‘गुरु पूर्णिमा’ नाम संस्कृत के दो पदों—गुरु और पूर्णिमा—से निर्मित है। पूर्णिमा चन्द्रमा की पूर्ण कला की तिथि है। भारतीय आध्यात्मिक चिन्तन में यह पूर्णता, निर्मलता, अन्तर्दृष्टि और ज्ञान के सम्पूर्ण प्रकाश का प्रतीक बनती है। आषाढ़ मास की इसी पूर्णिमा पर उन गुरुजनों, आचार्यों, विद्वानों और अध्यापकों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है, जिन्होंने मनुष्य को अज्ञान से ज्ञान, संशय से विवेक और दिशाहीनता से कर्तव्य-पथ की ओर अग्रसर किया।
‘गुरु’ शब्द का सामान्य संस्कृत अर्थ गम्भीर, गौरवयुक्त, पूज्य अथवा शिक्षा देने वाला है। आध्यात्मिक परम्परा में इसकी एक प्रसिद्ध निरुक्तिपरक व्याख्या ‘गु’ और ‘रु’ के माध्यम से की गई है—
गुशब्दस्त्वन्धकारः स्यात् रुशब्दस्तन्निरोधकः।
अन्धकारनिरोधित्वात् गुरुरित्यभिधीयते॥
—अद्वयतारकोपनिषद्
इसका भाव है—‘गु’ अन्धकार का और ‘रु’ उसके निरोध अथवा निवारण का बोध कराता है। जो अज्ञानरूपी अन्धकार का निवारण करता है, वह गुरु कहलाता है। अद्वयतारकोपनिषद् में गुरु की यही निरुक्तिपरक व्याख्या प्राप्त होती है।
यहाँ यह समझना भी आवश्यक है कि ‘गु’ और ‘रु’ का विभाजन गुरु शब्द की आधुनिक भाषावैज्ञानिक व्युत्पत्ति नहीं, अपितु उसकी आध्यात्मिक व्याख्या है। इसका प्रयोजन यह बताना है कि वास्तविक गुरु केवल ज्ञान नहीं देता; वह मनुष्य के भीतर स्थित अज्ञान, भ्रम, अहंकार और अविवेक को दूर करता है।
पूर्णिमा का चन्द्रमा स्वयं प्रकाश उत्पन्न नहीं करता; वह सूर्य के प्रकाश को सम्पूर्णता से प्रतिबिम्बित करता है। इसी प्रकार श्रेष्ठ शिष्य भी गुरु से प्राप्त ज्ञान को अपने आचरण में धारण करके समाज तक पहुँचाता है। इसलिए गुरु पूर्णिमा गुरु की महिमा के साथ-साथ शिष्य की ग्रहणशीलता, अनुशासन और उत्तरदायित्व का भी पर्व है।
एक पूर्णिमा, अनेक ज्ञान-परम्पराएँ
गुरु पूर्णिमा का मूल स्वर भारतीय सनातन गुरु-शिष्य परम्परा में है, किन्तु आषाढ़ पूर्णिमा भारत की अनेक आध्यात्मिक धाराओं में भी विशिष्ट महत्त्व रखती है। वेदव्यास, भगवान बुद्ध, आदिगुरु शिव और भगवान महावीर से सम्बद्ध परम्पराएँ इस तिथि को ज्ञान के सम्प्रेषण और शिष्य-परम्परा के विस्तार से जोड़ती हैं।
व्यास पूर्णिमा: महर्षि वेदव्यास और ज्ञान का सुव्यवस्थित विस्तार
गुरु पूर्णिमा का सर्वाधिक प्रचलित नाम व्यास पूर्णिमा है। भारतीय परम्परा आषाढ़ पूर्णिमा को महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास की जयन्ती के रूप में स्मरण करती है। उन्हें भारतीय ज्ञान-परम्परा के महानतम आचार्यों में स्थान प्राप्त है।
महर्षि वेदव्यास ने वैदिक ज्ञान को ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद के रूप में व्यवस्थित किया तथा अलग-अलग शिष्य-परम्पराओं के माध्यम से उसका संरक्षण सुनिश्चित किया। श्रीमद्भागवत महापुराण में एक वेद को चार रूपों में व्यवस्थित किए जाने और व्यास द्वारा उसे अपने शिष्यों में वितरित किए जाने का वर्णन मिलता है।
महर्षि वेदव्यास ने महाभारत, ब्रह्मसूत्र तथा अठारह महापुराणों की रचना, और संकलन किया जिससे वो आम जनमानस तक पहुँच सके। इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के विवरण में गुरु पूर्णिमा को व्यास जयन्ती तथा भारत के महान आचार्यों के प्रति ऋण-स्मरण का दिवस बताया गया है।
व्यास का महत्त्व केवल इसलिए नहीं है कि उन्होंने ज्ञान अर्जित किया। उनकी महानता इस तथ्य में है कि उन्होंने ज्ञान को व्यवस्थित, सुबोध और सम्प्रेषणीय बनाया। उन्होंने ज्ञान को सीमित व्यक्तियों की उपलब्धि न रहने देकर उसे पीढ़ियों तक प्रवाहित होने वाली परम्परा में परिवर्तित किया।
इसी कारण वे केवल एक ऋषि नहीं, ज्ञान के सम्पादन, संरक्षण और प्रसार के आदर्श आचार्य माने जाते हैं।
बौद्ध परम्परा: सारनाथ में धर्मचक्र प्रवर्तन
बौद्ध परम्परा में आषाढ़ पूर्णिमा को धम्मचक्कप्पवत्तन दिवस अथवा धर्मचक्र प्रवर्तन दिवस के रूप में स्मरण किया जाता है। बोधगया में सम्बोधि प्राप्त करने के पश्चात् भगवान बुद्ध सारनाथ के ऋषिपत्तन मृगदाय पहुँचे और अपने पाँच पूर्व साधक साथियों को प्रथम उपदेश दिया।
यह उपदेश पालि बौद्ध साहित्य में धम्मचक्कप्पवत्तन सुत्त—संयुक्त निकाय 56.11 के रूप में सुरक्षित है। इसमें भगवान बुद्ध ने भोग-विलास और कठोर आत्मपीड़न—दोनों अतियों का परित्याग करते हुए मध्यम मार्ग, चार आर्य सत्य और आर्य अष्टाङ्गिक मार्ग का प्रतिपादन किया।
भारत सरकार के संस्कृति मन्त्रालय से सम्बद्ध विवरण भी आषाढ़ पूर्णिमा को वह तिथि बताता है, जिस दिन भगवान बुद्ध ने सारनाथ में पाँच साधक साथियों को प्रथम उपदेश देकर धर्मचक्र प्रवर्तन किया। इसी घटना से संघ और बौद्ध उपदेश-परम्परा के संगठित विस्तार का आरम्भ माना जाता है।
इस प्रसंग में गुरु की भूमिका केवल उपदेशक की नहीं है। बुद्ध ने अपने अनुभव को निजी उपलब्धि बनाकर नहीं रखा। उन्होंने दुःख, उसके कारण, उसके निरोध और निरोध तक पहुँचने वाले मार्ग को ऐसी शिक्षण-पद्धति में प्रस्तुत किया, जिसे अन्य साधक भी समझ सकें, परख सकें और अपने जीवन में धारण कर सकें।
अतः बौद्ध परम्परा में यह पूर्णिमा ज्ञान को स्वयं तक सीमित न रखकर जीवमात्र के कल्याण के लिए वितरित करने की प्रेरणा देती है।
योग-परम्परा: शिव का आदियोगी और आदिगुरु स्वरूप
योग-परम्परा में भगवान शिव को आदियोगी—प्रथम योगी—और आदिगुरु—प्रथम गुरु—के रूप में वन्दित किया जाता है।
दीर्घ समाधि के पश्चात् शिव ने आषाढ़ पूर्णिमा के अवसर पर दक्षिणाभिमुख होकर सप्तर्षियों को योगविद्या प्रदान करनी आरम्भ की। सप्तर्षियों ने इस ज्ञान को विभिन्न भूभागों और शिष्य-परम्पराओं में प्रवाहित किया। इस दृष्टि से गुरु पूर्णिमा को योग-विज्ञान के गुरु से शिष्य तक प्रथम सुव्यवस्थित सम्प्रेषण का प्रतीक माना जाता है।
इस परम्परा का मूल सन्देश अत्यन्त गम्भीर है। योग केवल आसन अथवा शारीरिक साधना नहीं, अपितु शरीर, प्राण, मन, बुद्धि और चेतना के अनुशासन का विज्ञान है। गुरु इस विज्ञान को केवल शब्दों में नहीं देता; वह शिष्य की पात्रता के अनुरूप साधना-पद्धति का निर्देशन करता है।
सप्तर्षियों का प्रसंग यह भी बताता है कि ज्ञान की धारा गुरु पर समाप्त नहीं होती। गुरु योग्य शिष्य निर्मित करता है, और योग्य शिष्य उस ज्ञान को मानव-कल्याण की व्यापक परम्परा में आगे ले जाते हैं।
जैन परम्परा: महावीर और इन्द्रभूति गौतम
जैन परम्परा में भी आषाढ़ पूर्णिमा गुरु और शिष्य के सम्बन्ध से जोड़ी जाती है। इन्द्रभूति गौतम एक प्रतिष्ठित विद्वान थे, जो भगवान महावीर के सम्पर्क में आने के पश्चात् उनके प्रथम और प्रमुख गणधर बने। जैन परम्परा में वे आगे चलकर गौतम स्वामी के नाम से विख्यात हुए।
विशेषतः दिगम्बर जैन परम्परा के विवरण में इन्द्रभूति गौतम द्वारा भगवान महावीर से दीक्षा ग्रहण करने की तिथि को गुरु पूर्णिमा के रूप में स्मरण करने का उल्लेख मिलता है। जैन एसोसिएशन्स इन नॉर्थ अमेरिका के विवरण के अनुसार इन्द्रभूति भगवान महावीर के प्रमुख शिष्य बने और उनके दीक्षा-दिवस को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है।
जैन परम्पराओं में इस घटना के विवरण में कुछ भिन्नताएँ भी मिलती हैं। दिगम्बर परम्परा मानस्तम्भ को देखकर इन्द्रभूति के अभिमान के क्षय और महावीर से दीक्षा का वर्णन करती है। श्वेताम्बर परम्परा में महावीर तथा इन्द्रभूति के मध्य दार्शनिक संवाद और उसके पश्चात् शिष्यत्व ग्रहण करने की कथा अधिक प्रमुख है।
इस प्रसंग का मूल तत्त्व अहंकार से ज्ञान की ओर यात्रा है। इन्द्रभूति स्वयं महान विद्वान थे, किन्तु विद्वत्ता का वास्तविक उत्कर्ष उस समय हुआ, जब उन्होंने सत्य के समक्ष अपने पूर्वाग्रह का परित्याग किया।
यह कथा बताती है कि शिष्य होने के लिए अज्ञानी होना आवश्यक नहीं है। अनेक बार अत्यन्त विद्वान व्यक्ति को भी ऐसे गुरु की आवश्यकता होती है, जो उसके ज्ञान को आत्मबोध, संयम और अहिंसक आचरण से जोड़ सके।
गुरु पूर्णिमा का सार्वभौम सन्देश
इन परम्पराओं के धार्मिक सिद्धान्त और साधना-पद्धतियाँ भिन्न हो सकती हैं, किन्तु उनके मध्य एक गम्भीर सूत्र दिखाई देता है—ज्ञान तभी जीवनदायी बनता है, जब कोई अनुभवी आचार्य उसे ग्रहण करने योग्य शिष्य तक पहुँचाता है।
महर्षि वेदव्यास ज्ञान को व्यवस्थित और संरक्षित करते हैं।
भगवान बुद्ध अनुभूत सत्य को लोककल्याण के लिए उपदेश में परिवर्तित करते हैं।
आदिगुरु शिव की योग-परम्परा साधना-विज्ञान को सप्तर्षियों के माध्यम से विस्तृत करती है।
भगवान महावीर इन्द्रभूति गौतम की विद्वत्ता को अहंकार से संयम और आत्मानुशासन की दिशा प्रदान करते हैं।
इन सभी प्रसंगों में गुरु शिष्य की स्वतन्त्र चेतना को समाप्त नहीं करता। वह उसे परिष्कृत करता है। गुरु शिष्य को अपना प्रतिबिम्ब नहीं बनाता; वह उसके भीतर निहित सत्यबोध को जाग्रत करता है।
यही गुरु पूर्णिमा का व्यापक अर्थ है—अज्ञान से प्रकाश, अहंकार से विनम्रता, ज्ञान से तत्त्वबोध और व्यक्तिगत उपलब्धि से लोककल्याण की ओर प्रस्थान।

