Brass oil lamp with lit flame and marigold flower garlands in front of Ganesha statue

माँ बगलामुखी और वाणी की शक्ति: वाक् से स्तम्भन तक

वाणी पर माँ बगलामुखी का सन्देश

मानवीय समस्यामाँ की शिक्षा
क्रोधबोलने से पहले रुकना
निन्दाअसत्य को आगे न बढ़ाना
भयअपने ही मन में हार की भाषा न दोहराना
वाद-विवादस्पष्टता से बोलना, अहंकार से नहीं
अन्यायधर्मपूर्वक रक्षा की प्रार्थना
मन्त्रध्वनि को पवित्र शक्ति मानना

भारतीय आध्यात्मिक परम्परा में वाणी को केवल बोलने का साधन नहीं माना गया। वाणी मन्त्र है, वाणी प्रतिज्ञा है, वाणी आशीर्वाद है, वाणी शाप भी बन सकती है। इसलिए जिस संस्कृति ने वाणी को देवी कहा, उसी ने मौन को भी तप माना।

माँ बगलामुखी इसी मौन और वाणी-संयम की दिव्य अधिष्ठात्री हैं।

ऋग्वेद के देवी सूक्त में वाक् को ब्रह्माण्डीय शक्ति के रूप में प्रतिष्ठा मिली है। देवी स्वयं कहती हैं कि वे देवताओं, मनुष्यों और समस्त चेतना में प्रवाहित हैं। जब वाणी इतनी पवित्र है, तो उसका दुरुपयोग महापाप के समान है। झूठ, निन्दा, कटुता, अपमान, षड्यन्त्र और भ्रम फैलाने वाली वाणी संसार को भीतर से घायल करती है।

माँ बगलामुखी उसी घायल वाणी को रोकती हैं।

उनका वह प्रसिद्ध रूप, जिसमें वे विरोधी की जिह्वा पकड़ती हैं, हिंसा का प्रतीक नहीं है। वह धर्म का संकेत है। माँ कहती हैं — यह जिह्वा अब असत्य नहीं बोलेगी। यह वाणी अब छल नहीं करेगी। यह शब्द अब किसी निर्दोष को नहीं काटेंगे।

आज के समय में माँ बगलामुखी की साधना और भी प्रासंगिक है। सोशल मीडिया की जल्दबाजी, सार्वजनिक अपमान, कटु टिप्पणियाँ, झूठे आरोप, फॉरवर्ड की गई अफवाहें — इन सबके बीच माँ हमें रुकना सिखाती हैं। वे कहती हैं: पहले सत्य देखो, फिर बोलो। पहले मन शांत करो, फिर निर्णय लो।

Discover more from TatvaDhi

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading