदु हो, आहार सात्त्विक हो और पूजा श्रद्धा से हो — यही व्रत का केन्द्र है।

प्रदोष व्रत की शास्त्राधारित कथा

यह कथा स्कन्द पुराण, ब्रह्मखण्ड, ब्रह्मोत्तरखण्ड में आती है। सूतजी ऋषियों को प्रदोष का माहात्म्य सुनाते हैं। पहले वे बताते हैं कि त्रयोदशी की सन्ध्या प्रदोष कहलाती है और उसी समय भगवान शिव की पूजा करनी चाहिए। फिर एक प्राचीन कथा आती है।

विदर्भ देश में सत्यरथ नाम के राजा थे। वे सत्य बोलने वाले, वीर और धर्मपालक थे। उनका राज्य व्यवस्थित था। प्रजा सुखी थी। परन्तु शाल्व देश के राजा उनके शत्रु थे। एक समय शाल्वों ने सेना लेकर विदर्भ पर आक्रमण कर दिया।

राजा सत्यरथ ने युद्ध किया। युद्ध घोर हुआ। अन्ततः वे रणभूमि में मारे गए। राज्य शत्रुओं के हाथ चला गया।

राजा की रानी गर्भवती थीं। वे अत्यन्त दुःखी होकर रात्रि में नगर से बाहर निकलीं। पश्चिम दिशा की ओर चलती रहीं। थक गईं। प्यास से व्याकुल हुईं। मार्ग में एक सरोवर मिला। वहीं उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया।

दुर्भाग्य से रानी जल लेने गईं और जलचर द्वारा खींच ली गईं। बालक अकेला रह गया। पिता नहीं। माता नहीं। राज्य नहीं। रक्षा करने वाला कोई नहीं।

उसी समय उमा नाम की एक ब्राह्मणी वहाँ आई। वह विधवा थीं। उनका अपना एक पुत्र था। वे भिक्षा से जीवन चलाती थीं। उन्होंने उस रोते हुए बालक को देखा। करुणा जागी। पर वे सोचने लगीं — यह किस कुल का बालक है? क्या मैं इसे उठा सकती हूँ?

तभी भगवान शिव भिक्षुक के रूप में वहाँ प्रकट हुए। उन्होंने ब्राह्मणी से कहा कि इस बालक को बिना शंका अपने साथ ले जाओ। इसका पालन करो। इससे तुम्हारा कल्याण होगा।

ब्राह्मणी ने बालक को अपनाया। उसने अपने पुत्र के साथ उस राजकुमार का भी पालन किया। अपने पुत्र का नाम शुचिव्रत था। राजकुमार का नाम धर्मगुप्त रखा गया।

दोनों बालक बड़े हुए। संस्कार मिले। वे भिक्षा के लिए ब्राह्मणी के साथ जाते। एक दिन वे एक शिव-मन्दिर पहुँचे। वहाँ शाण्डिल्य ऋषि विराजमान थे। ऋषि ने बालकों को देखा और उनके कर्मों का रहस्य जाना।

ब्राह्मणी ने पूछा — यह बालक कौन है? इसका जन्म क्या है? इसका राज्य कैसे गया? इसकी दरिद्रता कब दूर होगी?

शाण्डिल्य ऋषि ने बताया कि धर्मगुप्त विदर्भ के राजा सत्यरथ का पुत्र है। उसके पिता पिछले जन्म में भी राजा थे। उन्होंने प्रदोष-काल में शिव-पूजन आरम्भ किया था, पर बीच में ही पूजा छोड़कर अन्य कार्य में लग गए। पूजा पूर्ण किए बिना उन्होंने भोजन किया। उनके पुत्र ने भी वही भूल की। इसी अधूरे प्रदोष-पूजन के दोष से अगले जन्म में राज्य गया, पिता मारे गए और पुत्र को दरिद्रता सहनी पड़ी।

फिर ऋषि ने उपाय बताया।

उन्होंने कहा — त्रयोदशी के प्रदोष-काल में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करो। उपवास रखो। स्नान करो। संयम रखो। शिव का ध्यान करो। दीप अर्पित करो। बिल्वपत्र चढ़ाओ। श्रद्धा से प्रार्थना करो। यह व्रत दरिद्रता, पाप और संकट को दूर करने वाला है।

ब्राह्मणी, शुचिव्रत और धर्मगुप्त ने प्रदोष व्रत आरम्भ किया। वे प्रदोष-काल में शिव-पूजन करने लगे। चार मास बीते। एक दिन शुचिव्रत नदी पर गया। वहाँ उसे एक तेजस्वी निधि-पात्र मिला। वह उसे घर ले आया। ब्राह्मणी ने कहा कि यह दोनों बालकों में बाँट देना चाहिए। धर्मगुप्त ने विनम्रता से मना किया। उसने कहा — यह शुचिव्रत के पुण्य से मिला है। भगवान शिव मेरे लिए भी कृपा करेंगे।

व्रत चलता रहा। एक वर्ष बीता।

एक दिन धर्मगुप्त वन में गया। वहाँ उसे गन्धर्व कन्याएँ दिखाई दीं। उनमें अंशुमती नाम की कन्या थी। वह गन्धर्वराज की पुत्री थी। धर्मगुप्त से उसका मिलन हुआ। बाद में गन्धर्वराज ने बताया कि वह कैलास गया था। वहाँ भगवान महादेव ने उसे आदेश दिया कि धर्मगुप्त शिव-भक्त है। उसके शत्रुओं को पराजित कर उसे उसका राज्य लौटाना चाहिए।

गन्धर्वराज ने अपनी पुत्री अंशुमती का विवाह धर्मगुप्त से किया। उसे सेना, धन और आयुध दिए। धर्मगुप्त ने शत्रुओं को परास्त किया। वह अपने नगर लौटा। उसका राज्याभिषेक हुआ। ब्राह्मणी उसकी माता के समान पूजित हुई। शुचिव्रत उसके भाई के समान रहा।

कथा के अन्त में कहा गया कि जो प्रदोष-काल में भगवान शिव की भक्ति करता है, उसे इच्छित फल मिलते हैं और अन्त में शिवधाम की प्राप्ति होती है।

यह कथा केवल राज्य-प्राप्ति की कथा नहीं है। यह अधूरी पूजा और पूर्ण श्रद्धा का अन्तर बताती है। यह बताती है कि संकट जन्म से नहीं, कर्म से बदलता है। और कर्म भी तब बदलता है, जब मनुष्य सन्ध्या में रुककर शिव के सम्मुख अपना अहंकार रख देता है।

प्रदोष व्रत की पूजा-विधि

स्कन्द पुराण में प्रदोष-पूजन के लिए त्रयोदशी पर उपवास, सूर्यास्त से तीन घटी पहले स्नान, श्वेत वस्त्र, वाणी-संयम, सन्ध्या और जप का विधान मिलता है। गृहस्थजन इसे सरल रूप में कर सकते हैं।

प्रातः स्नान करें। शिव-पार्वती का स्मरण करें। दिन भर सात्त्विकता रखें। अन्न का त्याग, फलाहार या केवल एक समय सात्त्विक आहार — यह अपने स्वास्थ्य और कुल-परंपरा के अनुसार अपनाएँ।

सायं 7:36 के बाद मुख्य प्रदोष पूजा करें।

शिवलिंग पर जल अर्पित करें। फिर पंचामृत से अभिषेक कर सकते हैं। बेलपत्र, धतूरा, आक, चन्दन, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जप करें। महामृत्युंजय मंत्र का जप करें। शिव चालीसा, शिवाष्टक, रुद्राष्टक या रुद्रसूक्त का पाठ करें।

नन्दी को प्रणाम करें। माता पार्वती, श्रीगणेश और कार्तिकेय का स्मरण करें। प्रदोष कथा पढ़ें। दीप अर्पित करें। अन्त में क्षमा-प्रार्थना करें।

जो अधिक विधि न कर सकें, वे एक स्वच्छ दीप, जल, बेलपत्र और सच्चे मन से “ॐ नमः शिवाय” का जप करें। स्कन्द पुराण में कहा गया है कि श्रद्धा से अर्पित एक पुष्प भी भगवान गौरीशंकर को प्रिय होता है।

प्रदोष व्रत में क्या करें?

शिव-मन्दिर जाएँ। शिवलिंग पर जल चढ़ाएँ। बेलपत्र अर्पित करें। वाणी को संयत रखें। क्रोध, असत्य और कटुता से बचें। संध्या के समय मन को बाहर से भीतर लाएँ।

दान करें। अन्न, वस्त्र, गौ-सेवा, दीपदान और ब्राह्मण-भोजन का विधान मिलता है। पर दान का मूल भाव अहंकाररहित होना चाहिए।

प्रदोष व्रत में क्या न करें?

त्रयोदशी के प्रदोष-काल में तामसिक आहार, मद्य, मांस, असत्य, निन्दा, क्रोध और अनावश्यक विवाद से बचें। शिव-पूजन को बीच में छोड़कर अन्य कार्य में न लगें। कथा में यही बिंदु विशेष रूप से दिखाई देता है।

अधूरी पूजा से मन भी अधूरा रहता है। अतः पूजा कम करें, पर पूरी श्रद्धा से करें।

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